केरलः अब यहां एकछत्र राज

केरल में वाम मोर्चे की लगातार दूसरी जीत से पिनाराई विजयन की राज्य में एक के बाद एक संकटों से निबटने की काबिलियत और राजनैतिक अफसाने पर मजबूत पकड़ साबित हुई

पिनाराई लहर अप्रैल में कन्नूर में अपने गांव पिनाराई में चुनावी रोडशो के दौरान मुख्यमंत्री
पिनाराई लहर अप्रैल में कन्नूर में अपने गांव पिनाराई में चुनावी रोडशो के दौरान मुख्यमंत्री

मतदान-बाद जनमत सर्वेक्षणों (एग्जिट पोल) ने केरल में वाम मोर्चे की सत्ता में वापसी का अनुमान तो जताया था, लेकिन उसके कट्टर समर्थकों ने भी ऐसी निर्णायक जीत की कल्पना नहीं की थी. राज्य में माकपा की अगुआई वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) को बारी-बारी से सरकार बनाने का मौका देने का चार दशक से चली आ रही परंपरा टूटी, और 75 वर्षीय पिनराई विजयन को सत्ता मिली. यही नहीं, सत्तारूढ़ गठजोड़ को 2016 के चुनावों से आठ अधिक सीटें मिलीं और कुल 140 सदस्यों की विधानसभा में उसके 99 सदस्य हैं.

इस जीत से पिनराई माकपा में जनाधार वाले निर्विवाद नेता बन गए हैं. इस जीत से न सिर्फ सरकार विरोधी रुझान परास्त हुआ, बल्कि सोने की कथित तस्करी जैसे भ्रष्टाचार के आरोप, सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मसले पर सरकारी रवैये और हर रोज बढ़ते कोविड संक्रमण से कथित नाराजगी भी दब गई. इस प्रक्रिया में विपक्षी यूडीएफ 41 सीटों तक सीमित हो गया और कांग्रेस सिर्फ 21 सीटें ही जीत सकी. भाजपा की अगुआई वाले एनडीए की हालत तो और पतली हो गई. भाजपा 2016 में जीती इकलौती नेमोम सीट भी नहीं जीत पाई. चुनाव के कुछ दिन पहले ही पिनराई ने कहा था, ''2016 में भाजपा ने नेमोम सीट के साथ अपना खाता खोला था. हम इस बार वह खाता भी बंद कर देंगे.'' आखिर में वही हुआ और इसके साथ एलडीएफ में माकपा की सीटों की संख्या 67 सीटों तक पहुंच गई.

यह जीत कोई अचानक हाथ नहीं लग गई है. पिनराई ने अपने सियासी विरोधियों की मजबूती और कमजोरी का हर बिंदु पर विचार किया. इसके मद्देनजर उन्होंने रणनीति तैयार की और केरल में एलडीएफ का जनाधार बढ़ाने के लिए कई गठजोड़ किए. लगातार दो साल (2018 और 2019) भारी बाढ़, निपाह वायरस के प्रकोप और कोविड-19 के संक्रमण के दौरान उनकी सरकार के कामकाज को सराहा गया. इन संकट के दौर में उनकी छवि भी अक्खड़ से मददगार नेता के रूप में बदली. महामारी के दौर में हर रोज प्राइम टाइम टीवी पर उनकी बातों को लोगों ने दिलचस्पी से सुना और उनकी छवि वोटरों में अच्छी हुई.

पहले एलडीएफ सरकार में काम कर चुके एक पूर्व मुख्य सचिव के मुताबिक, पिनराई 2016 में सत्ता में पहुंचने के बाद ही दूसरे कार्यकाल को लेकर गंभीर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने अपने राजकाज की शैली के खातिर सैकड़ों विशेषज्ञों से बात की. पूर्व अफसरशाह कहते हैं, ''उन्होंने केरल में बदलाव, जीवन स्तर में सुधार और नई कसौटियां स्थापित करना चाहा. उनकी पहल ने राज्य और माकपा को भी अच्छा फायदा दिलाया.''

यकीनन, पिनराई ने सुशासन में अच्छी छाप छोड़ी. अच्छी सड़कें बनाईं, सरकारी स्कूलों को बदलने और सरकारी स्वास्थ्य सेवा में बड़े पैमाने पर सुधार की पहल की. इससे महामारी पर काबू पाने में राज्य को मदद मिली और आज भी बहुत सारी जिंदगियां बचाई जा रही हैं (केरल में मृत्यु दर देश में सबसे कम है). लेकिन सिर्फ सुशासन के सहारे ही एलडीएफ दोबारा सत्ता में नहीं पहुंचा, पिनराई की सियासी चतुराइयां भी काम आईं. मसलन, केरल कांग्रेस (मणि) और लोकतांत्रिक जनता दल से गठजोड़ से मध्य और उत्तर केरल में एलडीएफ का दायरा बढ़ गया.

