तमिलनाडुः सुपुत्र के हाथ आई सत्ता
एम.के. स्टालिन के चुनावी वादे वोटरों को ठीक लगे अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि नए मुख्यमंत्री उन पर कैसे अमल करते हैं

अड़सठ साल के मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन को काफी लंबा इंतजार करना पड़ा है. 7 मई को अंतत: वे पदभार संभालेंगे और मार्च 1967 से द्रविड़ दलों का दबदबा कायम होने के बाद से अब तक तमिलनाडु पर 21 साल तक शासन कर चुकी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) की ओर से राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री बनेंगे. एक दशक तक विपक्ष में रहने और पांच बार मुख्यमंत्री रहे पिता स्वर्गीय एम. करुणानिधि की छाया से मुक्त होने के बाद स्टालिन ने 6 अप्रैल को हुए चुनावों में 13 दलों के सेक्युलर प्रोग्रेसिव एलायंस को अच्छी जीत दिलाई है (234 सीटों में से 159 सीटें, जिनमें द्रमुक की 133 सीटें और सहयोगियों की पांच सीटें शामिल हैं जिन्होंने उगते सूरज के निशान पर चुनाव लड़ा था).
2019 के संसदीय चुनाव में द्रमुक की व्यापक जीत (लोकसभा की 39 सीटों में से 38 सीटें) को देखते हुए उन्हें और भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद रही होगी. लेकिन निवर्तमान मुख्यमंत्री एडप्पादी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) के नेतृत्व में प्रतिद्वंद्वी अखिल भारतीय द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) ने साबित कर दिया है कि दिवंगत प्रतिष्ठित नेता जे. जयललिता की गैरमौजूदगी में भी उनकी पार्टी को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता. अन्नाद्रमुक और उसके सहयोगियों ने 75 सीटें जीतीं हैं और वे प्रभावी विपक्ष की भूमिका में होंगे. इस बीच, विधानसभा में पहुंचने वाले दलों की संख्या दोगुनी हो गई है—2016 में चार थे, अब आठ हैं.
परंतु, स्टालिन के सामने सबसे बड़ी चुनौती सक्रिय विपक्ष की संभावना नहीं बल्कि तेजी से बढ़ रहे कोविड-19 से मुकाबला करने की है. चुनावों में सत्ताविरोधी लहर को रोकने के लिए विकास और कल्याणकारी उपायों के अलावा इस मसले को भी उनके पूर्ववर्ती ईपीएस ने काफी हद तक अच्छी तरह से संभाला था. चुनावी साल के तनावों के बावजूद, ईपीएस ने सुनिश्चित किया था कि राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली कुशलता से कार्य करे. देश में आरटीपीसीआर जांचों में तमिलनाडु ने देश में सर्वाधिक जांचें (22,956,942) करने का मानक स्थापित किया और यहां इसकी मृत्युदर को 1.19 प्रतिशत पर रोकने में सफलता पाई. स्टालिन के लिए कार्यभार ग्रहण करने के बाद के शुरुआती सप्ताह कठिन हो सकते हैं क्योंकि महामारी की दूसरी लहर ने पूरे राज्य को चपेट में ले रखा है. उन्हें हर हाल में साबित करना होगा कि वे इन स्थितियों को अपने पूर्ववर्ती की तुलना में बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं.
सिर पर नाचती दूसरी बड़ी चुनौती भारी कर्ज है. 31 मार्च, 2020 को राज्य पर कुल कर्ज 4.9 लाख करोड़ रुपए था और मार्च 2021 तक इसके बढ़कर 5.7 लाख करोड़ रुपए हो जाने का अनुमान है, जब अन्नाद्रमुक सरकार ने फरवरी में राजस्व घाटे वाला अंतरिम बजट पेश किया था. माल और सेवा कर लागू होने, विमुद्रीकरण तथा समग्र आर्थिक गिरावट के बीच 2016 से राज्य का कर संग्रह भी घटता गया है. राज्य ने शिकायत की थी कि उसे केंद्रीय करों में अपना उचित हिस्सा नहीं मिल रहा है और कर अधिभारों को करों के बंटवारे वाले योग का हिस्सा नहीं बनाया जा रहा है.
