खुशीः उम्मीद की छांव
प्रोत्साहन इंडिया फाउंडेशन जोखिम से घिरी किशोरियों की सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार के लिए काम कर रहा है.

खुशी की खोज
सोनल कपूर, 36 वर्ष
संस्थापक, प्रोत्साहन इंडिया
दिल्ली
यह हाल में एक गुरुवार की दोपहर की बात है. प्रोत्साहन इंडिया फाउंडेशन की 36 वर्षीया संस्थापक सोनल कपूर के साथ किशोरियों की एक कक्षा चल रही है. यह पश्चिम दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में फाउंडेशन का एक केंद्र है. कक्षा इसकी छत पर चल रही है. लड़कियां आठ से 18 साल के बीच की हैं. वे साधनहीन परिवारों से आई हैं.
उन्होंने यौन दुर्व्यवहार सहित कई तरह की हिंसा का सामना किया है या झेल रही हैं. फिर भी वे जिंदगी के जोश और जज्बे से भरी हैं. उनकी आंखों में चमक और होठों पर मुस्कान है. उनसे बात करें तो पता चलता है कि उनमें से हरेक का एक सपना है. कपूर और उनकी टीम उसी सपने को पूरा करने में मदद कर रही हैं: वे ताकतवर हों, पढ़ पाएं, उनके स्वास्थ्य की ठीक से देखभाल हो, उन्हें पलने-बढ़ने का सुरक्षित माहौल मिले.
कपूर के साथ उनकी यह कक्षा करीब एक घंटे की है. इसमें उन्हें प्रेरित किया जाता है. ध्यान और सांस की कुछ कसरतें करवाई जाती हैं. सोनल बताती हैं कि लक्ष्य हासिल करने के लिए कार्योन्मुख और बदलावकारी नजरिए की जरूरत है. वे कहती हैं, ''मैं लड़कियों को सिखाती हूं कि शिक्षा, आत्मसम्मान और बहादुरी लड़कियों की पूंजी है.’’
प्रोत्साहन फाउंडेशन का अपने लक्ष्य हासिल करने का तरीका अनूठा है. उसके सिद्धांत अंग्रेजी के एचईएआरटी या 'हार्ट’ में झलकते हैं, जो हीलिंग (जख्म भरना), एम्पावरमेंट (सशक्तिकरण), आर्ट (कला), रिकवरी (बहाली) और टेक्नोलॉजी के शुरुआती अक्षरों से मिलकर बना है. यह समानुभूति पर आधारित तरीका है. इसका मकसद शिक्षा और रचनात्मक कलाओं के जरिए और जिंदगी के नए हुनर सिखाने के लिए टेक्नोलॉजी के संसाधनों तक पहुंच मुहैया करके उन्हें सदमे से उबारना है.
फाउंडेशन के केंद्रों पर उसकी कामयाबी के सबूत मिलते हैं. मसलन, एक दीवार पर प्राकृतिक दृश्य और बेलबूटे चित्रित हैं. शराब की बोतलें गुलदान बन गई हैं. कुर्सी को कागज से बने और दूसरे शिल्पों से सजाया गया है. कपूर बताती हैं, ''हमारा इरादा है कि हम जिन लड़कियों के साथ काम कर रहे हैं, वे कला से खुद को व्यक्त करते हुए दर्द और सदमे से उबरें.’’
फाउंडेशन 2010 में पश्चिम दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती से शुरू हुआ था. आज देश भर में इसके केंद्र हैं. इसने 948 लड़कियों को बदसुलूकी से बचाया. स्कूलों में उनके नाम लिखवाने में मदद की. करीब 20,000 लड़कियों को बाल अधिकारों के प्रति जागरूक किया, बच्चों के साथ होने वाले यौन दुर्व्यहारों को रोकना सिखाया और माहवारी में साफ-सफाई सरीखी व्यावहारिक जानकारियां दीं. 200 लड़कियों को उद्यमिता जीवन कौशल का प्रशिक्षण दिया. आज फाउंडेशन विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए भारत भर की करीब 80,000 लड़कियों से जुड़ा है.
