उत्तर प्रदेशः बदल न पाया यूपी पुलिस का चेहरा

बदमाशों पर सख्ती की कई मिसालें पेश कर चुकी राज्य सरकार भ्रष्ट पुलिस पर कार्रवाई का एक भी नमूना पेश नहीं कर सकी जिससे ऐसे पुलिस अफसरों को सबक मिल सके

नप गए प्रयागराज के एसएसपी अभिषेक दीक्षित को भ्रष्टाचार के आरोप में सरकार ने निलंबित किया
नप गए प्रयागराज के एसएसपी अभिषेक दीक्षित को भ्रष्टाचार के आरोप में सरकार ने निलंबित किया

महोबा के कबरई कस्बा के मोहल्ला जवाहरनगर निवासी क्रशर कारोबारी इंद्रकांत त्रिपाठी ने 7 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधि‍त करते हुए एक वीडियो जारी किया. उसमें इंद्रकांत ने कहा, ''व्यवसाय में मेरे साझेदार बालकृष्ण द्वि‍वेदी को महोबा के एसपी मणि‍लाल पाटीदार ने बुलाकर छह लाख रुपए प्रति माह देने को कहा. हर महीने धन न देने पर अनेक मुकदमे लगाने और हत्या की धमकी दी गई. इसके चलते भयवश जून और जुलाई में एसपी महोबा को छह-छह लाख रुपए दिए गए. बाद में कारोबार में घाटा होने से एसपी को और पैसा दे पाने में असमर्थता जताई. इसके बाद भी रुपए देने का दबाव डाला जा रहा है.'' वीडियो वायरल होने के अगले ही दिन अज्ञात लोगों ने इंद्रकात पर गोली चला दी जो उनके गर्दन पर लगी. इंद्रकांत कानपुर के एक अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं. मुख्यमंत्री ने गृह विभाग से मामले की जांच कराई. प्रारंभि‍क जांच में घटना सही पाई गई. 9 सितंबर को योगी आदित्यनाथ ने मणि‍लाल पाटीदार को निलंबित कर दिया.


भ्रष्टाचार के आरोप में पाटीदार का निलंबित करने से 24 घंटे पहले प्रयागराज में पुलिस विभाग के मुखि‍या अभि‍षेक दीक्षि‍त पर मुख्यमंत्री योगी की गाज गिरी थी. प्रयागराज के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के रूप में महज 84 दिन बिताने के दौरान अभि‍षेक की शि‍कायतें सरकार के सामने पहुंचने लगी थीं. प्रयागराज के एसएसपी के रूप में पुलिस चौकियों पर तैनाती के लिए 50 दारोगाओं की पहली सूची पर ही भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे थे. हद तो तब हुई जब घूरपुर में सरकारी जीप से बाजार में किसानों की सब्जी रौंदने के आरोप में मुख्यमंत्री के निर्देश पर निलंबित किए गए दारोगा सुमित आनंद को अरैल चौकी का प्रभारी बना दिया.

इसके बाद थानेदारों की तैनाती पर भी सवाल खड़े हुए थे. एक पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ने ट्वीट कर प्रयागराज पुलिस के अधि‍कारियों पर माफि‍या से मिलीभगत का आरोप लगाते हुए सवाल उठाए थे. मुख्यमंत्री ने गृह विभाग की जांच के आधार पर अभि‍षेक को 8 सितंबर को निलंबित कर दिया. मुख्यमंत्री ने मणि‍लाल पाटीदार और अभि‍षेक दीक्षिंत पर विजिलेंस जांच का आदेश दिया है.


उत्तर प्रदेश में लॉकडाउन खत्म होने के बाद अचानक अपराधि‍यों की बढ़ी सक्रियता के बीच अधि‍कारि‍यों की गड़बडिय़ां पुलिस की छवि बिगाड़ रही है. मुख्यमंत्री योगी ने सत्ता संभालने के बाद प्रदेश में पुलिस सुधार की कई योजनाएं लागू की पर अधि‍कारियों का भ्रष्ट रवैया आम जनता तक इसका असर पहुंचने में बाधक बना हुआ है. (देखें बॉक्स: अपराध में डूबे अफसर). अनलॉक के दौरान घटी ज्यादातर आपराधि‍क घटनाओं में पुलिस अधि‍कारियों और कर्मचारियों की गड़बड़िनयां सामने आई हैं. पिछले दो महीने के दौरान दो दर्जन से अधि‍क पुलिस अधि‍कारियों पर कार्रवाई हुई है. सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद कहते हैं, ''अपराध रोकने या न रोकने से अधि‍कारी की पहचान हो तो वह इस पर ध्यान दे. जब तक यह पैमाना नहीं होगा लाख कोशि‍शों के बावजूद पुलिस का चेहरा नहीं बदल सकता.''

