खस्ताहाल खुदरा बाजार

कोरोना लॉकडाउन का प्रत्यक्ष तौर पर सबसे ज्यादा असर खुदरा बाजार पर पड़ा है, जहां कारोबार चौपट होने के साथ बेहिसाब रोजगार छिन गए

चंद्रदीप कुमार
चंद्रदीप कुमार

दिल्ली-नोएडा की सीमा पर स्थित न्यू कोंडली मार्केट किराने का प्रमुख बाजार है. यहां से आप देश में असंगठित रिटेल की मौजूदा तस्वीर आसानी से खींच सकते हैं. सामान्य दिनों में खचाखच भरे रहने वाले बाजार में इस समय खास हलचल नहीं हैं. इक्का-दुक्का रिक्शे हैं, लोडिंग-अनलोडिंग करने वाले मजदूर बड़ी संख्या में अपने घरों को जा चुके हैं. जिन दुकानों में कभी 3-4 लड़के भी कम पड़ते थे अब एक ही काफी है. यहां के थोक व्यापारी वीरेंद्र सिंह कहते हैं, ''सन् 1993 से इसी बाजार में बैठा हूं, कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी. जरूरी चीजों के लिए लॉकडाउन नहीं है फिर भी धंधा केवल 25 फीसद रह गया.'' स्कूल कॉलेज बंद होने से कैंटीन के ऑर्डर नहीं आ रहे, नोएडा के पीजी खाली होने से वहां के ऑर्डर आने बंद हो गए, बाजार की सभी 200 दुकानों का हाल कमोबेश एक-सा है. असंगठित क्षेत्र में फूड और ग्रॉसरी की हिस्सेदारी 65 फीसद है.

संगठित क्षेत्र भी कोरोना के कहर से बुरी तरह प्रभावित हुआ. न्यू कोंडली से महज सात किलोमीटर दूर दिल्ली-एनसीआर का सबसे बड़ा मॉल 'द मॉल ऑफ इंडिया' है. शहर के अन्य मॉल्स की तरह इसे भी बंद हुए दो महीने से ज्यादा हो गए. लॉकडाउन से पहले देश-विदेश के विभिन्न ब्रांड यहां मौजूद थे. लेकिन क्या लॉकडाउन खुलने के बाद यह मॉल फिर पहले की तरह गुलजार होगा? इस पर गहरा संशय है. द शॉपिंग सेंटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एससीएआइ) के मुताबिक, सरकार की ओर से जरूरी राहत पैकेज नहीं दिया गया तो 500 से ज्यादा शॉपिंग सेंटर दिवालिया हो जाएंगे, जिससे बैंक के 25,000 करोड़ रुपए के कर्ज के भी डूबने का खतरा है. देश के साढ़े चार सौ से ज्यादा ए ग्रेड के मॉल्स के भी दरवाजे बंद हैं.

मांग टूटी तो नौकरियां गईं

लॉकडाउन के दौरान न मॉल खुले न बाजार सजे. घरों में कैद लोग कई जरूरत की चीजें भी खरीदने से महरूम रहे. यही कारण है कि खपत बुरी तरह टूटी और आर्थिक विकास दर के शून्य से नीचे चले जाने के अनुमान सामने आने लगे. जीडीपी में खपत की करीब 60 फीसद हिस्सेदारी है. टूटी हुई मांग जल्द रफ्तार पकड़ेगी, इस पर गहरा संदेह है, इसी वजह से सैकड़ों कारोबार तबाह होने और करोड़ों नौकरियां जाने की भविष्यवाणियां सामने हैं. रिटेल सेक्टर 4.6 करोड़ लोगों को रोजगार देता है. लॉकडाउन से हुए नुक्सान का आकलन दिन के हिसाब से करते हुए कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के अध्यक्ष प्रवीण खंडेलवाल कहते हैं, ''सप्लाइ और बिक्री ठप रहने से 55 दिनों में 8.25 लाख करोड़ रुपए का नुक्सान हुआ. लॉकडाउन खुलने के बाद भी चीजें पटरी पर आते-आते 60 दिन लग जाएंगे.

