हवा के झोंके से गिरा पुल और उठे सवाल
बिहार के सुल्तानगंज में गंगा नदी पर बन रहा एक बड़ा पुल जब तेज आंधी में गिर गया तो उसको लेकर खूब चुटकुले बने, मगर क्या पुल के गिरने की वजह खराब निर्माण गुणवत्ता थी या कुछ और?

पुष्यमित्र
बिहार के सुल्तानगंज में गंगा घाट पर खड़े वीरेंद्र कुमार यादव बातचीत की शुरुआत में ही यह बात दोहराते हैं, ''कौआ उड़, मैना उड़, आंधी आई तो पुलवा भी उड़...'' तो उनकी बात में सिर्फ मजाक नहीं छिपा होता, एक दर्द झलकता है. इस सामाजिक कार्यकर्ता ने गंगा नदी पर सुल्तानगंज से अगवानी घाट के बीच पुल बनवाने के लिए 13-14 साल तक संघर्ष किया है. अकेले आंदोलन किए, आवेदन दिए, जहां-तहां चिट्ठियां भेजीं. आखिरकार वीरेंद्र का संघर्ष रंग लाया और 2015 में पुल बनना शुरू भी हो गया. मगर इससे पहले कि पुल का निर्माण पूरा हो पाता, 30 अप्रैल की रात आई आंधी के दौरान इस पुल का एक हिस्सा गिर गया.
15 मई, 2022 को सुल्तानगंज में गंगा घाट के किनारे जब वे यह सब बता रहे थे, मजदूर उस जगह बने रहे विशाल पुल के पिलर नंबर पांच के पास गिरे मलबे को हटाने में जुटे हुए थे. तब यहां आइआइटी रुड़की के इंजीनियरों की एक टीम पुल गिरने के कारणों की जांच करने आई थी, साथ में आइआइटी पटना के विशेषज्ञ और बिहार राज्य पुल निर्माण विभाग के अधिकारी भी थे. 29 पिलर वाले 3.16 किमी लंबे इस पुल के सभी पिलर तैयार हैं और ज्यादातर पर सुपर स्ट्रक्चर लगा हुआ है. यहां मौजूद कंस्ट्रक्शन कंपनी एसपी सिंगला के प्रोजेक्ट डायरेक्टर आलोक कुमार झा हादसे के बारे में जानकारी देते हैं, ''जब पुल का यह सेगमेंट गिरा उस रात संबंधित स्पैन (केबल) में लोड डालकर स्ट्रक्चर का संतुलन बनाया जा रहा था. कुछ स्टाफ छुट्टी पर जाने वाला था, इसलिए लगता है कि लोड डालने में कुछ गड़बड़ी हो गई.''
इस हादसे का एक आम ब्योरा यह है कि 29 अप्रैल की रात करीब 11.30 बजे आंधी आई थी, जिसके चलते संबंधित सुपर स्ट्रक्चर झूलने लगा और फिर रात के करीब तीन बजे वह भहराकर गिर गया. हालांकि इस ब्योरे पर एक सीधा सवाल सुल्तानगंज विकास संघर्ष समिति के प्रवक्ता देवेश कुमार उठाते हैं. वे कहते हैं, ''उस आंधी में हमारे पेड़ों से आम के फल तक नहीं गिरे, पुल कैसे गिर गया.'' यह कहते हुए वे घाट पर बने कंस्ट्रक्शन कंपनी के अस्थायी कार्यालय की बगल में खड़े आम के पेड़ दिखाते हैं जिनमें सच में ही ठीक-ठाक संख्या में छोटे आम लटके थे.
यह मामला उस वक्त राष्ट्रीय सुर्खियों में आया जब केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में इसका जिक्र किया और बताया कि उनके सचिव ने जानकारी दी है कि यह पुल तेज आंधी की वजह से गिरा था. तब गडकरी ने इस वजह को खारिज करते हुए पुलों के निर्माण में गुणवत्ता का ख्याल रखने की हिदायत दी थी.
हालांकि बिहार राज्य पुल निर्माण निगम के चेयरमैन पंकज कुमार पाल ने अगले ही दिन पुल गिरने की वजहों के बारे में काफी बातें साफ कर दी थीं. मीडिया से बात करते हुए उनका कहना था, ''प्रारंभिक जांच में पता चला है कि इस पिलर के दोनों तरफ 27-27 सेगमेंट केबल से कनेक्टेड थे. इनमें से पहले सात तो केबल स्टे के सबसे निचले स्तर से कनेक्ट हो गए थे, बाकी सेगमेंट ठीक से कनेक्ट नहीं हुए थे. ऐसे में जब तेज आंधी आई तो वह हिस्सा हवा की गति झेल नहीं पाया और ढह गया. इस पुल को 31 दिसंबर, 2022 तक बनकर तैयार होना है. हादसे की वजह से इस समय सीमा में कोई बदलाव नहीं होगा.'' इस हादसे को लेकर जब इंडिया टुडे ने पाल से संपर्क किया तो उन्होंने जांच का हवाला देकर कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया. हालांकि उनके शुरुआती बयान से लगता है कि पुल हवा के दबाव से ही गिरा होगा और संभवत: इसकी वजह निर्माण में गुणवत्ता की कमी न होकर तकनीकी चूक रही होगी.
बहरहाल, वजह जो भी हो, मगर पाल के इसी बयान ने यह माहौल बना दिया कि यह पुल आंधी में गिर गया. फिर इसको लेकर राजनीति भी शुरू हो गई. सुल्तानगंज के विधायक ललित नारायण मंडल जो सत्ताधारी दल जद(यू) के ही सदस्य हैं, ने आरोप लगाया कि पुल के निर्माण में भारी भ्रष्टाचार हुआ है, इसी वजह से पुल मामूली-सी आंधी और बारिश नहीं झेल सका. हालांकि घटनास्थल पर गिरे मलबे को देखकर पहली नजर में ऐसा नहीं लगता कि पुल निर्माण की गुणवत्ता में कोई कमी रही होगी. खासतौर पर सीमेंट और बालू की गुणवत्ता में, क्योंकि मलबे को तोड़ रहे मजदूरों को काफी परेशानी हो रही थी.
अब जांच टीम गठित हो चुकी है और उसे अपनी रिपोर्ट देनी है, मगर यह बात साफ है कि यह हादसा एक बड़ी तकनीकी खामी के चलते हुआ. इस मामले में सबसे बड़ी राहत की बात बस यह रही कि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ क्योंकि हादसा रात के वक्त हुआ जब वहां ज्यादा मजदूर और कंपनी के कर्मचारी नहीं थे.