प्रधान संपादक की कलम से
चुनावी जीत योगी के लिए राष्ट्रीय राजनीति में छलांग लगाने का आधार बन सकती है. फुसफुसाहटों की मानें तो योगी प्रधानमंत्री के पद पर नरेंद्र मोदी की जगह लेने के दावेदार बन सकते हैं

विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के चेहरे के बगैर जबरदस्त जीत हासिल करने के बाद भाजपा हाइकमान ने 19 मार्च, 2017 को जब गोरखनाथ मठ के महंत का उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में राजतिलक किया, तो इन मामलों में अटकलें लगाने के शौकीन गपोड़ी नवाब बुरी तरह हैरान रह गए. उस चुनाव में भाजपा ने राज्य की 403 में से 312 सीटें जीतीं, जो 1980 में इंदिरा गांधी की 309 सीटों की जीत के बाद सबसे बड़ी जीत थी. वह चुनाव पूरी तरह अकेले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे के दम पर जीता गया, वह भी तब जब महज छह महीने पहले नोटबंदी से पैदा दुश्वारियों ने भाजपा की संभावनाओं में पलीता लगाने का खतरा उत्पन्न कर दिया था. जबरदस्त जीत से पार्टी को मनचाहे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने की खुली छूट मिल गई.
योगी आदित्यनाथ का चयन विचित्र भले लगा हो और गोरखनाथ मठ के महंत राजनीति में पराये जान पड़ते थे, पर जो दिखता था, वैसा था नहीं. 49 वर्षीय योगी राजनीति के लिए अजनबी नहीं थे. तपे-तपाए राजनेता 1998 में युवतम लोकसभा सांसद थे और 2014 तक लगातार पांच बार गोरखपुर की नुमाइंदगी कर चुके थे. सत्ता में पांच साल पूरे करने के बाद भी वे 51 साल की उम्र में मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी के मुकाबले युवा हैं. योगी के कंधों पर जिम्मेदारियां कहीं बड़ी हैं. उत्तर प्रदेश में दोबारा चुनकर आना पार्टी के अच्छे राजकाज और हिंदुत्व के मॉडल को वैधता दिलाएगा. यह देखते हुए कि 2017 राज्य का आखिरी बड़ा चुनाव था जो भाजपा ने निर्णायक ढंग से जीता, बड़ी जीत पार्टी को ऐसा ज्वार पैदा करने में मदद करेगी जो राज्यों के अन्य चुनावों में शायद उसकी नैया पार लगा दे. 2022 के मध्य में राष्ट्रपति चुनाव से पहले राज्यसभा में अपना संख्याबल बढ़ाने के लिए भी उसे विधायकों की जरूरत है.
भारत में चुनावों की सरगर्मी शुरू हो गई है और 2024 के लोकसभा चुनाव तक चलेगी. अब से मई 2024 के बीच 16 राज्यों में चुनाव होंगे. उनमें चुनाव की दृष्टि से उत्तर प्रदेश सबसे अहम है, जो उन पांच राज्यों में से एक है जहां मतदान का पहला दौर 10 फरवरी को शुरू होगा. 80 लोकसभा सीट और 31 राज्यसभा सांसद चुनने वाले 403 विधायकों के साथ यह राज्य भारत के संसदीय लोकतंत्र का धड़कता हुआ दिल है. भारत के 15 में से नौ प्रधानमंत्री इसी राज्य से चुनकर लोकसभा में पहुंचे. हालिया इतिहास में यह भारत के दो सबसे बड़े राजनैतिक आंदोलनों का आरंभबिंदु रहा—मंदिर आंदोलन जिसने भाजपा के उत्थान की पटकथा लिखी और मंडल आंदोलन जिसने बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी सरीखी जाति-आधारित पार्टियों के उभार को बल दिया. बेहिचक कहा जा सकता है कि जो भी पार्टी राज्य में दबदबा कायम करेगी, भारतीय राजनीति के भावी सफर को दिशा दिखाएगी.
यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह से बेहतर कोई नहीं जानता. अयोध्या आंदोलन ने भाजपा को उछालकर 1984 में दो सीट से 1991 में 120 सीटों पर पहुंचा दिया. 2014 में मोदी ने वाराणसी से चुनाव लड़ा, तो शाह राज्य के पार्टी प्रभारी थे. भाजपा ने राज्य की 80 में से शानदार 71 सीटें जीतीं, जो उसकी कुल 282 सीटों का 25 फीसद थीं. यह आंकड़ा 2019 में घटकर उत्तर प्रदेश की 62 सीटों पर आ गया, तो भी ये भाजपा की कुल 303 सीटों की 20 फीसद थीं. इस बार पार्टी अपने मूल मतदाताओं के बीच हिंदुत्व पर बल देने के लिए राम मंदिर निर्माण और काशी के पुर्नविकास का सहारा ले रही है.
