असमः कई पेच हैं इस राह में

असम विधानसभा चुनाव में सतह पर तो मुकाबला त्रिकोणीय दिखाई दे रहा है लेकिन थोड़ा गहरे झांकने पर यह तमाम पेचीदगियों से भरा प्रतीत होता है.

असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्व सरमा
असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्व सरमा

असम में 27 मार्च, 1 और 6 अप्रैल को तीन चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव त्रिकोणीय मुकाबले की तरह लग रहे हैं. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी-असम गण परिषद (भाजपा-एजीपी) गठबंधन का मुकाबला आठ दलों—कांग्रेस, ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ), बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ), आंचलिक गण मोर्चा, भाकपा, माकपा, भाकपा (माले) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद)—के महागठबंधन और दो नए दलों—रायजोर दल (आरडी) और असम जनता परिषद (एजेपी)—के एक छोटे संभावित गठबंधन से होगा. लेकिन चुनावी परिदृश्यों का अगर बारीकी से विश्लेषण करें तो पता चलता है कि फिलहाल कई ऐसे छोटे-बड़े मुद्दे हैं जो तय करेंगे कि 2 मई को अंतिम विजेता कौन होगा.

कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को ही लें. इसका उद्देश्य विपक्षी मतों का विभाजन रोकना था. यही वजह है कि कांग्रेस नेताओं ने बार-बार आरडी और एजेपी को इसमें शामिल होने का अनुरोध किया था, हालांकि उसे हर बार ठुकरा दिया गया. अगर वे शामिल हो जाते तो भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला होता.

सभी गैर-भाजपा वोटों को एकजुट करने की जरूरत को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि 2016 में कांग्रेस ने 31 प्रतिशत वोट शेयर होने के बावजूद सिर्फ 26 सीटें जीतीं, जो भाजपा को मिले 30 प्रतिशत वोटों से अधिक था. भाजपा, एजीपी और बीपीएफ के बीच गठबंधन के कारण कांग्रेस विरोधी वोट एकजुट हो गए और परिणामस्वरूप भाजपा ने 60, एजीपी ने 14 और बीपीएफ ने बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट क्षेत्रों की सभी 12 सीटें जीत ली थीं.

इस बार भाजपा ने एक नवगठित पार्टी यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल के साथ गठबंधन किया है जो कि बीटीएडी क्षेत्रों की 12 सीटों में से आठ सीटों पर लड़ेगी, जबकि भगवा पार्टी बाकी चार सीटों पर. कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के अंग के रूप में बीपीएफ सभी 12 बीटीएडी सीटों पर उतरेगी. इस क्षेत्र में अच्छी-खासी संख्या में मुस्लिम आबादी है और 2016 में बोडो वोट बीपीएफ के साथ एकजुट रहा. गैर-बोडो वोट कांग्रेस और असम में आप्रवासी मुसलमानों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले एआइयूडीएफ के बीच बंट गए.

कुछ परिस्थितियां ऐसी भी दिखती हैं जिनसे सभी अनुमान केवल संभावनाएं बनकर रह सकते हैं. मसलन, कांग्रेस-एआइयूडीएफ गठबंधन में कम से कम 46 सीटों पर जीत हासिल करने की क्षमता है, लेकिन अब तक घोषित उम्मीदवारों की सूची देखकर इसके मौजूदा समीकरण का भरपूर फायदा उठाने में पूरी तरह सक्षम होने पर आशंकाएं जताई जा रही हैं. कांग्रेस 93 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि एआइयूडीएफ को 14 सीटें दी गई हैं.

हालांकि, बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाली पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ एक ‘दोस्ताना मुकाबले’ में पांच और सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं. इन पांच में से चार पर वर्तमान में कांग्रेस का कब्जा है. फिर ऐसे दोस्ताना मुकाबले की क्या तुक है, लोग समझ नहीं पा रहे. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि एआइयूडीएफ की भाजपा के साथ अंदरूनी साठगांठ हुई है और अजमल राज्य के वित्त मंत्री हिमंत बिस्व सरमा के निर्देश पर काम कर रहे हैं.

सीएए पारित होने के कारण मूल निवासियों को लगता है कि इससे अवैध प्रवासियों को लाभ होने वाला है. इस कारण ऊपरी असम में असमिया बहुल सीटों पर भाजपा के खिलाफ नाराजगी है. कांग्रेस को लगता है कि उसे इस क्षेत्र में फायदा होगा. हालांकि, एआइयूडीएफ से उसके गठजोड़ के कारण मतदाता इसे भी एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में नहीं देख सकते क्योंकि एआइयूडीएफ को भी अवैध मुस्लिम प्रवासियों की पार्टी माना जाता है.

आरडी और एजेपी- दो नई पार्टियां खुद को दूसरे विकल्प के रूप में पेश करना चाहती हैं. कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने से इनकार करने से अब असमियाभाषियों के वर्चस्व वाली 36 सीटों में से 29 पर त्रिकोणीय या फिर चतुष्कोणीय मुकाबला होगा, जो परोक्ष रूप से भाजपा के लिए मददगार होगा. वैसे, असम कांग्रेस के अध्यक्ष रिपुन बोरा कहते हैं, ''एआइयूडीएफ के साथ गठबंधन करने में क्या नुक्सान है? आप कैसे कह सकते हैं कि वे सांप्रदायिक हैं? अगर आप अपने धर्म का सम्मान करते हैं, तो आप सांप्रदायिक नहीं हैं.’’

