उत्तर प्रदेशः देहात में फीका पड़ा कमल

पंचायत चुनाव में जनता ने भाजपा को अभूतपूर्व समर्थन दिया है. जनता ने एक बार फिर परिवारवाद व भ्रष्टाचार की राजनीति को नकारते हुए शुचिता व सुशासन को प्राथमिकता दी है

मतगणना लखनऊ में 2 मई को पंचायत चुनावों  के वोटों की गिनती
मतगणना लखनऊ में 2 मई को पंचायत चुनावों के वोटों की गिनती

वर्ष 2022 में प्रस्तावित उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव के नतीजे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के निराशाजनक रहे हैं. यह पहला मौका था जब प्रदेश की सभी राजनैतिक पार्टियों ने पंचायत चुनाव में अपने उम्मीवार उतारे थे. प्रदेश जिला पंचायत सदस्यों के 3,051 पदों पर जीत के लिए सभी राजनैतिक पार्टियों ने जोर आजमाइश की थी.

तीन स्तरीय पंचायत चुनाव नतीजे सामने आए तो यह स्पष्ट हो गया कि देहात के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को नुक्सान हुआ है. सत्तारूढ़ भाजपा ने जिला पंचायत सदस्य की 3,034 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें एक-तिहाई से कम 981 सीटों पर पार्टी जीत का दावा कर रही है. भाजपा ने मुख्य फोकस जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव पर किया था जिसके जरिए जिला पंचायत अध्यक्षों का चुनाव होना है. वर्ष 2015 के चुनाव में भाजपा 350 सीटों पर ही सिमट गई थी. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल के तौर पर देखे जा रहे पंचायत चुनाव ने यूपी की राजनीति के दो ध्रुवीय हो जाने की ओर भी इशारा किया है. करीब दो दशक बाद यह मौका आया था कि भाजपा अपने शासनकाल में पंचायत चुनाव में उतरी थी. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद पिछले वर्ष हुए विधानसभा उपचुनाव में धमाकेदार प्रदर्शन करने वाली भाजपा ने पंचायत चुनाव में अपना प्रदर्शन दोहरा न सकी.

पिछले साल दिसंबर से शुरू हुए किसान आंदोलन की तपिश को ठंड करने के लिए भाजपा ने हर संभव प्रयास किए थे. भाजपा पिछले एक साल से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के मद्देनजर व्यूह रचना कर रही थी. पंचायत चुनाव के पहले भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों को किसान आंदोलन के प्रभाव से बचाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की फौज उतार दी थी. बावजूद इसके भाजपा को पंचायत चुनाव के नतीजों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में आशा से विपरीत नतीजे मिले हैं. पंचायत चुनाव के प्रत्याशी भी भाजपा ने प्रदेश स्तर से काफी मंथन के बाद ही घोषि‍त किए थे. जो नतीजे आए हैं उनमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छह जिलो में जिला पंचायत सदस्यों के 220 वार्डों में भाजपा को 60 से कम सीटें ही मिली हैं. मेरठ जिले में भाजपा के छह विधायक, एक सांसद और दो राज्यसभा सदस्य, दो विधान परिषद सदस्य हैं.

यहां पर भाजपा 33 में से छह सीटें ही जीत पाई है. पिछले चुनाव में भाजपा के 10 सदस्य जीते थे. इस बार भाजपा का दावा 20 से ज्यादा सदस्यों के जीतकर आने का था. रालोद अध्यक्ष अजित सिंह के इलाके बागपत जिले में भी भाजपा पिछड़ गई है. बागपत में जिला पंचायत सदस्यों के 20 वार्डों में रालोद 9 ओर सपा, भाजपा को चार-चार सीटें मिली हैं. बिजनौर में भी भाजपा की दुगर्ति हुई है. यहां जिला पंचायत सदस्य के 56 वार्डों में सपा को 20, रालोद को चार, बसपा को पांच और भाजपा को केवल सात सीटें मिली है.

शुगर बाउल के नाम से जाना जाने वाले जिला मुजफ्फरनगर ने भाजपा को कुछ सुकून दिया. यहां की 43 सीटों में भाजपा ने सबसे ज्यादा 13 पर विजय हासिल की. पूर्व मुख्यमंत्री ओर वरिष्ठ भाजपा नेता कल्याण सिंह के गढ़ अलीगढ़ में भी भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं है. यहां जिला पंचायत चुनाव में भाजपा को उसके ही गढ़ अतरौली में कड़ी टक्कर मिली है. अतरौली विधानसभा क्षेत्र में अतरौली और बिजौली ब्लॉक को मिला कर जिला पंचायत के कुल आठ वार्ड हैं, जिसमें पार्टी सात वार्ड पर चुनाव हार गई है. केवल एक वार्ड पर जीत मिली है. अलीगढ़ जिला पंचायत के सभी 47 वार्डों पर प्रत्याशी उतारने वाली इकलौती भाजपा को जिले में कुल नौ सीटों पर जीत मिली है. अलीगढ़ इंटरमीडिएट कॉलेज के प्रवक्ता रमेश प्रताप बताते है, ''कृषि कानूनों के विरोध में किसान नाराज तो थे ही लेकिन 15 अप्रैल के आते-आते जैसे ही कोरोना का प्रकोप बढ़ा और भाजपा सरकार उसे थामने मे लाचार दिखी तो इसका असर पंचायत चुनाव के नतीजों पर देखा जा सकता है.