असंगठित क्षेत्र से जुड़े 20 फीसद व्यापारी इस चोट को नहीं झेल पाएंगे और कारोबार बंद करने को मजबूर हो जाएंगे.'' उन्होंने असंगठित क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रभावित एफएमसीजी क्षेत्र को बताया और सबसे बड़ी चुनौती पैसे का अभाव, क्योंकि लॉकडाउन के बाद पैसे की आमद तो रुकी लेकिन किराए, बिजली के बिल और सैलरी जैसे खर्चे जस के तस बने रहे. असंगठित रिटेल में फूड और किराने की सामग्री जैसी आवश्यक वस्तुओं की हिस्सेदारी आधी है जबकि बाकी हिस्सेदारी गैर-जरूरी चीजों की है. अगर रिटेल में 10 लाख नौकरियां जाती हैं तो इससे 50 से 60 लाख से ज्यादा लोगों पर असर पड़ेगा. अगले 9 महीने में गैर-खाद्य रिटेल पर सबसे ज्यादा असर पडऩे वाला है. परिधान और टेक्सटाइल सेक्टर में घरेलू और वैश्विक बाजार में मांग सीमित रहने का सबसे ज्यादा असर नौकरियों पर पड़ेगा.

सरकार की ओर से दिए गए राहत पैकेज पर टिप्पणी करते हुए रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आरएआइ) के सीईओ कुमार राजगोपालन कहते हैं, ''सरकार के आर्थिक प्रोत्साहन के तहत उठाए गए कदमों से लंबे समय में मदद मिलेगी लेकिन तत्काल कोई राहत नहीं. रिटेल उद्योग के सामने जो चुनौतियों अभी हैं उनका कोई समाधान नहीं किया गया है. रिटेल विक्रेताओं को मजदूरी देने के लिए सहायता, कार्यशील पूंजी के मूलधन और ब्याज के भुगतान पर रोक लगवाने की आवश्यकता थी.'' लेकिन ऐसा नहीं हुआ. रिटेलर्स को रोजगार बनाए रखने के लिए अपने हाथों में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है.

मौसमी कारोबार पड़े ठंडे

कई ऐसे कारोबार हैं जिनके लिए भीषण गर्मी ही पीक सीजन है. मसलन, कपड़ों में हाफ टी-शर्ट और इलेक्ट्रॉनिक्स में कूलर, एसी, फ्रिज. लॉकडाउन ने इन कारोबारियों का एक तरह से पूरा साल ही खराब कर दिया. 22,000 तरह के अंडरगारमेंट्स बनाने के लिए 2004 से लिम्का बुक में नाम दर्ज कराने वाले गाजियाबाद के होजरी गारमेंट्स निर्माता और विक्रेता रजनीश बंसल कहते हैं, ''गर्मी का सीजन पूरा चला गया. हमारे पास पूरा स्टॉक गोदाम में पड़ा है. आने वाले दिनों में प्राइस वार हो जाएगा.

हाफ स्लीव का मार्केट खत्म हो गया है. लॉकडाउन खुलते-खुलते फुल स्लीव का सीजन आ जाएगा. सरकार हमें थोड़ी छूट देती तो हम टी-शर्ट गर्मी के मौसम में बेच लेते. हमारा 35 फीसद कारोबार नहीं हुआ है.'' मंगली होजरी नामक फैक्टरी और शोरूम के मालिक बंसल का मुख्य कारोबार दिल्ली-एनसीआर और उत्तर प्रदेश में है और बहुत जल्द उन्हें सप्लाइ में तेजी आने की उम्मीद नहीं दिखती.

गाजियाबाद-नोएडा इलेक्ट्रॉनिक्स वेल्फेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष संदीप गर्ग कहते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स और एसी, फ्रिज की सेल साल में शादी और कारोबार के सीजन यानी जो वक्त लॉकडाउन के दौरान निकल गया, उसी समय होती है. वे कहते हैं, ''हमारी स्थिति किसानों की तरह है—साल भर की दो-तिहाई से ज्यादा बिक्री हम इसी सीजन में करते हैं और साल भर खाते हैं. कोरोना ने पूरा कारोबार चौपट कर दिया है.'' इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबारियों को अब नवंबर के शादी सीजन से पहले राहत की उम्मीद नहीं है. इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों ने नवंबर में ही डिस्ट्रीब्यूटर्स से कह दिया था कि माल अभी ले लो चीन में कोरोना है, बाद में माल नहीं आ पाएगा. व्यापारियों ने माल ले लिया. अब मार्च से ही सीजन में लॉकडाउन आ गया इसलिए बिक्री नहीं हो रही है. गर्ग बताते हैं, ''गोदामों के किराये से सामान हमें महंगा पड़ रहा है. इस पर भी कंपनियां सामान सस्ता करने की स्कीम ला रही हैं. इससे हमें फ्रिज-एसी आदि अब और महंगे पड़ेंगे क्योंकि हमें बिना बिक्री के बाकी के खर्च वहन करने पड़ रहे हैं.'' कारोबारी कह रहे हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स शोरूम से करीब आधे कर्मचारियों की नौकरी जाना तय है.

