प्रधान संपादक की कलम से

प्रधानमंत्री मोदी ने 28 जनवरी, 2021 को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में बड़े गर्व से ऐलान किया, ''दुनिया की 18 फीसद आबादी वाले देश ने कोरोना पर प्रभावी ढंग से काबू पाया और मानवता तथा दुनिया को महा दुर्भाग्य से बचा लिया.’’

28 फर., 1989 का आवरण, 2 दिसं, 1998 का आवरण, 23 अप्रैल, 2014 का आवरण
28 फर., 1989 का आवरण, 2 दिसं, 1998 का आवरण, 23 अप्रैल, 2014 का आवरण

अरुण पुरी

नरेंद्र मोदी ने 16 मई, 2014 की ऐतिहासिक जीत से खुद को और अपनी पार्टी को ताकतवर बना लिया था. गठजोड़ सरकारों के 25 साल बाद किसी इकलौती पार्टी को बहुमत जो हासिल हुआ था. उनकी जीत सिर्फ दिलचस्प भाषण-शैली का ही नतीजा नहीं थी, बल्कि वे ऐसे वक्त उम्मीद बनकर उभरे थे, जब मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार घोटालों-घपलों और प्रशासकीय निष्क्रियता में जकड़ी थी.

23 अप्रैल, 2014 को हमने आवरण पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 'मनमोहन क्यों नाकाम’ शीर्षक के साथ छापा. 2 दिसंबर, 1998 की आवरण कथा ‘राज चलाने में अक्षम’ में हमने बताया था कि कैसे अटल बिहारी वाजपेयी सात महीनों से राजनैतिक अनिश्चय, आर्थिक मंदी और प्रशासकीय निष्क्रियता के अगुआ बन गए हैं. हमने तब कहा था कि वाजपेयी, प्रधानमंत्रियों राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह और पी.वी. नरसिंह राव की कतार में जाने वाले हैं, जिन्होंने उम्मीद जगाई और फिर उसे बेमानी कर दिया.

प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी मई 2019 में फिर चुनी गई, क्योंकि लोग तब भी मान रहे थे कि वे काम करने वाले शख्स हैं और अपने लगातार किए वादों के मुताबिक सुशासन करके दिखाएंगे. यह क्रूर विडंबना है कि आज देश के लोग सांस लेने के लिए तड़प रहे हैं और कीट-पतंगों की तरह मर रहे हैं.

वजह है अस्पतालों में बिस्तरों, दवाइयों, ऑक्सीजन सिलेंडर, एंबुलेंस का घोर अभाव. यहां तक कि शव वाहन और अंतिम संस्कार के लिए दो गज जमीन के लिए भी मारा-मारी है. कई लोगों की नजरों में राज्य का ढांचा ढह चुका है और वह लोगों को सबसे बुनियादी जीवन का अधिकार भी मुहैया कराने में नाकाम है. त्रासदी यह है कि ऐसा होना नहीं चाहिए था.

लगातार दो हक्रतों से हम रोजाना 3,00,000 से ज्यादा नए संक्रमण के मामले और पिछले हफ्ते तक हर रोज औसतन 3,200 मौतें देख रहे हैं. 4 मई को भारत में दुनिया के 46 फीसद कोविड-19 संक्रमण के मामले और 25 फीसद मौतें दर्ज हुईं. हमने वायरस को ज्यादा चालाक बनने दिया, जो बस एक ही काम जानता है कि कैसे अपनी संख्या बढ़ाए.

साल भर बाद यह कहना तो निहायत गैर-वाजिब होगा कि उसका प्रकोप कैसे बढ़ेगा, यह हम नहीं जानते थे. सतर्कता और तैयारी ही हमेशा इस अदृश्य सुक्ष्म शत्रु के खिलाफ जंग में बुनियादी हथियार है. इसके बदले प्रधानमंत्री मोदी ने 28 जनवरी, 2021 को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में बड़े गर्व से ऐलान किया, ''दुनिया की 18 फीसद आबादी वाले देश ने कोरोना पर प्रभावी ढंग से काबू पाया और मानवता तथा दुनिया को महा दुर्भाग्य से बचा लिया.’’