वित्तीय संकट और इसकी जानकारी द्रमुक के घोषणापत्र में होने ('राज्य के हर नवजात पर 1,25,000 रुपए का कर्ज होगा') के बावजूद स्टालिन ने मतदाताओं को लुभाने के लिए वादों की झड़ी लगाई है, जिसमें परिवार की मुखिया महिलाओं को 1,000 रुपए की सार्वभौमिक बुनियादी आय, 30 वर्ष से कम उम्र के छात्रों के शिक्षा ऋणों को माफ करना और राज्य की 32 लाख विधवाओं के अतिरिक्त 50 वर्ष से ऊपर की एकल महिलाओं, विकलांगों तथा श्रीलंकाई शरणार्थियों को प्रतिमाह रु. 1,500 दिया जाना शामिल है. राजनैतिक विश्लेषक एन. सत्यमूर्ति कहते हैं, ''स्टालिन ने 3 जून को करुणानिधि की जयंती पर हर परिवार को 4,000 रुपए देने का वादा भी किया है. यह सब मिला कर बहुत सारा पैसा होगा. यद्यपि यह सब पैसा उपभोक्ता के हाथों में ही जाएगा''
एक अन्य चुनावी वादे के मुताबिक युवाओं और महिलाओं को रोजगार मुहैया कराना भी बड़ी चुनौती होगी. पार्टी ने स्थानीय लोगों को नौकरियों में 75 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए कानून बनाने का वादा किया है और पांच साल तक हर साल 10 लाख नौकरियां देने का लक्ष्य निर्धारित किया है. रोजगार सृजन करने, परिवारों की आय बढ़ाने, राज्य में उद्योगों को पुनर्जीवित करने और अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने की कोई योजना अभी तक कागज पर नहीं है (कम से कम सार्वजनिक जांच-पड़ताल के लिए उपलबध नहीं है), लेकिन इन चुनौतियों का सामना करने का रास्ता तय करने के लिए एक समिति बनाई जा रही है.
स्टालिन से अपेक्षाएं ज्यादा हैं. पहली बार के मतदाताओं और अन्य युवाओं को उम्मीद है कि स्टालिन सर्वोच्च न्यायालय तथा केंद्र के साथ नीट परीक्षा (राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर उनका मामला ईपीएस सरकार की तुलना में ज्यादा गंभीरता से आगे बढ़ाएंगे. ईपीएस की चलाई योजनाओं से लाभान्वित होने वाली महिलाएं उन लाभों को पाते रहना चाहती हैं. इसके बाद धारणा की लड़ाई है. द्रमुक पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप भी लगता है. स्टालिन की प्रशासनिक व्यस्तताओं को देखते हुए उनका बेटा उदयनिधि, जो अब विधायक भी है, और सौतेली बहन एम. कनिमोझी संभवत: पार्टी का ज्यादातर काम संभालेंगे जबकि दामाद वी. सबरीसन उनके विश्वस्त लोगों में शामिल रहेंगे. विश्लेषकों का मानना है कि स्टालिन फिलहाल विस्तारित करुणानिधि कुनबे को दूर रखते हुए परिवार के लोगों को ही अपनी गतिविधियों में शामिल करेंगे. इन विश्लेषकों को लगता है कि वह कनिमोझी को उचित समय पर पुरस्कृत करेंगे.