पुलिस का चिरपरिचित टालू रवैया
गोरखपुर के रामगढ़ताल इलाके से 6 अगस्त को अपहृत 35 वर्षीय सर्वेश सिंह को खोज पाने में पुलिस नाकाम रही. एक महीने बाद 8 सितंबर को सर्वेश का सिर कटा शव बिहार के गया जिले के बेलागंज थाना क्षेत्र में मिला. बोलेरो सवार बदमाशों ने असलहे के बल पर सर्वेश का घर के पास से अपहरण कर लिया था. सर्वेश की मां किशोरी देवी का आरोप है कि अपहरण का केस दर्ज कराने के लिए वे कई बार थाने गईं लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी. हालांकि रामगढ़ ताल थाने के प्रभारी सत्य सान्याल शर्मा के मुताबिक, महिला ने थाने में कोई शि‍कायत नहीं दर्ज कराई थी. लेकिन प्रदेश में पिछले दो महीने में गोरखपुर, कानपुर, कानपुर देहात, गाजियाबाद, गोंडा समेत कई जिलों में एक दर्जन से अधि‍क अपहरण की वारदातें सामने आ चुकी हैं.

अचानक अपहरण की घटनाओं में तेजी आने के पीछे की वजह सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक आर.एस. सिंह बताते हैं, ''लॉकडाउन के दौरान काम धंधा बिल्कुल बंद रहा. अपराध भी न्यूनतम थे. लॉकडाउन में काम-धंधा मंदा होने के कारण लोगों की आर्थिक स्थिति काफी गड़बड़ा गई है. एक झटके में काफी पैसों का इंतजाम करने के लिए अपहरण की वारदातें बढ़ गई हैं. पुलिस का टालू रवैया इन घटनाओं को और बढ़ा रहा है.'' इसी तरह गोरखपुर में प्रॉपर्टी डीलर दयानंद ने पान कारोबारी के बेटे बलराम का अपहरण कर एक करोड़ रुपए फि‍रौती वसूलने की साजिश रची थी. मामला उलटा पड़ता देखा तो उसने खुद को बचाने के लिए 14 वर्षीय मासूम को गला घोंटकर मार डाला.


वैसे अपहरण के कुछ मामलों में पुलिस ने सूझबूझ और तेजी दिखाते हुए न केवल सही-सलामत मुक्त कराया बल्कि अपहरणकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया है. गोरखपुर में एडिशनल एसपी रहे रामचंद्र श्रीवास्तव बताते हैं, ''जिन मामलों में अपहरण की सूचना मिलते ही पुलिस ने तत्परता दिखाई, उनमें से ज्यादातर अपहृत सकुशल मुक्त कराए गए हैं. ऐेसे मामले जिनमें अपहर्ता पहचान का होता है उनमें वह ज्यादातर में जेल जाने से बचने के लिए अपहृत की हत्या कर देता है. ऐसे मामले में पुलिस की ढिलाई भारी पड़ती है.'' अपहरण के मामलों में पुलिस की लापरवाही सामने आने पर पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) हितेश चंद्र अवस्थी ने अधि‍कारियों को निर्देश जारी किए हैं. उन्होंने वारदात की सूचना मिलते ही तत्काल घटनास्थल का निरीक्षण करने, अपहरण के मामलों में उचित धारा में केस दर्ज करने तथा फि‍रौती के लिए अपहरण से जुड़े वारदातों में प्रथम सूचना रिपोर्ट धारा 364 ए के तहत अविलंब दर्ज करने के साथ अपहृत की सकुशल बरामदगी के लिए अलग से टीम गठित करने के निर्देश दिए हैं.

कार्रवाई की रस्म आदयगी
पुलिस अधि‍कारियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने संबंधी आरोप वाले गौतमबुद्ध नगर के पूर्व एसएसपी वैभव कृष्ण के वायरल वीडियो के सही पाए जाने पर सरकार ने 9 जनवरी को उन्हें निलंबित कर दिया था. वैभव ने जिन आइपीएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, उनकी प्रारंभि‍क पुष्टि‍ होने पर बांदा के एसपी गणेश पी. साहा समेत पांच पुलिस अधि‍कारियों को पद से हटा दिया था. लेकिन फिर साहा एसपी मानवाधिकार बनाए गए और 16 अगस्त को इन्हें गौतमबुद्ध नगर का उपायुक्त बना दिया गया. वैभव कृष्ण की ओर से गाजियाबाद के पूर्व एसएसपी सुधीर कुमार सिंह समेत पांच आइपीएस अफसरों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप की गोपनीय रिपोर्ट सोशल मीडिया में वायरल हुई थी.

इसी वर्ष 9 जनवरी को सरकार ने सुधीर कुमार सिंह का तबादला कर उन्हें 15वीं वाहिनी पीएसी आगरा में तैनात कर दिया. इसके बाद सुधीर कुमार सिंह को एसएसपी एसटीएफ बनाया गया. 17 अगस्त को सुधीर को आजमगढ़ का एसएसपी बना दिया गया. नाम न छापने की शर्त पर पुलिस मुख्यालय में तैनात एक वरिष्ठ अधि‍कारी बताते हैं कि आंतरिक सरकारी जांच में साहा और सुधीर पर सीधे तौर पर किसी गड़बड़ी में लिप्त होने की बात सामने नहीं आई थी, इसलिए इन दोनों अफसरों को क्लीनचिट दे दी गई.


लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप पर अधि‍कारियों के निलंबन और फि‍र उन्हें प्राइम पदों पर तैनात करने को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग में सहायक प्रोफेसर और यूपी की अफसरशाही पर रिसर्च करने वाले ज्ञानेंद्र कुमार पांडेय बताते हैं, ''अगर सरकार ने किसी अधि‍कारी को एक रिपोर्ट के आधार पर निलंबित किया है और बाद में दूसरी रिपोर्ट के आधार पर निलंबन खत्म कर बेहतर पोस्टिंग दे दी है तो इससे दो बातें सामने आती हैं—या तो पहली रिपोर्ट गड़बड़ थी जिसके आधार पर अधि‍कारी का निलंबन हुआ या दूसरी रिपोर्ट सही नहीं है जिसके आधार पर अधि‍कारी बहाल हुआ.'' लोक प्रशासन के जानकार अधि‍कारी को निलंबित करने के बाद उसे और अच्छी पोस्टिंग देने पर जनता के बीच गलत संदेश जाने की बात भी कह रहे हैं.

लखनऊ विश्वविद्यालय मे लोक प्रशासन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर संजीव गुप्ता बताते हैं, ''निलंबन के कुछ समय बाद अधि‍कारियों को अच्छी पोस्टिंग मिल जाने से उन पर सरकार का खौफ खत्म होने लगता है. इससे ईमानदार अधि‍कारियों में नकारात्मकता का भाव पैदा होता है जिसका असर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर पड़ता है.''

प्रयोगों से भी न बदली सूरत
मार्च 2017 में पद संभालते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस महकमे की सूरत बदलने का दावा किया था. इसके लिए प्रयोग शुरू हुए. आमतौर पर सरकार के बदलते ही पूर्ववर्ती सरकार में तैनात डीजीपी और प्रमुख सचिव गृह को फौरन हटाकर उनकी जगह नए अधिकारी की तैनाती कर दी जाती थी. योगी आदित्यनाथ ने पहला प्रयोग किया कि पूर्ववर्ती सपा सरकार में तैनात हुए जावीद अहमद को एक महीने से ज्यादा समय तक डीजीपी बनाए रखा. कुछ ऐसी ही दरियादिली पूर्व प्रमुख सचिव गृह देवाशीष पांडा के साथ भी दिखाई जो दो महीने तक पद पर काबिज रहे.


इसके बाद मई, 2017 में नई व्यवस्था के तहत प्रदेश के जोन में अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) स्तर के अधिकारी और रेंज में पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) स्तर के अधिकारियों की तैनाती शुरू की गई. पर पुलिस की कार्यप्रणाली बदलने में यह व्यवस्था भी बहुत कारगर साबित न हो सकी. पुलिस महानिदेशक कार्यालय में तैनात एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, ''डीजीपी के बाद एडीजी (कानून और व्यवस्था) महत्वपूर्ण पद है. लेकिन जोन में भी एडीजी की तैनाती से अधिकारों को लेकर कई बार टकराव की स्थिति बन जाती है. इस व्यवस्था की यह सबसे बड़ी खामी है.'' गृह विभाग में एक समय चार सचिव स्तर के पद थे.

इनमें तीन आइएएस और एक आइपीएस स्तर के अधि‍कारी तैनात होते थे. इसकी वजह यह थी कि पीएसी, कानून-व्यवस्था, यातायात, कारागार, प्रमुख स्थलों की सुरक्षा के बारे में समन्वय स्थापित करने का काम सचिव स्तर के अधि‍कारी के जरिए ही किया जाता था. अब कोई भी आइएएस अफसर गृह विभाग में सचिव के पद पर काम नहीं करना चाहता. यही वजह है कि पिछले तीन वर्षों से गृह विभाग में केवल एक ही आइपीएस अधिकारी सचिव पद पर तैनात हैं. प्रदेश में बढ़ते अपराध की चुनौती को देखते हुए योगी सरकार तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की तर्ज पर प्रमुख सचिव गृह के पद पर आइपीएस अफसर की तैनाती की योजना बना रही है.


हालांकि, 'ईज आफ डूइंग बिजनेस' की रैंकिंग में यूपी के देश में दूसरा स्थान पाने को पुलिस विभाग के अधि‍कारी प्रदेश में औद्योगिक सुधारों के साथ कानून व्यवस्था में सुधार (देखें बॉक्स) का नतीजा भी मान रहे हैं. अधि‍कारी मानते में कि कानून-व्यवस्था अप्रत्यक्ष रूप से 'ईज आफ डूइंग बिजनेस' का महत्वपूर्ण आयाम है. आंकड़े भले ही अफसरों के दावे की पुष्टि‍ कर रहे हैं पर अभी इस पर जनता की मुहर लगना बाकी है.

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