लेकिन कहां! महादुर्भाग्य तो हम पर टूट पड़ा है. हमने सावधानियां हवा में उड़ा दीं. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सहित समूचा राजनैतिक वर्ग अगले छह हफ्ते तक पांच राज्यों के चुनाव में धड़ल्ले से प्रचार में जुट गया. भारी-भरकम चुनावी रैलियों और विशाल धार्मिक आयोजनों में कोविड प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाई गईं. दुनिया में सबसे सख्त लॉकडाउन के तकरीबन साल भर बाद लोग अपने काम-धंधे पर लौटे थे और उन्होंने भी मास्क पहनने और दूरी बनाए रखने पर तवज्जो नहीं दी.

इस साल फरवरी में संक्रमण के रोजना मामलों में—पिछले साल सितंबर के चरम 90,000 के मुकाबले महज 9,000—गिरावट से समूचे देश ने राहत की सांस ली थी. हमने 1 मार्च, 2021 को अपनी आवरण कथा में कोताही के खिलाफ चेतावनी के साथ पूछा था, 'तो क्या काबू में आ गया कोरोना?’ कोविड संक्रमण के मामलों में कमी का मतलब यह नहीं था कि मिशन पूरा हुआ, क्योंकि हम वायरस के बारे में कितना कम जानते हैं.

हम तब नहीं जानते थे कि वायरस के कई और शायद ज्यादा घातक वैरिएंट ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ब्रिटेन में हैं. अब पता चल रहा है कि हमने अपने कवच उतार दिए थे और यह महा अनर्थकारी साबित हुआ. हमने पहली लहर में वायरस के प्रकोप की रोकथाम लगभग कर ली थी और यह खुशफहमी भी बनी कि हम दूसरी और तीसरी लहर की चपेट से बच गए, जिससे दूसरे देश तबाह हो उठे. केंद्र के साथ राज्य सरकारें भी दूसरी लहर का अनुमान नहीं लगा सकीं.

हमारी आवरण कथा 'नाकाम सरकार’ इस लापरवाही की पोल खोलती है, जिसे हमारे ब्यूरो ने संकलित किया है. हमने 10 पहलुओं पर गौर किया-शुरुआती संकेतों की अनदेखी, प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की कमी, स्वास्थ्य तंत्र का अभाव, टेस्टिंग और ट्रेसिंग की नाकामी, जरूरी दवाइयों की कमी, मेडिकल ऑक्सीजन आपूर्ति व्यवस्था का ढहना, वायरस से लडऩे में टेक्नोलॉजी की मदद में नाकामी, वैक्सीन की कमी और सुपर-स्प्रेडर आयोजनों को रोकने में संस्थाओं की हीला-हवाली. इन सभी पहलुओं ने मिलकर लापरवाही, उदासीनता की त्रासद पटकथा लिख दी.

मसलन, देश में वायरस के म्यूटेंट स्ट्रेन्स की पहचान और चेतावनी के लिए जीनोम सिक्वेंसिंग ग्रुप का गठन दिसंबर 2020 में जाकर किया गया. इस ग्रुप को फरवरी 2021 तक 80,000 नमूनों की सिक्वेंसिंग कर लेनी चाहिए थी, लेकिन वह सिर्फ 3,500 की ही कर पाया. ऐसी ही ढिलाई आरटी-पीसीआर टेस्ट के मामले में हुई, जो कोविड मरीजों के टेस्ट और इलाज के लिए अहम है.

पिछले साल फरवरी से जुलाई तक देश में आरटी-पीसीआर टेस्ट करने वाली प्रयोगशालाओं की संख्या 14 से 1,600 तक बढ़ाई जा सकी. लेकिन दिसंबर 2020 और मई 2021 के बीच सरकार सिर्फ 249 नई प्रयोगशालाएं ही जोड़ पाईं. दूसरी लहर में वायरस का प्रकोप बढऩे की तेजी के कारण टेस्ट नतीजे आने में अब चार से पांच दिन लग जाते हैं, जो पहले 12 घंटे में मिल जाया करते थे. टेस्ट नतीजों में देरी से इलाज में भी देरी हो जाती है. 