नई पीढ़ी के नेतृत्व में हुए पहले विधानसभा चुनाव में स्टालिन की द्रमुक ने निर्णायक जीत हासिल की है. बीते 25 साल में यह पहली बार हुआ कि द्रमुक ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया है, वह भी तब जबकि उसने 61 सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ी थीं (अन्नाद्रमुक ने सहयोगियों को 68 दी थीं). यद्यपि सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने भाजपा से हाथ मिलाया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दोनों ने वहां कई जगहों पर प्रचार किया लेकिन इससे बहुत काम बना नहीं. ईपीएस ने सुनिश्चित किया कि अन्नाद्रमुक राज्य के पश्चिमी भाग में अपने पारंपरिक इलाके—कोंगु पट्टी—पर काबिज रहे, लेकिन पार्टी दूसरी जगहों पर हार गई. अन्नाद्रमुक-समर्थक भावना राज्य के उन दक्षिणी हिस्सों में नहीं चली जिन्हें पूर्व उप-मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) का गढ़ कहा जाता था. स्टालिन को राज्य के मध्य और उत्तरी क्षेत्रों में एक तगड़ा समर्थन मिला.
इन परिणामों से अन्नाद्रमुक की सहयोगी पीएमके (पट्टाली मक्कल काच) को सबसे ज्यादा निराशा हुई होगी. इसने वन्नियार समुदाय के लोगों को अति पिछड़ा वर्ग में 10.5 प्रतिशत आरक्षण दिलाने की लड़ाई लड़ी थी लेकिन इसका चुनाव में वांछित परिणाम नहीं मिला. मद्रास विश्वविद्यालय के राजनीति और लोक प्रशासन विभाग के प्रमुख रामू मणिवक्कन कहते हैं, ''इसने (पीएमके के अभियान ने) वन्नियार पट्टी में जोरदार भावनात्मक लहर पैदा की, लेकिन उतनी ही मजबूत जवाबी प्रतिक्रिया को भी जन्म दिया और यह जवाबी लहर ज्यादा प्रभावी साबित हुई.''
स्टालिन ने कट्टर केंद्र विरोधी द्रविड़ रुख को बनाए रखा है, जिसके मूल में ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रीय स्वायत्तता, भाषाई पहचान और संघीय भावना को बढ़ाना शामिल है. इस बीच स्टालिन का भी लगातार विकास हुआ है. चैन्ने के मेयर (1996), स्थानीय प्रशासन मंत्री (2006) और उप मुख्यमंत्री (2009-11) के रूप में उनके पास राजनीति और राजनैतिक प्रशासन दोनों का अनुभव है. उन्होंने चुपचाप केंद्र में राष्ट्रीय दलों और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार समेत सभी सरकारों के साथ संपर्क भी विकसित किया है. मणिवक्कन कहते हैं, ''करुणानिधि के विपरीत वे अधिक शांत, सतर्क और सक्षम प्रशासक हैं. वे छवि साफ-सुथरी रखने में भी विश्वास करते हैं.''
अन्नाद्रमुक की भी स्टालिन पर पैनी नजर रहेगी और करुणानिधि तथा जयललिता के दिनों जैसी स्थिति नहीं होगी जिसमें दोनों चतुराई से एक ही समय में विधानसभा में मौजूद होने से बचते थे. पार्टी को बदलती वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए ईपीएस को और अधिक प्रोत्साहन देना होगा. मणिवनान का कहना है कि ''अन्नाद्रमुक की हार में भाजपा कारक का बहुत योगदान है. अब अन्नाद्रमुक का अल्पकालिक लक्ष्य विधायक दल को सक्रिय और एकजुट रखना होगा जबकि दीर्घकाल में उसे शशिकला और दिनकरन समेत सभी गुटों के बीच व्यापक एकता की तैयारी करनी होगी. अन्य हारे हुए दलों में से भाजपा और सीमन के नेतृत्व वाला तमिल राष्ट्रवादी दल नाम तमिझर काची हैं. सभी 234 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली यह एकमात्र पार्टी थी (और उसका मत प्रतिशत बेहतर हुआ है). ये दोनों विकल्प के रूप में विस्तार के अवसरों की तलाश करेंगी. लेकिन, फिलहाल, राज्य की राजनीति दो बड़े द्रविड़ समूहों के बीच का खेल है.