भाजपा का चुनावी अफसाना आर्थिक विकास के उस योगी-मोदी 'डबल इंजन मॉडल' पर जोर दे रहा है, जिसे पूरे तालमेल से काम कर रहे दोनों करिश्माई नेताओं ने अपनाया है. वे अब भी अपनी जनकल्याणवाद की आक्रामक रणनीति पर निर्भर हैं, जिसमें महामारी के दौरान मुफ्त अनाज देना, सस्ते घर देना, किसानों के भारी बकाये चुकाना और गरीबों पर केंद्रित अन्य कई योजनाएं शामिल हैं. जहां चुनाव हों, जाति का गुणा-भाग भला कैसे पीछे रह सकता है, खासकर उत्तर प्रदेश में. भाजपा ने अपने पारंपरिक ब्राह्मण-बनिया आधार का विस्तार करते हुए निषाद सरीखे अन्य पिछड़े वर्गों को रिझाने के लिए बड़ी मेहनत की. उसने अति पिछड़े वर्गों से आए दो बड़ी जाति-आधारित पार्टियों के नेताओं को विकसित करने की कोशिश की.
योगी के खिलाफ उतने ही विविध प्रतिद्वंद्वियों ने मोर्चा संभाल रखा है—राजनैतिक वंशज अखिलेश यादव, जयंत चौधरी और प्रियंका गांधी और बसपा की प्रमुख मायावती. हालांकि अखिलेश सबसे बड़े चैलेंजर हैं, जिन्होंने लगता है, जाहिरा तौर पर बहुध्रुवीय मुकाबले को दो पार्टियों की लड़ाई में बदल लिया है. सपा के युवा वंशज ने, जो कार्यकाल पूरा करने वाले केवल दूसरे मुख्यमंत्री थे, 2017 का चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा. 2019 के आम चुनाव में उन्होंने बसपा को भी गठबंधन में जोड़ लिया. लेकिन दोनों बार वे नाकाम रहे. नए सिरे से ढली अपनी रणनीति में इस बार वे अकेले लड़ रहे हैं. केवल जाट बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी से हाथ मिलाया है.
वे मुस्लिम-यादव वोटों पर भरोसा कर सकते हैं, जिसकी बदौलत उनके पिता ने तीन अलग-अलग बार राज्य पर हुकूमत की. मुसलमान राज्य की आबादी के 20 फीसद हैं और इस संख्या का आधा भी उन्हें जीतने में मदद कर सकता है. उन्होंने तीन अहम ओबीसी नेताओं को लुभाकर भाजपा को स्तब्ध कर दिया. जाति का खेल वे भी खेल रहे हैं—छह छोटी पार्टियों के साथ जुड़कर उन्होंने पारंपरिक वोट बैंक का विस्तार किया. यह तथ्य कि चुनाव आयोग ने तीन हफ्तों के लिए रैलियों पर रोक लगा दी, जिसे बढ़ाया भी जा सकता है, अखिलेश के पक्ष मंय काम कर सकता है, क्योंकि इसने भाजपा से उसका सबसे बड़ा हथियार छीन लिया. वह हथियार है—मोदी की रैली. महामारी से भी योगी को मदद नहीं मिली. सरकार सत्ता विरोधी भावना से जूझ रही है और पिछले साल गंगा में तैरते कोविड के मृतकों के शवों की उन तस्वीरों से भी जिन्हें भुला पाना मुश्किल है.
हमारी आवरण कथा 'मैं कभी हारा नहीं' उस शख्स की नजर से इस मुकाबले को देख रही है जिस पर भाजपा की चुनावी रणनीति का दारोमदार है. इसे विशेष संवाददाता प्रशांत श्रीवास्तव के साथ ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा ने लिखा है. योगी जीतते हैं, तो वे इतिहास बना देंगे और 1985 के बाद लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए चुने जाने वाले उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बन जाएंगे. चुनावी जीत योगी के लिए राष्ट्रीय राजनीति में छलांग लगाने का आधार बन सकती है.
फुसफुसाहटों की मानें तो योगी प्रधानमंत्री के पद पर नरेंद्र मोदी की जगह लेने के दावेदार बन सकते हैं जो बहुत दूर की बात नहीं है. हमारा देश का मिज़ाज सर्वेक्षण असल में उन्हें मोदी के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में गृह मंत्री अमित शाह के बिल्कुल बराबर दिखाता है. यह देखना अभी बाकी है कि यह छुपा रुस्तम कितनी दूर जाएगा. क्या वे भाजपा के तारणहार होंगे? पांच साल पहले मुख्यमंत्री के रूप में उनके राजतिलक की तरह, राजनीति में कुछ भी हो सकता है.