मध्य प्रदेशः अंडा खाने पर विवाद
कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए आंगनवाडिय़ों में बच्चों के खाने में अंडे शामिल करने के सरकार के कदम का विरोध

मध्य प्रदेश की 97,135 आंगनवाडिय़ों में पंजीकृत नई मांओं और बच्चों को दिए जाने वाले भोजन में अंडे शामिल करने का प्रस्ताव विवादों में घिर गया है. कमलनाथ सरकार का कहना है कि अंडा शामिल किए जाने से कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में मदद मिलेगी जबकि विपक्षी भजपा का कहना है कि यह संस्कृति पर हमला और मांसाहार को बढ़ावा देने का प्रयास है.
यह योजना अगले वित्त वर्ष से शुरू की जाएगी और प्रारंभ में इसमें राज्य के 333 आदिवासी विकास खंडों में से 89 को शामिल करने की बात है. योजना के मुताबिक, 1-6 साल के बच्चों और दूध पिलाने वाली माताओं को हर हफ्ते तीन अंडे दिए जाएंगे. महिला एवं बाल विकास विभाग के अनुसार, इन 89 विकास खंडों में अंडे बांटने पर सालाना 113 करोड़ रु. खर्च आएगा. उल्लेखनीय है कि राज्य की आंगनवाडिय़ों में कुल 62 लाख बच्चे और लगभग सात लाख नई माताएं पंजीकृत हैं.
योजना पर प्रतिक्रिया जताते हुए विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने यह कहकर लोगों को चौंका दिया कि अंडे खाने वाले बच्चे आगे चलकर नरभक्षी हो सकते हैं. योजना से जैन और वैश्य समुदाय के लोग भी नाराज हैं. दिगंबर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के मुखिया प्रदीप कासलीवाल कहते हैं, ''जैन धर्म में अंडे खाना जीवहत्या है. प्रोटीन के शाकाहारी स्रोतों की उपलब्धता के बावजूद अंडे शामिल करना समझ के बाहर है.'' इस समूह ने सरकार के सामने विरोध दर्ज कराया है.
इसके विरोध में भी एक अभियान चल रहा है. राइट टु फूड अभियान ने कमलनाथ सरकार को 17 जिलों के 1,18,000 लोगों के हस्ताक्षरों वाला पत्रक सौंपते हुए भोजन सूची में अंडे शामिल करने की मांग की है.
आलोचनाओं को एक तरफ कर दें तो सरकार की नीयत ठीक लगती है. सन् 2016 में जारी चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में बाल कुपोषण के मामले में मध्य प्रदेश की स्थिति देश के राज्यों में नीचे से तीसरी थी. रिपोर्ट के मुताबिक, यहां के 43 प्रतिशत बच्चों का वजन औसत से कम था, 42 प्रतिशत का विकास बाधित था जबकि 26 प्रतिशत बच्चे अतिगंभीर कुपोषण के शिकार थे. औसत से कम वजन वाले बच्चों का अनुपात आदिवासी क्षेत्रों में सर्वाधिक (51.5 प्रतिशत) था जिसके बाद अनुसूचित जातियों के बच्चे थे (45.9 प्रतिशत). अन्य हिंदुओं में कुपोषित बच्चों का प्रतिशत 43 प्रतिशत, मुसलमानों में 39.9 प्रतिशत और जैन समुदाय के बच्चों में 18.7 प्रतिशत था.
लेकिन केवल अंडा दिया जाना पर्याप्त नहीं होगा. स्थानीय स्वैच्छिक संगठन विकास संवाद के निदेशक सचिन जैन का कहना है कि 2005-06 से 2015-16 की 10 वर्ष की अवधि के विश्लेषण से लगता है कि मध्य प्रदेश को कुपोषण से मुक्त कराने में अभी 50-60 साल लग जाएंगे.
सरकार ने शाकाहारियों को अंडों के स्थान पर केले देने का प्रस्ताव रखा है. हालांकि, महिला एवं बाल विकास के प्रमुख सचिव अनुपम राजन का कहना है, ''अंडों के बारे में अच्छी बात यह है कि इन्हें स्थानीय स्तर पर हासिल किया जा सकता है. जिन 89 आदिवासी-बहुल विकास खंडों में इसे लागू किया जाना है वहां हमारी योजना का कोई विरोध नहीं है.''
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