चूकता ब्रह्मास्त्र

हाल में संपन्न हुए चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनावों में ध्रुवीकरण की लंबे समय से की जा रही कोशिशें अपेक्षित कामयाबी नहीं दे पाईं, तो, क्या ध्रुवीकरण का आकर्षण मतदाताओं में कम होने लगा?

ध्रुवीकरण का दांव नाकाम कोलकाता में दुर्गा पुजा विसर्जन
ध्रुवीकरण का दांव नाकाम कोलकाता में दुर्गा पुजा विसर्जन

पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा का आखिरी नारा 'कृष्णा-कृष्णा हरे हरे, भाजपा घरे-घरे' था. यह नारा हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों के दौरान ही नहीं लिखा गया, बल्कि सितंबर 2017 में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को लेकर शुरू हुई सियासत के वक्त भाजपा ने बंग भूमि में अपना झंडा फहराने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण की जो रणनीति अपनाई थी, उसका क्लाइमैक्स इस नारे के रूप में सामने आया था. लेकिन पार्टी का यह ब्रह्मास्त्र बंगाल में पूरी तरह से चूक गया. ध्रुवीकरण की सियासत में सिद्धहस्त भाजपा के लिए न सिर्फ बंगाल बल्कि बिहार और केरल जैसे राज्यों में भी यह ब्रह्मास्त्र अब उतना प्रभावी नहीं दिख रहा है. ऐसा नहीं है कि ध्रुवीकरण की राजनैतिक लौ सिर्फ भाजपा के लिए धीमी पड़ती जा रही है, बल्कि अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाले भाजपा विरोधी दलों के लिए भी यह कम कारगर होता दिख रहा है. कम से कम पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से तो यही संकेत निकल रहा है.

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पिछली सरकार में वित्त मंत्री रहे अमित मित्रा कहते हैं, ''भाजपा की राजनीति धार्मिक और जातिगत ध्रुवीकरण पर ही टिकी है. संघ जब कहता है कि भारत हिंदू राष्ट्र है और उस पर कोई समझौता नहीं हो सकता है तो मंशा एकदम साफ है.'' भाजपा ने मामूली जनाधार वाले राज्यों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए बहुसंख्यक (हिंदू) भावनाओं को शह देने में कभी परहेज नहीं किया.

भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी के प्रभावी होने के बाद इस दिशा में पहली बार अप्रैल 2017 में भुवनेश्वर में हुई पार्टी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में विस्तृत रणनीति तैयार की गई थी. कार्यकारिणी में पार्टी ने यह तय किया था कि तटीय राज्यों (जिसे कोरोमंडल क्षेत्र कहा गया) में पार्टी के पैर जमाने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष (तब शाह ही अध्यक्ष थे) सहित वरिष्ठ नेता नियमित रूप से प्रवास करेंगे. कार्यकर्ताओं से भी कहा गया था कि वे अपना समय उन राज्यों में देने के लिए आगे आएं, जहां पार्टी मजबूत स्थिति में नहीं है.

राजनैतिक मामलों के जानकार एन. अशोकन कहते हैं, ''अप्रैल 2017 के बाद भाजपा ने मुख्य रूप से दो राज्यों पश्चिम बंगाल और केरल में फोकस किया. इन राज्यों में ध्रुवीकरण की हर संभव कोशिश की गई और भाजपा माहौल बनाने में सफल भी रही.'' सितंबर 2017 में पश्चिम बंगाल में दुर्गा मूर्ति विसर्जन को लेकर पहली बार भाजपा ने तब हंगामा खड़ा किया, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोहर्रम के जुलूस के दिन मूर्ति विसर्जन पर पाबंदी लगा दी. पाबंदी लगते ही पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा था, ''क्या बंगाल धीरे-धीरे तालिबानी शासन की तरफ बढ़ रहा है? स्कूलों में सरस्वती पूजा रोकी जा रही है. दुर्गा पूजा के बाद प्रतिमा विसर्जन रोक दिया जाता है.''