हम पहली लहर का एक बुनियादी सबक भी भुला बैठे, कोविड से लड़ाई में मेडिकल ऑक्सीजन ज्यादा जरूरी है न कि वेंटिलेटर. सरकार ने अक्तूबर में 1 लाख टन मेडिकल ऑक्सीजन का आयात करने की वैश्विक निविदा जारी की, जो महीने भर की आपूर्ति के लिए पर्याप्त होता, लेकिन फिर उसे रद्द कर दिया.

उसकी नींद फिर इस साल अप्रैल में टूटी और उसने 50,000 टन ऑक्सीजन के लिए दूसरी निविदा जारी की, लेकिन तब तक अस्पतालों में जान का नुक्सान तो हो चुका था. इस अफसरशाही गड़बड़झाले से देश के सबसे ज्यादा संक्रमण वाले राज्यों में मरीज ऑक्सीजन के बिना जान गंवा रहे हैं. अफसरशाही तामझाम में आयात किया गया सामान हवाई अड्डों पर अटका पड़ा रहता है. 

दुनिया में टीका उत्पादन के मामले में अव्वल देश में टीकाकरण नाकाम हो रहा है क्योंकि हमारे पास पर्याप्त संख्या में टीका नहीं है. ऐसा लगता है, पर्याप्त संख्या में टीकों का ऑर्डर दिए बगैर ही हमने दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान छेड़ दिया. पिछले साल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वायरस को लेकर अपने सनकी रवैये के बावजूद 33 करोड़ की आबादी के लिए 65 करोड़ वैक्सीन का ऑर्डर दिया था.

हमने अपने 1.3 अरब लोगों के लिए सिर्फ 37 करोड़ वैक्सीन का ऑर्डर दिया. हमें यह पिछले साल ही पता था कि कोविड वैक्सीन उत्पादन के लिए सूचीबद्ध दो कंपनियां महीने में सिर्फ 11 करोड़ वैक्सीन ही उपलब्ध करा सकती हैं. इस दर से तो देश में वयस्क आबादी के लिए 2 अरब वैक्सीन के उत्पादन में करीब दो साल लगेंगे. तकरीबन 3 करोड़ लोगों का टीकाकारण पूरा हो गया है लेकिन फिलहाल टीकाकरण की दर घट गई है—वह 6 अप्रैल को 34 लाख रोजाना से 4 मई को 18 लाख रोजाना है.

इस बीच, सरकार ने 18 वर्ष से ऊपर के हर किसी के लिए टीकाकरण खोल दिया है, इस तरह योग्य आबादी 84 करोड़ हो गई है. सो, वैक्सीन की भारी कमी के मद्देनजर हमें वायरस के प्रकोप की रोकथाम के लिए आपात कदम उठाने की जरूरत है. सरकार ने दवाइयों का भंडारण नहीं किया और दिसंबर में संक्रमण के मामले कम होने लगे तो दवा निर्माताओं ने कच्चे माल का ऑर्डर देना बंद कर दिया. यह कमी अब जमाखोरी और कालाबाजारी का रूप ले चुकी है, 1,800 रु. में मिलने वाली दवा अब 10 गुना ज्यादा दाम में बिक रही है.

राज्य-दर-राज्य ने पहली लहर के दौरान बनाए गए स्वास्थ्य ढांचे को इस गलतफहमी में तोड़ दिया कि महामारी गुजर गई है. नए बनाए अल्पकालिक अस्पतालों को तोड़ दिया गया, स्टाफ हटा दिया गया, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन टैंकर जैसे बुनियादी मेडिकल ढांचे के विस्तार की कोशिशें बेहद थोड़ी की गईं. दिल्ली सरकार ने पहली लहर के दौरान बनाई गई 12,000 बिस्तरों की चार अतिरिक्त स्वास्थ्य सुविधाएं बंद कर दीं. ये बेहद जरूरी होते, जब राष्ट्रीय राजधानी दूसरी लहर का केंद्र बन गई और अप्रैल में हर रोज 25,000 मामले आने लगे तो बिस्तर ही नाकाफी थे.