वैसे, मुख्यमंत्री ने एलडीएफ के राजनैतिक जोड़तोड़ पर ज्यादा जोर नहीं दिया. उसका सामना परंपरागत प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के साथ भाजपा के बढ़ते खतरे से जो था (भाजपा को 2016 में 15 फीसद वोट मिल गया था). अपने गृह क्षेत्र में करीब 51,000 वोटों से जीतने के बाद कन्नूर जिले के धर्माडोम में पिनराई ने कहा, ''हमने केरल के लोगों पर भरोसा जताया और लोगों ने दिल खोलकर समर्थन किया.'' एलडीएफ की रणनीति काम कर गई. इस चुनाव में उसकी वोट हिस्सेदारी बढ़कर 45.2 फीसद हो गई. यूडीएफ का वोट भी थोड़ा बढ़कर 39.4 फीसद हो गया. उधर, भाजपा नीत एनडीए का वोट घटकर 12.4 फीसद हो गया.

भारी जनादेश से माकपा को राज्य में अपना जनाधार मजबूत करने में मदद मिलेगी. पार्टी में कद बढ़ने से विजयन अब मंत्रियों के चयन में स्वतंत्र होंगे. 2016 में उन्हें डॉ. थामस आइजैक, जी. सुधाकरन, टी.पी. रामकृष्णन, एम.एम. मणि, ए.के. बालन और ई.पी. जयराजन जैसे वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह देनी पड़ी थी. लेकिन इस बार उनकी टीम में के.के. शैलजा, के. राधाकृष्णन और ए.सी. मोइदीन जैसे पूर्व मंत्रियों के साथ के.एन. बालगोपाल, पार्टी केंद्रीय कमेटी के सदस्य एम.वी. गोविंदन और पूर्व सांसद एम.बी. राजेश जैसे नए चेहरे भी होंगे. सूत्रों के मुताबिक, पिनराई अपनी दूसरी पारी की प्राथमिकताओं के बारे में एकदम स्पष्ट हैं. वे सरकार की जीवन मिशन परियोजना के तहत गरीबों के लिए 3,00,000 मकान और बनाने पर जोर देंगे. इसके अलावा राष्ट्रीय राजमार्गों के साथ पर्वतीय और तटीय राजमार्गों को चौड़ा करने के लिए जमीन अधिग्रहण की बड़ी परियोजनाओं पर ध्यान देना है.

कांग्रेस के लिए यह नेतृत्व परिवर्तन का वक्त है. पार्टी एलडीएफ सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोपों को नहीं भुना सकी. केरल के वायनाड से सांसद राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी के दौरे भी कोई फर्क नहीं डाल सके. कांग्रेस में एक तबका पहले से ही असंतुष्ट है, जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मुल्लापल्ली रामचंद्रन और विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला को पद से हटाना चाहता है. जाहिर है, कांग्रेस में अगले कुछ महीनों तक कलह हावी रहेगा. यूडीएफ की घटक छोटी पार्टियां शायद छिटककर एलडीएफ की ओर चली जाएं. लंबे वक्त तक ऐसा रहा तो कांग्रेस को राज्य में अस्तित्व के संकट से गुजरना पड़ सकता है.

राज्य में इस बार भाजपा का प्रदर्शन उसे लंबे वक्त तक सालता रहेगा. जोरदार प्रचार अभियान और दो क्षेत्रों में करीबी मामलों के बावजूद पलक्कड में 'मेट्रो मैन' ई. श्रीधरन के सामने से यूडीएफ के सफी परमबिल जीत उड़ा ले गए और मंचेश्वरम में यूडीएफ के ही ए.के.एम. अशरफ ने राज्य भाजपा अध्यक्ष के. सुरेंद्रन को हरा दिया. पार्टी को इस बार मिला शून्य काफी परेशान करेगा. केंद्रीय नेतृत्व ने धनबल, बाहुबल और धुआंधार प्रचार का कोई टोटा नहीं होने दिया था. भाजपा के राज्य नेतृत्व ने 10 या अधिक सीट जीतने की महत्वाकांक्षी तस्वीर पेश की थी. सो, राज्य में पार्टी की संभावनाएं बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दर्जन भर केंद्रीय मंत्री राज्य में लगातार चक्कर लगाते रहे. लेकिन सब बेकार गया.

यह सही है कि पिनराई ने पिछले पांच साल में साबित किया है कि राजकाज चलाने के लिए उन्हें किसी टीम की जरूरत नहीं. सरकार का सामूहिक प्रदर्शन (कुछेक मंत्रियों को छोड़कर) 20 फीसद से भी कम था क्योंकि मुख्यमंत्री फैसला लेने वाले इकलौते शख्स थे. मुख्यमंत्री कार्यालय सभी अहम फाइलों की मॉनिटरिंग करता था. लेकिन इस बार उन्हें विधानसभा में दमदार टीम की जरूरत है क्योंकि विपक्ष में अनुभवी विधायकों की भरमार है. नई सरकार का पहला एजेंडा कोविड संकट से निपटना होगा.

राज्य में 3 मई को 26,011 नए मामले आए थे. इसकी रोकथाम के लिए लोगों और वाहनों की आवाजाही पर पाबंदियां 4 मई से शुरू हैं. राज्य का खस्ताहाल खजाना भी सरकार की दूसरी बड़ी चिंता होने वाली है. यह भी आशंका है कि केंद्र कई मुद्दों और योजनाओं में अड़चन पैदा करेगा. एक चुनौती यह भी है कि अरब देशों में आप्रवासियों के लिए काम के तौर-तरीके कड़े होने से वहां से लौटने वाले केरलवासियों को रोजगार कैसे मुहैया कराया जाएगा. बेशक, पिनराई ने कुछ पुख्ता रणनीतियां तैयार की होंगी.

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