फिर-फिर आंसू अंखियन में

एक बार फिर प्याज ऊंची कीमतें लेकर सरकार को परेशान करने आ पहुंचा है. मुंबई में इन दिनों प्याज की खुदरा कीमतें 120 रु. प्रतिकिलो चल रही हैं जबकि इसी साल अगस्त में यह 10-30 रु. किलो बिका था

गेट्टी इमेजेज
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एक बार फिर प्याज ऊंची कीमतें लेकर सरकार को परेशान करने आ पहुंचा है. मुंबई में इन दिनों प्याज की खुदरा कीमतें 120 रु. प्रतिकिलो चल रही हैं जबकि इसी साल अगस्त में यह 10-30 रु. किलो बिका था. आंसू निकाल देने वाली इन कीमतों की मुख्य वजह है महाराष्ट्र में बेमौसम बारिश. यह आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के साथ-साथ भारत में प्याज पैदा करने वाले प्रमुख राज्यों में से एक है. भारत प्याज की पैदावार में दुनिया के शीर्ष तीन देशों में से है. 2018-19 में यहां 2.35 करोड़ टन प्याज पैदा हुआ था.

केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, ''यह अब हर बार की बात हो गई है, मानसून लंबा खिंच जाता है जिससे फसलों को नुकसान पहुंचता है और कीमतें बढ़ जाती हैं.'' महाराष्ट्र में प्याज की फसल तीन मौसम में होती है. बेमौसम की बारिश ने खरीफ की फसल खराब कर दी जिसकी खुदाई अक्तूबर-नवंबर में होनी थी. बारिश ने अगले मौसम के लिए दिसंबर में होने वाली बुआई पर भी असर डाला है. महाराष्ट्र के नासिक जिले का लासलगांव सर्वाधिक प्याज उगाने वाले इलाकों में से है.

प्याज-आलू व्यापारी संघ के अध्यक्ष राजेंद्र शेल्के कहते हैं कि नवी मुंबई के वाशी में कृषि उत्पाद बाजार कमेटी में रोजाना प्याज के नब्बे ट्रक आते हैं जो मुंबई और इसके आसपास के इलाकों को प्याज की सप्लाई करते हैं. प्याज भी दो तरह से पहुंचता है—नई फसल सीधे खेतों से आती है और, स्टोरेज वाला प्याज भंडारगृहों से आता है. खेतों से आने वाला प्याज ज्यादातर घरों में इस्तेमाल होता है और इसका थोक मंडी में भाव 80-100 रुपए प्रति किलो है जबकि स्टोरेज वाले प्याज का इस्तेमाल होटलों और रेस्तरांओं में होता है और इसका थोक भाव 100-120 रु. किलो है. शेल्के बताते हैं कि अगस्त में सतारा और सांगली में आई बाढ़ के कारण फसल काफी बर्बाद हुई. इसी से कीमतें चढ़ीं. उन्हें तो ताजे प्याज का भाव जल्दी ही 130 रु. किलो तक पहुंचने का अंदेशा है.

रिपोर्टों के अनुसार, कीमतों को काबू में रखने की कोशिश में सरकार तुर्की से 11,000 टन प्याज मंगा रही है. इसके दिसंबर के अंत में या जनवरी के शुरू में भारत पहुंचने का अनुमान है. सरकार ने प्याज के निर्यात पर भी रोक लगा दी है और भंडारण पर भी सीमा तय कर दी गई है. पर उसके ये कदम शायद थोड़ी देर से उठे हैं. सबनवीस का कहना था, ''हमने प्याज के आयात के लिए करार समय पर नहीं किए, लिहाजा चीजें हाथ से निकलती गईं.'' इसके अलावा, मुनाफाखोरी का खेल जमकर चल रहा है. लिहाजा, ग्राहक के 120 रु. किलो खरीदने के बावजूद किसान के हाथ में 50-60 रु. किलो से ज्यादा नहीं आ रहा.

शेल्के कहते हैं, ''प्याज के आयात से कीमतें नीचे लाने में खास मदद नहीं मिलती.'' उनकी मानें तो कीमतें मार्च के आसपास ही सामान्य होंगी. प्याज की किल्लत को आयात से पूरा करने की प्रक्रिया भी खासी जटिल है. सरकार को आने वाले प्याज के भंडारण और परिवहन का भी इंतजाम करना होता है. तभी अक्सर उसके बाजार में पहुंचने से पहले बंदरगाहों पर सड़ते देखा गया है.

खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों ने मुद्रास्फीति भी बढ़ा दी है. खुदरा मुद्रास्फीति की दर अक्तूबर में 16 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी. मुख्य वजह थी सब्जियों, दालों और मांस की ऊंची कीमत. दालों, सब्जियों की कीमतों पर मानसून का प्रभाव पड़ा है. सब्जियों में भी सर्वाधिक तेजी प्याज में देखी गई है. इसके बावजूद, यह अपेक्षा की जा रही है कि रिजर्व बैंक वृद्धि में तेजी लाने के लिए प्रमुख ब्याज दरों में कमी करेगा.

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