कोविड का टीकाः चुनावी इलाज!

कोरोना महामारी को लेकर लोगों में भय को देखते हुए इस चुनावी और त्योहारी दौर में राज्यों में मुफ्त टीके के वादे जोर-शोर से किए जा रहे हैं राष्ट्रीय या राज्य स्तर के कार्यक्रम के रूप में नि:शुल्क टीकाकरण ही (हर्ड इम्युनिटी हासिल करने का) सबसे तेज तरीका होगा

मुफ्त में पटना में 22 अक्तूबर को भाजपा का घोषणापत्र जारी करतीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण
मुफ्त में पटना में 22 अक्तूबर को भाजपा का घोषणापत्र जारी करतीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

अक्सर वादे मुफ्त होते हैं, खासकर चुनावी अभियानों के, जिनमें जनता की जेब पर कोई भार न डालने से जुड़ा ऐलान हो. निर्मला सीतारमण की ओर से 22 अक्तूबर को बिहार के सभी नागरिकों के लिए कोविड का टीका नि:शुल्क देने का वादा एक ऐसी ही घोषणा थी. मुफ्त टीका का जुमला भाजपा के घोषणापत्र में भी शामिल है और किसी भी सूरत में इसका भार केंद्र के खजाने पर नहीं पड़ेगा. स्वास्थ्य राज्य का विषय है और केंद्र उसके खर्च का एक हिस्सा मात्र वहन करता है.

सीतारमण की घोषणा का असर होना ही था. आखिरकार, यह त्योहारी—उपहार बांटने का—मौसम है. वित्त मंत्री के बाद मध्य प्रदेश, कर्नाटक और असम जैसे भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और तमिलनाडु में एनडीए के सहयोगी अन्नाद्रमुक के मुख्यमंत्री ई.के. पलानीस्वामी आदि ने भी मौका नहीं गंवाया और इस तरह के लुभावने वादों की झड़ी लगा दी. बिना इस बात की परवाह किए कि अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि टीका कब तक तैयार और उपलब्ध होगा, कितनी मात्रा में उपलब्ध होगा और उस पर कितना खर्च आने वाला है.

एक अन्य केंद्रीय मंत्री प्रताप षडंगी अपने गृह राज्य ओडिशा के हालिया दौरे के बीच वादा करने में एक कदम और आगे बढ़ गए. उन्होंने दावा किया कि पूरे देश में सभी को कोविड-19 का टीका मुफ्त में उपलब्ध कराने के लिए तैयारी जोर-शोर से चल रही है. वहीं, दक्षिणी राज्य तेलंगाना में एक सतर्क स्वास्थ्य मंत्री एटाला राजेंद्र ने संकोच के साथ कहा कि उनका राज्य भी टीका मुफ्त में देगा, लेकिन यह केवल गरीबों, डॉक्टरों और फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों को उपलब्ध कराया जाएगा.

कोरोना महामारी को लेकर लोगों में भय को देखते हुए इस चुनावी और त्योहारी दौर में राज्यों में मुफ्त टीके के वादे जोर-शोर से किए जा रहे हैं. लगता है वे टीकाकरण कार्यक्रम की बारीकियों को नजरअंदाज कर रहे हैं. अतीत में भी कई मौकों पर ऐसे समझौते हुए हैं जिसका नतीजा लागत में अनापशनाप बढ़ोतरी के रूप में ही सामने आया है. कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि बहुत-से लोग, विशेष रूप से टीका विकसित करने के काम में जुटे विशेषज्ञ, इस चुनाव पूर्व घोषणा को लेकर उलझन में हैं.

दो दशक से अधिक समय से टीका निर्माण उद्योग में सक्रिय शांता सनोफी के चेयरमैन के.आइ. वरप्रसाद रेड्डी कहते हैं, ''कोई नहीं जानता कि वह कोविड के टीके की पेशकश आखिरकार किस कीमत पर कर पाएगा. खुदरा कीमत केवल लागत पर लाभ जोड़कर तय नहीं होने वाली है. इस महामारी की स्थिति में यह एक अच्छे व्यावसायिक अवसर के रूप में देखा जाएगा. कंपनियां कृत्रिम किल्लत पैदा कर दें, तो टीके की कीमत आसमान छूने लगेगी. सरकार इसके मूल्य को शायद नियंत्रण में नहीं रख पाए. राजनेता इसमें निवेश कर सकते हैं और इसे खरीदकर लोगों में बांट भी सकते हैं, पर इससे अराजकता पैदा हो सकती है.''

अन्य चुनौतियां भी हैं. वरप्रसाद रेड्डी कहते हैं, ''टीका लगाना बिरयानी पैकेट और सस्ती शराब बांटने (चुनाव के दौरान बांटी जाने वाली सबसे पसंदीदा रेवड़ी) जैसा आसान विकल्प नहीं है क्योंकि इसकी आपूर्ति सरल नहीं है. कोई भी टीका लगाने से पहले, व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति की जांच की जानी चाहिए. उसे बुखार या सर्दी या कोई अन्य बीमारी है तो उसे टीका नहीं दिया जा सकता. एक योग्य डॉक्टर को तय करना होगा कि टीका देना है या नहीं.''