भाजपा के अंदरूनी सूत्र स्वीकार करते हैं कि पार्टी का पूरा चुनाव अभियान सरमा की लोकप्रियता और पर्दे के पीछे से होने वाली पैंतरेबाजी के इर्दगिर्द घूमता है. वित्त मंत्री सरमा पिछले 16 वर्षों से सरकार में हैं—तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में 11 साल और सर्बानंद सोनोवाल की अगुवाई वाली भाजपा सरकार में पांच साल. पूर्वोत्तर के हर राजनैतिक दल में उनके दोस्त हैं. इस नेटवर्क ने उन्हें विजयी गठबंधन बनाने, सदन में बहुमत के बिना सरकारें बनाने और सरकारों को गिरने से रोकने में मदद की है.

पार्टी के भीतर सरमा का प्रभाव 70 सीटों के उम्मीदवारों की घोषणा में साफ दिखता है. उनके सभी वफादारों को टिकट दिया गया है, जिनमें मानब डेका, तरंग गोगोई और जीतू गोस्वामी जैसे नए चेहरे शामिल हैं. इस दफा टिकट न पाने वाले एक मौजूदा विधायक कहते हैं, ''पार्टी का नाम भाजपा से बदलकर एचबीएस (हेमंत बिस्व सरमा) कर दिया जाना चाहिए.’’

ये अटकलें भी हैं कि भाजपा के जीतने पर मुख्यमंत्री को बदला जा सकता है. अब तक घोषित 71 उम्मीदवारों में मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के एक भी वफादार का नाम शामिल नहीं है. बल्कि मुख्यमंत्री के करीबी दो विधायकों—रितुपर्णा बरुआ और नबनीता हांडिक का टिकट कट गया है. सरमा की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा किसी से छुपी नहीं है.

हालांकि सरमा संभावित पदोन्नति की अटकलों को खारिज करते हैं. ‘‘मेरे समेत सभी भाजपा कार्यकर्ता जीत का अंतर बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. मुख्यमंत्री चुनाव परिणाम आने के बाद चुना जाएगा.’’ अन्य दल चुनाव से पहले आंतरिक मतभेद सुलझाने को संघर्ष कर रहे हैं, मुमकिन है भाजपा का यह संघर्ष 2 मई के बाद शुरू हो. 

जिधर टिकट मिले
चुनाव लडऩे के लिए टिकट हासिल करने की खातिर नेता रातोरात दल और विचाधारा बदले ले रहे.

कुल विधानसभा सीटें 126

भाजपा
 92 सीटों पर लडऩा है; 71 सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित
 एक मंत्री सुम रोंगांग समेत 11 मौजूदा विधायकों के टिकट कटे
 जयंत मल्ला बरुआ, तरंग गोगोई, मानब डेका और जीतू गोस्वामी समेत हेमंत बिस्व सरमा के सभी विश्वासपात्रों को टिकट मिला
 मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के कई विश्वासपात्रों
का टिकट कटा. इनमें विधायक ऋतुपर्णा कंवर और नवनीता हांडिक भी शामिल
  कांग्रेस के दो पूर्व मंत्री अजंता नियोग और गौतम रॉय भी भाजपा से टिकट पाने में नाकाम रहे; दोनों बिस्व सरमा के करीबी माने जाते हैं

असम गण परिषद
 इसे 26 सीटों पर चुनाव लड़ना है
 अभी तक आठ सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित; इनमें दो नए चेहरे
 दो पूर्व पार्टी अध्यक्षों प्रफुल्ल कुमार महंत और वृंदावन गोस्वामी को टिकट नहीं दिए गए

 कांग्रेस
 93 सीटों पर मैदान में उतरना है; 43 सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित किए जा चुके हैं
 इसके 40 प्रत्याशियों में से 18 नए चेहरे हैं
 अभी तक जिन 43 सीटों के लिए प्रत्याशियों का ऐलान हुआ है, उनमें से छह मौजूदा विधायकों में से किसी का टिकट नहीं कटा है
 2016 में मामूली अंतर से हारने वाले 12 प्रत्याशियों को फिर से टिकट दिए गए हैं

एआइयूडीएफ
 19 सीटों पर उतरना है; इनमें पांच ऐसी सीटें भी शामिल हैं जिन पर उसका ‘‘दोस्ताना मुकाबला’’ सहयोगी दल कांग्रेस से है
 16 सीटों के लिए प्रत्याशियों का ऐलान
 16 घोषित प्रत्याशियों में से 6 नए चेहरे

बाकी
एजेपी और रायजोर दल

मौजूदा स्थिति पहले गठजोड़ का ऐलान किया था लेकिन अब अलग-अलग प्रत्याशी खड़े कर रहीं
बीपीएफ, आंचलिक गण मोर्चा, भाकपा, माकपा, भाकपा (माले), राजद
मौजूदा स्थिति कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन का हिस्सा
यूपीपीएल
मौजूदा स्थिति भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन का हिस्सा.

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