उसके बाद तो भाजपा ने ममता बनर्जी को हिंदू विरोधी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कभी दुआ मांगती ममता की तस्वीर वायरल की गई तो कभी भाजपा ने मदरसे के शिक्षकों का भत्ता बढ़ाने का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया. 2021 का चुनाव आते-आते भाजपा ने राज्य में अभिवादन के लिए राम-राम कहना शुरू कर दिया. चुनाव प्रचार के दौरान राज्य में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 'लव जिहाद' से लेकर 'रोमियो स्क्वायड' बनाने तक की बात करके ध्रुवीकरण का माहौल बनाने की कोशिश की. भाजपा सिर्फ बंगाल में ही लंबे समय से ध्रुवीकरण की कोशिश में नहीं लगी रही. राजनैतिक टीकाकार शंखदीप दास कहते हैं, ''फरवरी 2018 में विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या से रामेश्वरम तक की रामराज्य रथयात्रा निकाली. यह यात्रा 11 राज्यों से गुजरी, जिसमें केरल और तमिलनाडु शामिल हैं. कई जगह भव्य आयोजन हुए और जयश्री राम का नारा गूंजता रहा.''

लेकिन ध्रुवीकरण का माहौल तैयार करने की ये लंबी कोशिशें भाजपा को अपेक्षित चुनावी सफलता नहीं दिला पाईं. टीएमसी नेता डेरेक ओ'ब्रायन कहते हैं, ''बंगाल के नतीजों ने साफ कर दिया कि भाजपा तमाम कोशिशों के बाद भी हिंदू वोटों को अपने पक्ष में करने में नाकाम रही. हर धर्म और जाति के लोगों ने टीएमसी को वोट दिया.'' ओ'ब्रायन कहते हैं, ''न सिर्फ भाजपा बल्कि वाम दलों के गठबंधन ने भी अल्पसंख्यक वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की. लेफ्ट-कांग्रेस और फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दकी की ध्रवीकरण की कोशिश को भी लोगों ने नकार दिया.''

ध्रुवीकरण का हथियार केरल में भी नहीं चल सका. वहां भाजपा को उम्मीद थी कि पार्टी के प्रत्याशी दहाई की संख्या में जीतेंगे लेकिन हुआ यह कि 2016 के चुनावों में मिली एक सीट भी गंवा बैठी. राज्य में भाजपा ने 'लव जिहाद' का मुद्दा उठाकर ईसाई मतदाताओं को रिझाने की कोशिश भी की. केरल की स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा कहती हैं, ''न सिर्फ भाजपा बल्कि कांग्रेस भी ध्रुवीकरण की कोशिशों में लगी रही. सबरीमला प्रकरण में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ध्रुवीकरण के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी लेकिन लोगों ने राज्य सरकार के कामकाज को तरजीह दी और ध्रुवीकरण को नकार दिया.''

ध्रुवीकरण का हथियार असम में भी कारगर नहीं हुआ. यहां कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल के साथ हाथ मिलाकर मुस्लिम वोटों की ध्रुवीकरण की कोशिश की लेकिन यह सफल नहीं हो सकी. राष्ट्रीय जनता दल के नेता मनोज झा कहते हैं, ''2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों में भी चुनाव हुए हैं, ज्यादतार में भाजपा की धु्रवीकरण की कोशिशें सफल नहीं हुईं.'' झा यह तो मानते हैं कि धु्रवीकरण का हथियार कुंद पड़ता जा रहा है लेकिन वे कहते हैं, ''भाजपा छोड़ेगी नहीं, बल्कि इसे और धारदार बनाएगी, ताकि अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव में काम आ सके.''

अगले साल के शुरुआती महीनों में ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती ध्रुवीकरण के हथियार की धार तेज करने की है. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा में भाजपा की सरकार है. कोविड की दूसरी लहर ने केंद्रीय और राज्य नेतृत्व में भरोसे को काफी हद तक कम कर दिया है. ढहती अस्पताल की व्यवस्था, न थमता मौत का सिलसिला, ऑक्सीजन और इलाज के लिए भटकते लोग. ऐसे मार्मांतक हालात में सत्ताधारी दल शायद ही विकास के लिए अपनी पीठ थपथपा कर वोट मांगने की हिम्मत कर सकें. उत्तर प्रदेश की पंचायत चुनाव के नतीजे भी संकेत दे रहे हैं. भाजपा के एक नेता स्वीकार करते हैं, ''मौजूदा स्थिति काफी नाजुक है. चुनाव अभियान की शुरुआत इसी साल के अंत तक पार्टी को करनी होगी और कुछ नया करना होगा तभी वापसी की सोच सकते हैं.''

बहरहाल, राम मंदिर बनने की प्रक्रिया शुरू होने से बहुसंख्यक समाज खुश जरूर है, लेकिन यह खुशी वोट में बदलेगी, इसको लेकर आश्वस्त होना सियासी लिहाज से उचित नहीं है. खासकर बंगाल में तीव्र धु्रवीकरण की कोशिशें नाकाम होने के बाद उस पर भरोसा करना कतई सही नहीं लगता है.

Read more!