राजस्थानः राजे की वापसी
राजस्थान के राजनीतिक मैदान में एक के बाद एक निराशा का सामने करने वाली भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव कर सकती है

राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे एक पहेली हैं और उनके हर कदम का गहराई से विश्लेषण किया जाता है. दिसंबर 2018 के चुनावों में हार के बाद से वे खामोश बैठी रहीं और उनके विरोधियों को भाजपा हाइकमान से खास तवज्जो दिए जाने के कारण यह धारणा बनने लगी कि उनके और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा उनके दाहिने हाथ अमित शाह के बीच संबंधों में खटास आ गई है.
हालांकि, फरवरी में संबंधों पर जमी बर्फ पिघलनी शुरू हुई. राजे ने दो साल के बाद 3 फरवरी को दिल्ली में शाह से मुलाकात की. हालांकि राजे ने बैठक में हुई चर्चा पर चुप्पी साधे रखी पर अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि मुलाकात काफी सौहार्दपूर्ण थी. दोनों अतीत में एक-दूसरे से परेशान थे. राजे की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि उनके मुख्यमंत्री रहते शाह ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, जो राजनीति में उनसे बहुत कनिष्ठ और कम अनुभवी थे. शाह की नाराजगी इस बात पर थी कि जब वे भाजपा के अध्यक्ष थे तब राजे उनके निर्देशों की अनदेखी कर दिया करती थीं. हालांकि, माना जा रहा है कि इस मुलाकात के बाद दोनों के बीच रिश्तों की खटास काफी दूर हुई है. सूत्रों का यह भी कहना है कि पिछले छह महीनों में राजे ने मोदी से भी बात की है. वे कुछ अन्य प्रमुख पार्टी नेताओं से भी मुलाकात कर रही हैं और यहां तक कि मौजूदा पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी उन्होंने 15 फरवरी को मुलाकात की. लगता है उनकी वापसी के लिए मंच तैयार हो रहा है.
हाईकमान अचानक राजे को क्यों इतना भाव दे रहा है? कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि पार्टी अन्य राज्यों के चुनावों में उनका उपयोग करने की इच्छुक है क्योंकि पार्टी में उनके कद की गिनी-चुनी महिला नेता ही हैं. चर्चा है कि पाला बदलने को तैयार बैठे कई विपक्षी नेताओं को पार्टी में लाने में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं क्योंकि उनके साथ राजे की व्यक्तिगत मित्रता है. इसके अलावा, राजस्थान-विशिष्ट घटनाक्रम भी हैं जो बताते हैं कि वह फिर से सक्रिय क्यों हैं.
राज्य में अगले महीने चार विधानसभा सीटों के उपचुनाव होने हैं और सूत्रों का कहना है कि राजे ने शीर्ष नेतृत्व को बता दिया है कि राज्य इकाई में आपसी खींचतान बनी रही तो पार्टी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएगी. लोकसभा चुनाव में भाजपा के क्लीन स्वीप के बाद 2019 में हुए दो उपचुनावों में, भाजपा मंडावा सीट हार गई थी जो उसने पहले जीती थी और सहयोगी लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) नागौर सीट को बमुश्किल बनाए रख सकी.
8 फरवरी को हुए स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन की वजह से भी राजे चिंतित हैं. निकाय चुनाव शहरी मतदाताओं के बीच सरकार की लोकप्रियता का संकेत हैं. सत्तारूढ़ कांग्रेस ने 3,036 वार्ड जीते और 123 बोर्ड पर उसका कब्जा है जबकि भाजपा 2,673 वार्डों और केवल 64 बोर्डों पर काबिज है. भाजपा और उसके सहयोगी दल अब केवल 32 प्रतिशत शहरी निकायों में सत्ता में हैं और यह दो दशकों में उसका सबसे खराब प्रदर्शन है.