वह अतिरिक्त ढांचा शायद रोजाना आ रहे संक्रमण के नए मामलों में काफी नहीं होते, मगर कम से कम उसके होने से एकदम शून्य से तो शुरू नहीं करना पड़ता. राज्यों ने वार रूम बनाया लेकिन वे तन्हा खड़े हैं. भारत राज्यों का संघ है, लेकिन वायरस तो कोई सीमा नहीं मानता. आइटी सुपरपावर देश के लिए सभी राज्यों के वार रूम को जोड़ लेना मुश्किल नहीं होगा, ताकि नीति-निर्माता सभी संसाधनों—उपलब्ध बिस्तरों से लेकर ऑक्सीजन आपूर्ति और टेलिमेडिसिन सलाह तक—को ध्यान में रखकर फैसले ले सकें.

लोकतंत्र की एक कसौटी जवाबदेही है, जहां निर्वाचित सरकार पर बाहरी संस्थाएं अंकुश बनाए रखती हैं. लोकतंत्र दो चुनावों के बीच अदृश्य नहीं हो जाता. अच्छा राजकाज मुहैया कराना नैतिक जिम्मेदारी है, और अगर नाकामी या गलतियां होती हैं तो उसके नतीजे जिम्मेदार लोगों को जरूर भुगतने चाहिए. अतीत में ऐसी कई मिसालें हैं, जब मंत्रियों ने अपनी जिम्मेदारी मानकर इस्तीफे दिए.

यादगार मामलों में, एक रेल हादसे में 152 लोगों के मारे जाने के बाद 25 नवंबर 1956 को रेल मंत्री लालबहादुर शास्त्री और 1962 के युद्ध में चीन से पराजय के बाद वी.के. कृष्णमेनन ने इस्तीफा दिया. 1992 में केंद्रीय वाणिज्य राज्यमंत्री पी. चिदंबरम ने इस्तीफा दिया, जब पता चला कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने 15,0000 प्रमोटर शेयर किसी घोटालेबाज फर्म से खरीदे थे.

वर्ष 1987 में रक्षा मंत्री वी.पी. सिंह ने रक्षा सौदे में रिश्वत की जांच करने के लिए अमेरिकी जासूसी फर्म की नियुक्ति पर सवाल उठने पर इस्तीफा दे दिया था. 1993 में नागरिक उड्डयन और पर्यटन मंत्री माधवराव सिंधिया ने एक हवाई दुर्घटना पर इस्तीफा दिया, जबकि हादसे में सभी यात्री बच गए थे. इन मिसालों का एक नैतिक सबक है, जो लगता है कि यह सरकार भूल गई है. 

आज हमारी आंखों के सामने एक राष्ट्रीय त्रासदी है और किसी पर कोई आंच नहीं आ रही है. कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया जा रहा है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ऐसे संदेश देने में महारत तलाश रहा है कि सब भला है. संक्रमण और मौत की संख्या बढ़ रही है, तो अफसरशाही को जैसे लकवा मार गया है. कोई नहीं जानता कि किसका काम है, राज्यों या केंद्र का. हर कोई बस दूसरों पर टाल रहा है. प्रधानमंत्री अभी भी देश को आश्वासन नहीं दे पाए हैं कि हालात पर कैसे काबू पाना चाहते हैं. उनके कैबिनेट सहयोगी तो रहस्यमय रूप से परिदृश्य से गायब हैं.

यह सामूहिक नेतृत्व और सहकारी संघवाद का वक्त है. सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को केंद्र के साथ मिलकर तेज कदम उठाने का वन्न्त है. जीवन और आजीविका पर सबसे भयंकर संकट के वक्त सरकारों और समाज को कदम मिलकर काम करना चाहिए. यह वक्त है कि हम उनसे जवाबदेही की मांग करें, जिन्हें हमने सेवा के लिए चुना है. प्रधानमंत्री मोदी टेक्नोक्रेटिक राजकाज, बारीकियों पर ध्यान और काम अंजाम देने के लिए जाने जाते हैं. यही वक्त है कि वे खड़े हों और ऐसे नेता बनें जैसा वे बन सकते हैं. वरना, भविष्य भयावह लगता है.

जीवन और आजीविका पर सबसे भयंकर संकट के वक्त में सरकारों और समाज को कदम मिलाकर काम करना चाहिए. यह वक्त है कि हम उनसे जवाबदेही की मांग करें, जिन्हें हमने सेवा के लिए चुना है.

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