पश्चिम बंगालः तृणमूल युवराज
ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने पार्टी पर पकड़ मजबूत की और 2021 की बड़ी चुनावी जंग के मुख्य सूत्रधार बने

फोन पर अलर्ट आता है और कॉन्फ्रेंस रूम में खामोशी छा जाती है, जहां कुछ पल पहले तक सांसद, विधायक और कैबिनेट मंत्री गप्पें मार रहे थे. स्मोकिंग जोन में धुआं उड़ा रहे लोग सिगरेट फेंककर अपनी कुर्सियों की ओर भागते हैं. कोलकाता के पूर्वी मेट्रोपॉलिटन बाइपास पर स्थित तृणमूल कांग्रेस भवन के बाहर सादे कपड़ों में तैनात पुलिसवालों ने तकरीबन 50 समर्थकों के बीच रास्ता बनाया और आठ कारों के काफिले को अंदर जाने दिया.
मुख्य प्रवेश पर एक काली टोयोटा फॉरर्च्यूनर से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ‘युवराज’ अभिषेक बनर्जी उतरे और बिना इधर-उधर देखे भीतर चले गए. पार्टी के कुछ वरिष्ठ लोग उन्हें देख खड़े हो गए. दो-एक नेताओं के साथ दो-चार बातें हुईं और फिर हॉल में सन्नाटा छा गया.
कुछ मिनट बाद, भूरे रंग की हुंडई आई-20 कार आती है. बिना किसी तामझाम और बिना बीकन के. सामने की सीट पर बैठी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कार से उतरती हैं और इंतजार कर रहे लोगों का हाथ हिलाकर अभिनंदन करती हुई कॉन्फ्रेंस रूप में प्रवेश करती हैं. कुछ देर पहले जहां सन्नाटा पसरा था, उस हॉल में जैसे रौनक लौट आई है. बातचीत शुरू हो जाती है, और ममता के बैठने के साथ ही वहां मौजूद उनके पुराने साथियों के बीच सहज माहौल बन जाता है.
ममता और अभिषेक एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं. ममता जहां जीवन को सादगीपूर्ण रखना पसंद करती हैं, तो उनके भतीजे को चकाचौंध लुभाता है. दीदी का अंदाज दोस्ताना है और वे सबके साथ बात करना पसंद करती हैं तो अभिषेक गंभीर और मित्तभाषी हैं. ममता ने छात्र नेता से लेकर केंद्रीय मंत्री और फिर मुख्यमंत्री तक, अपने संघर्ष के बूते राजनीति का हर सोपान चढ़ा है. इसके विपरीत अभिषेक को सब कुछ दीदी की लोकप्रियता और तृणमूल के दिग्गजों की मेहनत की बदौलत मिला है.
अभिषेक का उदय
पार्टी प्रबंधन, उम्मीदवारों का चयन, जिम्मेदारियां बांटना या फिर संसाधन जुटाने का काम, तृणमूल में सब कुछ अभिषेक की पसंद से होता है. 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान, जब अभिषेक ने 'प्रतिद्वंदी-विहीन पंचायत’ का आह्वान किया, तो तृणमूल ने 30 प्रतिशत से अधिक सीटें बिना किसी मुकाबले के ही जीत लीं.
2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल जब भाजपा से केवल चार अधिक सीटें (बंगाल की 42 में से 22 तृणमूल और 18 भाजपा) ही जीत पाई तो भी अभिषेक के दबदबे में रत्तभीर कमी नहीं आई. अभिषेक को ही 2021 के विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है.
उन्होंने ही पिछले जून में प्रशांत किशोर और उनकी आइपैक (इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी) को जोड़ा. ‘युवा योद्धाओं’ की फौज बनाने के तृणमूल के ‘जुबो शक्ति (युवा शक्ति)’ अभियान का नेतृत्व भी अभिषेक ही कर रहे हैं.