स्टेशनरी का कारोबार भी अपने पीक सीजन में कोरोना की भेंट चढ़ गया है. स्टेशनर्स साल भर की सबसे ज्यादा कमाई इसी सीजन में करते थे. गाजियाबाद में थोक कारोबार से जुड़ी कृष्णा स्टेशनरी के सौरभ चौहान कहते हैं, ''स्कूलों में दाखिले के वक्त यानी मार्च से लेकर मई तक स्टेशनरी बिजनेस का मुख्य समय होता है लेकिन इस बार यह लॉकडाउन की भेंट चढ़ गया है. इस सीजन में कॉपी-रजिस्टर की सबसे ज्यादा डिमांड होती है और कुल बिक्री में ये 70 फीसद है.'' चौहान को करीब 20 लाख रुपए की बिक्री का अनुमान था, पर यह सीजन चला गया. हालांकि अच्छी बात यह है कि लॉकडाउन खुलने के बाद चौहान को स्टेशनरी की डिमांड पर कोई असर पड़ता नहीं दिखता.

संगठित रिटेल की थमेगी रफ्तार

बीते 10 वर्षों के दौरान भारत में सफलता की जो कहानियां गढ़ी गईं उनमें संगठित रिटेल भी है. कई विदेश ब्रांड भारत में आए. प्राइवेट लेबल ब्रांड का बोलबाला बढ़ा. रिटेल चेन ने मेट्रो से निकलकर छोटे शहरों का रुख किया. लेकिन कोरोना के बाद सब कुछ पहले जैसा नहीं रहेगा. कुछेक आउटलेट और 10 हजार स्टोर्स के जरिए कारोबार करने वाली होम एप्लाएंस कंपनी वंडरशेफ के एमडी रवि सक्सेना कहते हैं, ''लॉकडाउन में हमें करीब 10 फीसद ऑनलाइन ऑर्डर मिले लेकिन इनमें से भी आधे रद्द हो गए.'' वे बताते हैं, ''वंडरशेफ का बिजनेस उपभोक्ताओं की जरूरत के नजदीक है. कोरोना लॉकडाउन खत्म हो जाए तब भी लोग बेधड़क बाहर नहीं निकलेंगे. लोग बाहर जाकर खाना कम करेंगे. लोगों का मूड पैसे बचाने वाला है और बाहर का खाना 10 गुना महंगा पड़ता है. इसलिए लोग घर का खाना पसंद करेंगे. ऐसे में एप्लाएंसेज की मांग में तेजी आने की उम्मीद है. लॉकडाउन के दौरान हमारे इलेक्ट्रिक कुकर, न्यूट्री पॉट, टर्बो चॉपर, न्यूट्री ग्लेंड आदि की डिमांड में चार गुना तक तेजी आई है.''

सिर्फ व्यापारियों को किराना और अन्य घरेलू जरूरतों का सामान बेचने वाले लॉट्स होलसेल सॉल्यूशंस के मैनेजिंग डायरेक्टर तनित शेरवॉनोट कहते हैं कि लॉकडॉउन के दौरान फूड और नॉन फूड, दोनों सिगमेंट में मांग रही. लॉकडाउन के पहले चरण में बड़े पैमाने पर आवश्यक वस्तुओं और एफएमसीजी फूड उत्पादों की सेल्स बढ़ी, दूसरे चरण में रेडी टु ईट उत्पादों की बिक्री बढ़ी और तीसरे चरण में हेल्दी स्नैक्स के साथ ब्रांडेड हाइजीन उत्पादों की मांग बढ़ी है. हल्दीराम के पैक्ड उत्पादों के गाजियाबाद के वितरक तिलकराज कहते हैं कि अब सप्लाइ तो सुचारु हो गई है लेकिन प्रोडक्शन नहीं है. उत्पादन 25 फीसद हो रहा है और लेबर न होने से पूरा उत्पादन नहीं हो पा रहा है. डिमांड साधारण है जो माल आएगा बिक जाएगा. रिटेल में एसेंशियल आइटम छोड़कर बाकी सभी सामान की बिक्री पर असर पड़ा है. फूड रिटेलर्स की हालत खराब है.