राजे ने खराब प्रदर्शन के लिए भाजपा की वर्तमान राज्य इकाई को दोषी ठहराया. विधानसभा चुनाव में हारने के बाद, भाजपा आलाकमान ने राजे के विरोधियों में शुमार लोगों को पुरस्कृत किया. पहली बार के विधायक 54 वर्षीय सतीश पूनिया को राज्य इकाई का प्रमुख बनाया गया था. पूनिया ने अपनी टीम में राजे के वफादारों को दरकिनार कर दिया.
राजे समर्थक इससे क्षुब्ध हैं यह पिछले हफ्तों में स्पष्ट हो गया था. 8 जनवरी को नड्डा ने राज्य इकाई की औपचारिक बैठक बुलाई थी, लेकिन राजे को नहीं बुलाया गया. शाह से मिलने के कुछ दिन पहले, 8 मार्च को अपने जन्मदिन के अवसर पर राजे के भरतपुर में गोवर्धन परिक्रमा यात्रा शुरू करने की खबरें थीं. राजे कहती हैं कि यह पूरी तरह से व्यक्तिगत यात्रा है, लेकिन यह निश्चित रूप से उनके चुनाव पूर्व उन यात्राओं की याद दिलाएगा जिसने 2003 और 2013 में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ माहौल बनाने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
14 फरवरी को आरएसएस के गढ़ कोटा में उनके वफादारों ने बैठक की, जहां उन्होंने घोषणा की कि अगर राजे को अगले मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया गया तो पार्टी उपचुनाव और अगला विधानसभा चुनाव हार जाएगी. उन्होंने अप्रैल में शहर में एक रैली करने की घोषणा की और कहा कि राजे उसे संबोधित करेंगी. भाजपा के राज्य महासचिव (संगठन) चंद्रशेखर ने इस पर स्पष्टीकरण मांगा, तो राजे समर्थकों ने उन्हें दो टूक कह दिया कि वे इस पर प्रतिक्रिया तभी देंगे जब राज्य इकाई में उन्हें उचित सम्मान मिलेगा.
राज्य भाजपा प्रमुख पूनिया कहते आए हैं कि 'कोई भी व्यक्ति पार्टी से बड़ा नहीं है' और इस बात को विशेष जोर देते हुए कहते हैं कि राजे जैसे बड़े नेताओं के लिए भूमिका पार्टी तय करती है. वे कहते हैं, ''मैंने उन समुदायों के युवा नेताओं को प्रतिनिधित्व दिया है जिनका अब तक प्रतिनिधित्व बहुत कम रहा है और इसे कुछ स्थापित लोगों की अनदेखी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.''
''मैं, और भाजपा छोड़ दूंगी?'' 15 फरवरी को राजे की यही प्रतिक्रिया थी जब उनसे अलग पार्टी बनाने की अफवाहों पर पूछा गया था. उन्होंने कहा, ''मैं उस पार्टी को कभी नहीं छोड़ सकती जिसे मेरे परिवार ने खून, पसीने और पैसे से खड़ा किया है. मेरे परिवार के अलावा, भाजपा भी मेरे लिए परिवार है.'' बहुत से लोगों, चाहे वे किसी भी दल के हों, का मानना है कि अगर भाजपा ने गहलोत सरकार को गिराने की जिम्मेदारी राजे को दी होती तो वह नि:संदेह सफल रही होतीं. कुछ लोगों का मानना है कि राजे ने गहलोत सरकार को गिराने के प्रयासों पर नाराजगी जताकर, गहलोत की मदद की.
सूत्रों का कहना है कि भाजपा आलाकमान, राजे खेमे को अलग-थलग करने की अपनी रणनीति पर जल्द ही पुनर्विचार करेगा और कुछ बदलाव दिख सकते हैं. अगर राजे विधानसभा चुनाव से पहले राज्य भाजपा प्रमुख या विपक्ष के नेता के रूप में वापसी करती हैं तो बहुत हैरानी नहीं होगी. लेकिन उनकी वापसी आसान नहीं होगी. उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान लोकप्रिय हुए नारे, ''मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं'' के रूप में अपने लिए पार्टी के कार्यकर्ताओं और जनता के बीच पैदा हुए रोष को दूर करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी. राजनीति फूलों की सेज नहीं है और राजे इसे भली-भांति जानती हैं.