कपूर कहती हैं, ‘‘हम लड़कियों को रचनात्मक किस्म की आर्ट थेरेपी से ताकतवर बनाते हैं. इसमें कंप्यूटरों का इस्तेमाल, फिल्म मेकिंग, फोटोग्राफी, डिजाइन और ध्यान भी हैं.’’ करीब 80 लड़कियों को वेडिंग फोटोग्राफर बनने का प्रशिक्षण दिया गया तो करीब 11,000 ने लैंगिक हिंसा और बाल विवाह सरीखे मुद्दों पर शॉर्ट फिल्में बनाईं, फोटोग्राफी की, नाटक तैयार किए और कठपुतली शो किए. फाउंडेशन में एक प्रोजेक्ट एजुकेयर-द हब भी है.
यह जोखिम से घिरी कम उम्र लड़कियों के लिए जमीनी स्तर पर सीधी कार्रवाई आधारित है. दूसरा है प्रोजेक्ट इनोसेंस—द स्पोक्स. यह प्रोजेक्ट एजुकेयर की सीख आगे ले जाता है और संस्थाओं तथा संगठनों के साथ भागीदारी में काम करता है. एक और है प्रोजेक्ट लाइट बल्ब. इसमें विशेषज्ञ और वालंटियर संस्था की लड़कियों को रोजगार परक हुनर सिखाते हैं. कपूर कहती हैं, ''हम मानते हैं कि बदसुलूकी का चक्र तोड़ने के लिए लड़कियों को सही तालीम देनी चाहिए.’’
पूरी कोविड महामारी के दौरान प्रोत्साहन ने तनावग्रस्त बच्चों पर विशेष ध्यान देते हुए झुग्गी के समुदायों को राहत पहुंचाने का काम किया. दिल्ली, तमिलनाडु, राजस्थान, ओडिशा, झारखंड और असम में फाउंडेशन ने अपना काम 15 झुग्गी बस्तियों से बढ़ाकर संघर्षरत 48 झुग्गी समूहों में फैला लिया.
कपूर कहती हैं, ''प्रोटीन से भरपूर सूखा राशन मुहैया करवाकर हमने पक्का किया कि लड़कियों की पोषण की जरूरतें पूरी हों.’’ स्कूल बंद थे और कक्षाएं ऑनलाइन लगने लगी थीं, इसलिए फाउंडेशन ने अपने बाल सुरक्षा केंद्रों की लड़कियों के लिए मुमकिन बनाया कि उनके पास डिजिटल डिवाइस हों और वे पढ़ाई जारी रख सकें. 4,12,350 गर्म खाने और साथ ही सूखे खाने के 1,61,781 से ज्यादा पैकेट मुहैया किए.
3,610 से ज्यादा लोगों को मनोवैज्ञानिक सहायता दी गई. फाउंडेशन ने कोविड में परिजनों को गंवा देने वाले लोगों के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक पीड़ा और परामर्श सत्रों का आयोजन किया. उसने कुछ सबसे ज्यादा साधनहीन इलाकों में खेल और कला को मिलाकर बाल अनुकूलन क्षेत्र स्थापित किए. साथ ही, रचनात्मक किस्सागोई के सत्र भी आयोजित किए.
इन पहलकदमियों के खातिर प्रोत्साहन ने अपने डिजिटल दान अभियान के लिए मिशन शक्ति फाउंडेशन (द मार्था फारेल फाउंडेशन), पझरा, शेड्स ऑफ हैपीनेस फाउंडेशन और डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन के साथ भागीदारी की. प्रोत्साहन ने यूनिसेफ की सहायता से मनोवैज्ञानिक सहायता देखभाल नियमावली भी बनाई है.
खुशी की खोज: इंडिया टुडे और आरपीजी ग्रुप का संयुक्त उद्यम जो प्रसन्नता फैलाने की अनुकरणीय पहल का उत्सव मनाता है
खुशी का मंत्र
''आमोद-प्रमोद और खुशी में बड़ा अंतर है. खुशी सतत यात्रा है न कि तात्कालिक संतुष्टि’’
—शैली आनंद