व्यावहारिक रूप से देखें तो टीकाकरण की पूरी प्रक्रिया बहुत बड़ी चुनौती होगी. टीकों को कोल्ड चेन के माध्यम से संरक्षित करना होगा (मसलन, उत्पादन, भंडारण से लेकर टीका लगाने तक तापमान को अनुशंसित स्तर तक बनाए रखना होता है). आने वाले टीके को अगर दो-खुराकों के रूप में दिए जाने की जरूरत हुई, तो निर्माता के सुझाए तरीके से पहली और दूसरी खुराक दिए जाने का पूरा रिकॉर्ड रखना होगा. दूसरी खुराक का फॉलोअप भी उतना ही महत्वपूर्ण है. रेड्डी कहते हैं, ''इसके अलावा, टीका लगाने के बाद दुष्प्रभाव दिखता है तो सवाल यह खड़ा होता है कि ऐसे मामलों को कौन संभालेगा. यह बहुत चिंता और भ्रम पैदा करेगा.''

लेकिन पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया में स्वास्थ्य सूचना और प्रौद्योगिकी नवाचार के प्रमुख डॉ. सुरेश मुनुस्वामी के मानना है कि हर नागरिक को टीका लगाने पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. वे कहते हैं, ''राष्ट्रीय या राज्य स्तर के कार्यक्रम के रूप में नि:शुल्क टीकाकरण ही (हर्ड इम्युनिटी हासिल करने का) सबसे तेज तरीका होगा. यह काम डोर-टू-डोर कैंपेन, व्यापक मल्टी-मीडिया अभियानों और टीकाकरण शिविरों से संभव होगा. इसे शत-प्रतिशत सफल करने के लिए इसकी प्रगति तथा कवरेज की डिजिटल निगरानी प्लेटफॉर्मों के माध्यम से वास्तविक समय पर निगरानी करनी होगी.'' वैसे इस स्तर पर समूह प्रतिरक्षा (हर्ड इम्युनिटी) प्राप्त करने के लिए 70 प्रतिशत या अधिक आबादी का टीकाकरण करना आवश्यक है.

जिन निर्माताओं के पास कोविड के टीके हैं वे 2021 में परीक्षण को पूरा करने और उत्पाद को बाजार में उतारने को लेकर बहुत आशावादी हैं. अगर इसके लिए उन्हें अतिरिक्त उत्पादन सुविधाओं को बनाने या बड़ी मांग को संभालने के लिए लाइसेंसी उत्पाद को आउटसोर्स करने की जरूरत हो तो वे करेंगे. शायद यही वजह है कि राज्य, मूल्य के बारे में अनिश्चित होने के बावजूद वादे कर रहे हैं. सीरम इंस्टीट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला ने उत्पादन लागत 225 रुपए रखी है.

भारत में सामान्य सप्लाइ चेन की लागत 10 से 15 प्रतिशत के बीच है और संभवत: कोल्ड चेन को बनाए रखने की लागत इसकी दोगुनी होगी. यह देखते हुए कि देश के दूरदराज के कोनों में भी टीकाकरण की आवश्यकता है, आपूर्ति शृंखला की लागत और भी बढ़ जाएगी. इसमें बड़े पैमाने पर डोर-टू-डोर और मल्टीमीडिया अभियानों और डिजिटल मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म की लागत भी जोड़ दें, तो टीका लेने वाले व्यक्ति के पास इसके पहुंचने तक मूल्य संभवत: उत्पादन लागत के दोगुना तक बढ़ सकता है. इस तरह लगवाने वाले के लिए कुल लागत 450 रु. प्रति व्यक्ति बैठ सकती है और 1.3 अरब लोगों के लिए, इसकी लागत 58,500 करोड़ रुपए होगी.

देशव्यापी टीकाकरण के लिए एक झटके में भुगतान नहीं करना होगा, बल्कि यह कई महीनों और संभवत: वर्षों तक चल सकता है. फिर अतीत में टीकाकरण कार्यक्रमों के साथ हमारी सफलता का रिकॉर्ड भी उत्साहजनक नहीं है. मेडिकल जर्नल बीएमजे का 2016 का अध्ययन बताता है कि अब भी अनुमानित 38 प्रतिशत बच्चों को पहले वर्ष में आवश्यक सभी बुनियादी टीके नहीं लगाए जाते हैं.

सीतारमण के बयान ने अपनी टाइमिंग की वजह से ध्यान खींचा, लेकिन यह वादा संभवत: अन्य देशों की घोषणा से प्रेरित था—कोविड प्रबंधन योजना के तहत मुफ्त टीका देने की घोषणा. यहां के विपक्षी नेताओं ने भी उस पर सवाल खड़े करने में कोई देर नहीं की. उन्होंने आरोप लगाए कि चुनावी घोषणा पत्र में टीका लगाने का वादा ''भाजपा की हताशा दर्शाता है'' और वे पूछ रहे हैं कि क्या ''गैर-भाजपा शासित राज्यों को भी मुफ्त कोविड टीका मिलेगा''. इस पर चुनाव आयोग की चुप्पी से भी कई लोगों की भौंहें तनी हैं.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस.वाइ. कुरैशी कहते हैं, ''उनके अपने कारण हो सकते हैं जिनके बारे में मुझे जानकारी नहीं है.'' वैसे वे यह भी कहते हैं कि पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में किसी बात को शामिल करना कानूनी रूप से गलत नहीं हो सकता. लेकिन इसका नैतिक पक्ष भी है क्योंकि आदर्श आचार संहिता लागू है. एक अन्य पूर्व सीईसी, टी.एस. कृष्णमूर्ति जोर देकर कहते हैं, ''चुनाव के दौरान एक राजनैतिक पार्टी के घोषणापत्र में किए गए वादों को चुनावी नियमों के उल्लंघन के रूप में नहीं माना जा सकता.'' घोषणा की मंशा स्पष्ट है लेकिन क्या मतदाता कहीं भी टीकाकरण को लेकर खोखले वादों को देखकर वोट डालेंगे, कहना मुश्किल है.

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