ममता के भाई अमित और पत्नी लता के बेटे और दीदी के आठ भतीजों-भतीजियों में सबसे बड़े, 32 वर्षीय अभिषेक इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग ऐंड मैनेजमेंट में अध्ययन करने के बाद दिल्ली में अपना करियर तलाश रहे थे. वे 2006-07 में छात्र राजनीति या फिर ममता के सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन में सक्रिय नहीं थे.
तृणमूल के एक पुराने नेता कहते हैं, ‘‘अभिषेक ममता के कोलकाता के धरनों में या फिर सिंगूर में कुछ समय के लिए मेहमान की तरह आए थे. उन्होंने सार्वजनिक मंच पर भाषण नहीं किया, न ही रैलियों के आयोजन का कोई अनुभव है.’’ दरअसल, तृणमूल युवा शाखा के तत्कालीन अध्यक्ष शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम आंदोलन में सबसे आगे थे.
उन्होंने ही राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में वामपंथियों का वर्चस्व तोड़ा. कहा जाता है कि अधिकारी पर लगाम कसने के लिए ममता ने अपने तब के खासमखास मुकुल रॉय की सलाह पर 2011 में एक नया युवा संगठन तृणमूल युवा बनाया और अभिषेक को इसका अध्यक्ष बना दिया.
अभिषेक ने तृणमूल युवा को कॉर्पोरेट शैली में चलाया. 30 रुपए में सदस्यता दी गई और कैप, टी-शर्ट, बैनर की बाजार में बाढ़ आ गई. पहले तृणमूल में रहे, अब बैरकपुर से भाजपा सांसद अर्जुन सिंह दावा करते हैं, ‘‘बड़े-बड़े होर्डिंग्स और दूसरे तामझाम से संगठन ने अपनी पहचान दर्ज कराने की कोशिश की. सदस्यता शुल्क से इसने 28 करोड़ रुपए कमाए, लेकिन राजनैतिक रूप से इसने कोई छाप नहीं छोड़ी.’’
24 फरवरी 2012 को अभिषेक ने नई दिल्ली में भव्य तरीके से शादी रचाई, जिसका इंतजाम उनके ससुराल पक्ष ने किया था. ममता उस शादी में शामिल नहीं हुईं, जबकि तब वे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ एक बैठक के लिए राष्ट्रीय राजधानी में ही मौजूद थीं. लेकिन ममता और अभिषेक के बीच अगर तब कोई मतभेद रहा भी हो, तो वह कभी खुलकर सामने नहीं आया.
ममता को अभिषेक की मां लता से हमेशा भावनात्मक समर्थन मिला है और हो सकता है कि इस वजह से ही मतभेदों को दरकिनार कर दिया गया हो. जुलाई 2013 में अभिषेक की बेटी अजानिया के जन्म पर ममता ने अपने करीबियों से कहा था कि अजानिया के रूप में उनकी मां गायत्री देवी का पुनर्जन्म हुआ है जो 2011 में गुजर गई थीं. ममता को सात साल की अजानिया के साथ गहरा लगाव है और वे अक्सर उसे अपने घर लेकर आती हैं.
2014 में, सोमेन मित्रा के तृणमूल नेतृत्व के साथ मतभेदों के कारण इस्तीफा देने से जब दक्षिण 24 परगना जिले की डायमंड हार्बर लोकसभा सीट खली हो गई तो सुब्रत बख्शी और पार्थ चटर्जी जैसे पार्टी के वरिष्ठों ने अभिषेक को कहा कि आगामी चुनाव में वे इस सीट से खुद लड़ें. दक्षिण 24 परगना में मजबूत आधार रखने वाले शोभन चटर्जी ने भी भरपूर साथ दिया और अभिषेक के लिए रास्ता आसान हो गया.
अभिषेक माकपा के अबुल हसनत खान को हराकर 26 साल की उम्र में उस समय सबसे युवा सांसद बने. उसी वर्ष, तृणमूल में उन्होंने अधिकारी को किनारे लगाना शुरू कर दिया और अधिकारी की जगह अपने करीबी सौमित्र खान को पार्टी की युवा इकाई का अध्यक्ष बना दिया और फिर कुछ ही महीनों के भीतर, खुद अध्यक्ष बन गए.