इसके अलावा भाजपा के स्थानीय नेताओं का अहंकार के चलते जनता से दूरी, बड़ी संख्या में दूसरी पार्टी से आए नेताओं को तवज्जो देना, पार्टी के भीतर गुटबाजी भी भाजपा के खराब प्रदर्शन की मुख्य वजहें हैं.'' इसके अलावा भाजपा ने पंचायत चुनाव में अपने सांसदों, विधायकों या अन्य जनप्रतिनिधि‍यों के घरवालों को टिकट न देने का निर्णय लिया था. ऐसे में इन नेताओं ने पंचायत चुनाव से अपने को तटस्थ कर दिया. पार्टी के अधीकृत उम्मीदवारों के पक्ष में खुलकर समर्थन नहीं दिया क्योंकि इन्हें स्थानीय राजनीति में एक अन्य केंद्र के उभरने का डर सता रहा था. पंचायत चुनाव ने भाजपा को वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा सबक दिया है.

विधानसभा चुनाव से पहले संगठन की अग्नि‍ परीक्षा में भाजपा को पूर्वांचल में भी निराशा ही हाथ लगी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पिछले वर्ष दिसंबर में विधान परिषद चुनाव (एमएलसी) में भाजपा को समाजवादी पार्टी (सपा) से करारी हार का सामना करना पड़ा था. एमएलसी चुनावों में मिली हार से भी भाजपा ने कोई सबक नहीं लिया. वाराणसी में एक बार फिर पंचायत चुनावों में सपा ने भाजपा पर अपनी बढ़त जाहिर कर दी है. वाराणसी में जिला पंचायत सदस्य की कुल 40 सीटों में से केवल सात पर मिली जीत ने भाजपा संगठन के अंदरूनी कलह से लेकर कमजोर संगठन पर से परदा हटा दिया है. अहम बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के हरहुआ, बड़ागांव और आराजी लाइन ब्लॉक में भाजपा खाता तक नहीं खोल पाई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले गोरखपुर में भी भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है. यहां पर जिला पंचायत सदस्यों की कुल 68 सीटों से भाजपा केवल 20 ही जीत पाई है.

इस प्रकार गोरखपुर में भाजपा को महज 30 फीसद सीटों पर विजय मिली है जो किसी भी लिहाज से सत्तारूढ़ दल के लिए उत्साहजनक नहीं है. गोरखपुर में संगठन के कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से भी पार्टी को नुक्सान पहुंचा है. गोरखपुर में जिला पंचायत सदस्य की छह सीटों पर भाजपा के बागी कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और भाजपा उम्मीदवार पर विजय हासिल की. गोरखपुर भाजपा के जिलाध्यक्ष युधि‍ष्ठिर सिंह कहते हैं, ''जिला पंचायत सदस्य के लिए उम्मीवारों का चयन पार्टी ने पूरी पारदर्शिकता के साथ किया था. यही वजह है कि पार्टी ने पिछले पंचायत चुनाव के मुकाबले इस बार आठ सीट की बढ़त हासिल की है.''

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और बड़े पैमाने पर विकास कार्य की शुरुआत भी ग्रामीण इलाकों में भाजपा की राह मजबूत नहीं कर पायी है. यहां जिला पंचायत सदस्य की कुल 40 सीटों में से भाजपा केवल 8 ही जीत पाई है. अयोध्या में पार्टी के कई बड़े नेताओं को मतदाताओं ने नकार दिया है. यहां पार्टी के पराजित हुए नेताओं में पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष अवधेश पांडेय बादल, जिला उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार पांडेय और विधायक रामचंद्र यादव के करीबी कमलेश यादव प्रमुख हैं. अयोध्या भाजपा संगठन के एक पदाधि‍कारी बताते हैं, ''अयोध्या में भाजपा की हार की एक बड़ी वजह कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं की उपेक्षा रही. इससे कार्यकर्ता उत्साहहीन रहा और भाजपा को कई सीटों पर हजारों मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा.''

पंचायत चुनाव में भाजपा ने प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगा दी थी. अगर पंचायत चुनाव के नतीजों को मंत्रियों के प्रभाव का पैमान माना जाए तो प्रदेश सरकार में पंचायती राज मंत्री भूपेंद्र चौधरी को करारा झटका लगा है. मुरादाबाद में भूपेंद्र चौधरी के पैतृक गांव महेंद्री सिकंदरपुर वाले वार्ड में सपा समर्थित प्रत्याशी को जीत मिली जबकि भाजपा समर्थि‍त प्रत्याशी तीसरे नंबर पर आया. हालांकि भूपेंद्र सिंह पंचायत चुनाव के नतीजों को संतोषजनक मानते हैं. वे कहते हैं, ''हमें सभी सीटें जीतनी चाहिए थी, लेकिन गांव स्तर के इन चुनावों में विकास, मुद्दे और अनुशासन किनारे रह जाते हैं, जबकि जाति और सामाजिक आधार पर वोट बंट जाते हैं.'' अब देखना है कि निर्दलीयय उम्मीवारों को अपने पाले में जुटाकर भाजपा कितने जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमा पाती है.

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