आरएआइ का सर्वे कहता है कि अगले छह महीनों में फूड रिटेलर्स को पिछले साल के मुकाबले सिर्फ 56 फीसद कमाई होने की उम्मीद है. रिटेल इंडस्ट्री की सबसे उजली तस्वीर देखें तो आरएआइ सर्वे के मुताबिक, 70 फीसद रिटेलर्स को लगता है कि छह महीने में कारोबार पटरी पर आ जाएगा पर 20 फीसद मानते हैं कि इसमें साल भर से ज्यादा वक्त लगेगा.

ई-कॉमर्स का भविष्य

कोविड-19 लॉकडाउन के बीच ई-कॉमर्स के क्षेत्र में बड़ी हलचलें देखी गईं. मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली कंपनी रिलायंस जियो में फेसबुक ने निवेश किया. इससे रिलायंस रिटेल और व्हाट्सऐप के करार के जरिए लोगों को ऑनलाइन से ऑफलाइन स्टोर यानी पड़ोस की किराना दुकान से ऑर्डर करने की सुविधा मिलेगी. इसे न्यू कॉमर्स प्लेटफॉर्म (जियो मार्ट) कहा जा रहा है. व्हाट्सऐप के 40 करोड़ यूजर्स के जरिए रिलायंस भारत के रिटेल बाजार में अलग तरह का धमाका करने जा रहा है. रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी का कहना है कि जियो मार्ट के जरिए करीब 3 करोड़ किराना दुकानें उपभोक्ताओं से डिजिटल लेनदेन कर सकेंगी.

उधर, लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन रिटेल को सिर्फ आवश्यक वस्तुएं सप्लाइ करने की अनुमति थी. अब लॉकडाउन 5.0 के बाद सभी चीजों की डिलिवरी सामान्य होने लगी है पर स्विगी जैसे कई एग्रीगेटर को छंटनी करनी पड़ी. वैसे, मई के दूसरे पखवाड़े में अमेजन ने भारत में 50 हजार अस्थायी कर्मचारियों की भर्ती करने का ऐलान कर साबित कर दिया कि ऑनलाइन रिटेल में कितनी संभावना है.

कोविड के पार—बढ़ेगी लागत

कोरोना का संकट कब तक खत्म होगा, इसका कोई सटीक अनुमान किसी के पास नहीं है. लेकिन यह तय है कि बहुत कुछ पहले जैसा नहीं रहेगा. मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, भीड़ वाले इलाकों में जाने से बचना आदि कुछ ऐसी चीजें हैं जो लॉकडाउन खुलने के बाद ग्राहकों की आदत बन जाएंगी. खंडेलवाल कहते हैं, ''सोशल डिस्टेंसिंग कारोबार की लागत को कम से कम 2 फीसद बढ़ा देगी.'' लागत कैसे बढ़ेगी, इसका अंदाजा ऑल इंडिया जेम्स ऐंड जूलरी डोमेस्टिक काउंसिल के जोनल चेयरमैन (नार्थ) विजय खन्ना की बात से लगाया जा सकता है. वे कहते हैं, ''चर्चा है कि शोरूम में एक बार में पांच कस्टमर ही बैठने दिए जाएं, तो ऐसे में बहुत मुश्किल होगी. दो गज की दूरी पर बैठना पड़ेगा.'' ग्राहकी कम होगी तो स्टाफ की छुट्टी करनी पड़ेगी. वे कहते हैं कि कारीगर और सपोर्ट स्टाफ में 50 फीसद लोगों की नौकरी चली जाएगी.

संकट की घड़ी में कारोबारी रणनीति बदलकर बाजार में अपनी जगह बनाने और हिस्सेदारी बढ़ाने की जुगत लगा रहे हैं. दिल्ली एनसीआर की कई कॉलोनियों में बड़ी एफएमसीजी कंपनियां कार्ट से सामान बेचना शुरू कर चुकी हैं. बदलते समय के साथ और नए कारोबारी मॉडल जन्म लेंगे.

रिटेल भारत में खपत का प्रवेशद्वार है. कुल खपत में रिटेल की 40 फीसद हिस्सेदारी है. रिटेल का पहिया घूमे बिना आर्थिक विकास का गति पकड़ना नामुमकिन है.

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