इसके बाद मुकुल रॉय के साथ उनका टकराव हुआ. माना जाता है कि रॉय को पार्टी से बाहर कराने में अभिषेक की बड़ी भूमिका रही क्योंकि रॉय की अपनी महत्वाकांक्षा और ममता के साथ उनकी निकटता युवराज को अपने आगे बढऩे की राह में बाधा लगती थी. जल्द ही, पार्टी के संसाधनों और क्षेत्र पर प्रभुत्व को लेकर शोभन चटर्जी के साथ भी उनका मतभेद हो गया.
रॉय 2017 में भाजपा में शामिल हुए और दो साल बाद चटर्जी भी चले गए. दोनों ने ममता पर आरोप लगाया कि वे वंशवादी राजनीति को प्रश्रय दे रही हैं और इसी कारण उन्होंने पार्टी छोड़ी. अगर ममता के मन में उनके जाने को लेकर कोई अलग विचार रहा हो, तो भी उन्होंने कभी इसे सार्वजनिक नहीं किया.
लेकिन इसने पार्टी पर अभिषेक की अजेय पकड़ का मार्ग प्रशस्त किया. इसके साथ ही, इससे बगावत का मन बना रहे अन्य लोगों को संदेश मिल गया: सुधरो या टूटो. दीदी ने अक्तूबर 2016 में मुर्शिदाबाद की एक रैली से लौटते समय अभिषेक के साथ हुई एक बड़ी दुर्घटना के बाद शायद ही कभी अपनी कोई नाराजगी व्यक्त की.
विवादास्पद छवि
साल-दर-साल जैसे-जैसे अभिषेक का दबदबा बढ़ता गया, पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह उन पर आरोप-प्रत्यारोप लगने लगे. उन पर मवेशी तस्करी या अवैध रेत या कोयला खनन जैसे छोटे-मोटे अपराधों तक को पूरा संरक्षण देने के आरोप लगने लगे.
अभिषेक तड़क-भड़क वाली जिंदगी से जरा भी परहेज नहीं करते. बड़ी एसयूवी में चलते हैं, अपनी बुआ के सादगीपूर्ण आशियाने से एकदम उलट कोलकाता के भवानीपुर में आलीशान बंगले में रहते हैं और आसपास ब्लैक कमांडो और कारों का काफिला रहता है.
अभिषेक हर साल फुटबॉल, क्रिकेट और अन्य खेलों को बढ़ावा देने के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में युवा उत्सव का आयोजन करते हैं. दक्षिण 24 परगना के एक तृणमूल सदस्य का दावा है, ''अभिषेक युवा उत्सव में यो यो हनी सिंह या रूसी बैले डांसर ग्रुप को बुलाते हैं. वे इन आयोजनों पर हर साल 15-20 करोड़ रुपए खर्च करते हैं.’’
तृणमूल के कुछ नेताओं का मानना है कि अभिषेक बिना ममता के आशीर्वाद ऐसा नहीं बन सकते. नाम न छापने की शर्त पर बंगाल के एक कैबिनेट मंत्री कहते हैं, ''उन्हें कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा. शुरू में, ये चीजें उन्हें पार्टी सुप्रीमो की ओर से दी गईं और बाद में उन्होंने यह सब खुद ले लिया—सुप्रीमो को भी लूप में नहीं रखा गया.’’
दीदी का द्वंद्व
अब तक, ममता ने राजनैतिक वारिस जैसी किसी भी बात को खारिज कर दिया है. वे कहती हैं, ''बंगाल की जनता मेरा परिवार है. मैंने अपनी कोई राजनैतिक वसीयत नहीं तैयार की है. मैं ऐसे नेताओं की पांच पीढिय़ां तैयार कर रही हूं, जो मेरे नहीं रहने पर भी पार्टी को आगे ले जाएंगी.’’ लेकिन चीजें दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ हैं.
