प्रधान संपादक की कलम से
निर्विवाद रूप से लता मंगेशकर मनुष्य जगत के लिए प्रकृति से मिली एक सांगीतिक नियामत की तरह थीं. साक्षात सरस्वती की उपाधि पाने वाली लता जी मां शारदा, किशोरी अमोणकर और अन्नपूर्णा देवी की त्रयी की सर्वाधिक सामाजिक विस्तार वाली कड़ी थीं

अरुण पुरी
यही कोई 92 साल की भरी-पूरी उम्र जीने के बाद सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने इसी छह फरवरी की सुबह देह त्याग दी. बहुधा सफेद साड़ी पहने हुए, करीने से संवरे हुए बाल, माथे पर औसत आकार की लाल बिंदी और चेहरे पर अक्सर तैरती सौम्य मुस्कान, और बच्चे-बूढ़े सबके बीच ''लता दीदी'' के रूप में स्थापित एक अनौपचारिक-आत्मीय परिचय. यह उनकी उस मिथकीय शख्सियत का ही जादू था कि समाज के हर क्षेत्र का आदमी उनके निधन पर राय देने को आतुर था: राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सोसाइटी में कड़कती ठंड में तड़के पहुंचने वाले सफाईकर्मियों तक, विद्वानों-चिंतकों से लेकर गांवों के किसानों तक, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के पायलटों से लेकर टेंपो चालकों तक, पंडित, मौलाना और पादरी से लेकर डांस बारों और पबों तक. सात दशक तक पार्श्वगायन के दौरान विभिन्न भाषाओं में 30,000 से ज्यादा गीत गाकर वे किंवदंती बन गईं. फिल्मकार-गीतकार गुलजार ने ठीक ही कहा कि कोई भी विशेषण बाकी नहीं बचा था जिससे उन्हें अब नवाजा जा सके इसलिए वे इतना ही कहते थे कि ''लता जी बहुत अच्छा गाती हैं.''
उनके बारे में यह कहना उचित होगा कि वे पिछले 75 वर्षों में भारत की सामूहिक चेतना का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी थीं. फरवरी 1981 में इंडिया टुडे में उन पर छपी एक शोधपरक आवरण कथा के लेखक सुमित मित्रा ने तब इसी पहलू को रेखांकित किया था कि वे ''गांधी के लंगोट और टैगोर की दाढ़ी की तरह राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा हो गई हैं.'' इससे काफी पहले अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रिका टाइम ने 1959 में भारत में पार्श्वगायन के क्षेत्र में उन्हें निर्विवाद चैंपियन घोषित किया था. दिलचस्प तथ्य है कि भोजपुरी सिनेमा का सबसे चर्चित गीत हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो...भी उन्होंने ही गाया था. इसके अलावा मैथिली में उन्होंने विद्यापति के गीत भी गाए. यहां तक कि आध्यात्मिक क्षेत्र के रामकथा वाचक मोरारी बापू ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि ''स्वर उनके कंठ में वैकुंठ की याद दिलाता था. उनकी संगीत साधना में गजब की सत्वप्रधानता थी.''
भारतीय संगीत, सिनेमा और उससे भी आगे बढ़कर वृहत्तर सामाजिक जीवन में लता मंगेशकर की उपस्थिति, उनके कद और उनकी व्याप्ति को बताने के लिए ही हम 1981 की उस आवरण कथा को थोड़ी-सी काटछांट के साथ फिर से यहां प्रस्तुत कर रहे हैं. 40 साल बाद भी इसे पढ़कर अंदाजा लगता है कि उनके बारे में कुछ भी नहीं बदला. बल्कि उस अंक में उनके इंटरव्यू से यह जानकर हैरत होती है कि फिल्म संगीत की गुणवत्ता गिरने के बारे में तभी उनकी राय बन गई थी.
अब 80 के आसपास की वय के पाकिस्तान के शास्त्रीय गायक हुसैन बख्श ने इस अंक में छपी अपनी टिप्पणी में बंबई आवाजाही के उन दिनों को याद किया है जब लता जी उन्हें बुलाकर महफिल में उनकी बंदिशें सुना करती थीं. पाकिस्तान के ही शामचौरासी घराने के शफकत अली ने अपने चाचा और वालिद सलामत-अमानत अली खां से लता जी के संबंधों और उनसे जुड़े किस्सों को याद किया है.
लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर इतना कठिन था, जिसके बारे में बताते हुए वे कहने लगी थीं कि अगले जन्म में वे फिर से लता मंगेशकर नहीं बनना चाहेंगी. बचपन में स्कूली शिक्षा के पहले ही दिन साथ में दस महीने की बहन आशा (भोंसले) को गोद में लेकर पहुंच जाने पर उन्हें वहां से निकाल दिया गया तो दोबारा वे स्कूल नहीं गईं.
उन पर पुस्तक लिखने वाले यतींद्र मिश्र ने यहां अपने संस्मरण में बताया है कि लता जी के क्रिकेट प्रेम की वजह से कई बार उनकी बातचीत किस तरह अटक जाती थी: ''मेरे लिए उन्हें रिकॉर्ड करने के वे दिन सबसे कठिन होते थे जब भारत क्रिकेट का कोई मैच खेलता था. 'यतींद्र जी, अभी दो दिन रहने दीजिए, मैं मैच देखूंगी. चार दिन बाद बात करते हैं.' चार दिन बाद दिक्कत तब और बढ़ जाती थी जब भारत दुर्भाग्य से कोई मैच हार जाता था.''
निर्विवाद रूप से लता मंगेशकर मनुष्य जगत के लिए प्रकृति से मिली एक सांगीतिक नियामत की तरह थीं. हमारे समय में साक्षात सरस्वती की उपाधि पाने वाली लता जी मां शारदा, किशोरी अमोणकर और अन्नपूर्णा देवी की त्रयी की सर्वाधिक सामाजिक विस्तार वाली कड़ी थीं.
हमारी दूसरी बड़ी स्टोरी पंजाब के विधानसभा चुनावों पर है, जो इस बार चौतरफा मुकाबले की वजह से खासे दिलचस्प हो गए हैं. इसमें 79 वर्षीय एक महाराजा, एक पूर्व स्टैंडअप कॉमेडियन, एक 94 वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री जिन्होंने अपना पहला चुनाव 65 साल पहले जीता था, और एक छुपा रुस्तम, जिसने क्रिकेटर से टीवी-प्रस्तोता और फिर नेता बने शख्स को मुख्यमंत्री बनने से रोक दिया. राज्य में विधानसभा सीटें भले 117 यानी पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीटों से भी कम हों लेकिन जिन पांच राज्यों में इस महीने चुनाव हो रहे हैं, उनमें यहां भी कुछ कम दांव पर नहीं है.
इसकी 553 किलोमीटर की सीमा पाकिस्तान से लगती है और अस्सी से नब्बे तक के दशक तक यहां पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की स्मृतियां लोगों के दिमाग से गई नहीं हैं. हाल के दिनों में पड़ोस से फिर उस आग को हवा देने की हरकने देखने को मिली हैं. ड्रोन से हथियार और विस्फोटक भी भेजे गए. मुकाबले के चौतरफा होने के साथ-साथ एक पांचवां पहलू भी जुड़ रहा है. किसान आंदोलन का अहम केंद्र रहे इस राज्य के 22 किसान संगठनों ने चुनाव में उतरने के लिए अपनी खुद की भी एक पार्टी बना ली. बहुआयामी मुकाबलों की वजह से इस दफा यहां त्रिशंकु विधानसभा के आसार बनते दिख रहे हैं.
ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा, ग्रुप फोटो एडिटर बंदीप सिंह और सीनियर एडिटर अनिलेश एस. महाजन ने हाल ही पंजाब की व्यापक यात्रा की. संयोग से ये तीनों पंजाब में ही जन्मे हैं. तीनों ने मैदान में संघर्षरत सभी चार प्रमुख नेताओं कांग्रेस के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, शिरोमणि अकाली दल के मुखिया सुखबीर सिंह बादल, आम आदमी पार्टी के भगवंत मान और पंजाब लोक कांग्रेस पार्टी बनाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से बातचीत की, उनके फोटोसेशन किए. अब देखने की बात होगी कि 10 मार्च को त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में कौन किसके साथ गठजोड़ करता है क्योंकि अभी तो सब एक दूसरे से नफरत ही करते दिख रहे हैं.
पर कहते हैं न कि भारतीय राजनीति में कुछ भी संभव है.