2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल को भाजपा से जो झटका मिला, उससे ममता हिल गई हैं. शायद यही कारण है कि वह प्रशांत किशोर की सेवाएं लेने के अभिषेक के सुझाव पर सहमत हो गईं, भले ही पार्टी में बड़े हेर-फेर की सिफारिश और ममता की छवि को फिर से गढऩे को लेकर तृणमूल में बहुत नाराजगी है. एक अन्य मंत्री कहते हैं, ''उन्हें (ममता को) भाषण पढ़ते देखकर दुख होता है, जो किशोर लिखते हैं.
पार्टी में अभिषेक के वफादारों को पार्टी में ज्यादा से ज्यादा जगह दी जा रही है और उन्हें अपमानित किया जा रहा है जो अपने दम पर नेता बने हैं.’’ कई जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार किए जाने के मुद्दे पर मंत्री कहते हैं, ''पार्टी में हाल ही में हुई फेर-बदल उन नेताओं को दरकिनार करने के लिए की गई थी जो अभिषेक के लिए चुनौती थे. सभी प्रमुख पदों और जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिए जाने वाले पहले व्यक्ति थे शुभेंदु अधिकारी और इसके बाद राजीब बनर्जी की बारी आई.’’
तृणमूल जिला पर्यवेक्षकों के पद से वरिष्ठ और राजनैतिक रूप से अनुभवी नेताओं को हटा दिया गया है. इसकी जगह, प्रत्येक जिले को चेयरमैन, जिला अध्यक्ष और एक सात-सदस्यीय संचालन समिति के परामर्श से चलाया जाएगा और इसमें अभिषेक की पूरी दखल होगी. पश्चिम बर्दवान के एक नेता कहते हैं, ''हमने कुछ नहीं कहा होता अगर वे उन नेताओं को जिम्मेदारियां देते जिन्होंने काम करके दिखाया है. बांकुड़ा के युवा अध्यक्ष श्यामल सांतरा को वापस लाया गया है, जिन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में लोगों ने खारिज कर दिया था.’’
अभिषेक के करीबियों में गिने जाने वाले एक मंत्री के अनुसार, अधिकारी के पर कतरने का प्रयास जान-बूझकर किया गया है: ''वे (अभिषेक) ऐसा कर रहे है क्योंकि वे जानते है कि शुभेंदु पार्टी छोडऩे जा रहा है. शुभेंदु पर पार्टी की निर्भरता को कम करने के लिए ऐसा करना जरूरी था.’’ लेकिन शुभेंदु अधिकारी ही अकेले नहीं हैं.
तृणमूल के साथ शुरू से जुड़े रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कथित तौर पर अभिषेक की आक्रामक युवा ब्रिगेड हमले कर रही है. दक्षिण 24 परगना, कूच बिहार, अलीपुरद्वार और मुर्शिदाबाद जिलों में पार्टी के युवा और मूल संगठन के बीच हिंसक टकराव चल रहा है, जिसमें सौ से अधिक राजनैतिक कार्यकर्ता जान गंवा चुके हैं.
विपक्ष को अभिषेक के रूप में ममता के कवच में एक छेद दिख गया है. उसने अभिषेक पर जबरन वसूली और ममता पर वंशवादी राजनीति का आरोप लगाना शुरू कर दिया है. कोलकाता की एक रैली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, ‘‘अगला मुख्यमंत्री बंगाल का बेटा होगा, जो जनता के बीच काम करके नेता बनेगा. तृणमूल के युवराज की तरह उसे गद्दी नहीं सौंपी जाएगी.’’
ममता ने कभी ऐसा नहीं कहा कि मेरा कोई वारिस है. वे हमेशा यही कहती रही हैं कि ''बंगाल के लोग ही मेरा परिवार हैं’’, लेकिन राजनैतिक जानकार अभिषेक के बेरोकटोक दबदबे में इजाफे का संदेश कुछ और ही समझ रहे हैं