स्मार्ट मनीः बैंक में जमा पैसा कितना सुरक्षित?

सभी वाणिज्यिक बैंक, चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के, सीधे आरबीआइ द्वारा शासित होते हैं. लेकिन जब सहकारी बैंकों की बात आती है, तो उनके पास दोहरे विनियमन होते हैं.

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पंजाब और महाराष्ट्र कोऑपरेटिव (पीएमसी) बैंक और इसके जैसे अन्य बैकों के हालिया संकट ने कई लोगों को चिंतित कर दिया है. अचानक, बैंक जमा की सुरक्षा एक मुद्दा बन गया है. अगर किसी बैंक में सेंध लगी तो उनके पैसे का क्या होगा?

बैंकों के विनियमन किस प्रकार काम करते हैं

सभी वाणिज्यिक बैंकों (पीएसयू बैंक, निजी बैंक, छोटे वित्त बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक) के लिए कानूनी औपचारिकताएं समान हैं. वे जमाकर्ताओं से प्राप्त पूरे पैसे को उधार के रूप में नहीं दे सकते; इनमें से 4 प्रतिशत को नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) और 18.75 प्रतिशत वैधानिक तरल अनुपात (एसएलआर) के रूप में रखना होता है. एक पूंजी पर्याप्तता अनुपात भी है, जिसे पूंजी और जोखिम के भारित संपत्ति अनुपात (सीआरएआर) के रूप में भी जाना जाता है. इसका उपयोग जमाकर्ताओं की सुरक्षा के लिए किया जाता है (यह वर्तमान में 9 प्रतिशत है). सभी वाणिज्यिक बैंकों को, नियमित रूप से आंतरिक और बाहरी ऑडिट कराना होता है जो लंबे समय तक चलने वाली किसी भी बड़ी समस्या से बचाव के लिए रक्षक के रूप में कार्य करते हैं. ये तंत्र बैंकों को किसी भी प्रतिकूल स्थिति से निपटने में मदद करने के लिए हैं.

क्या पीएसयू बैंक निजी बैकों से ज्यादा सुरक्षित हैं?

परंपरागत रूप से, भारत में बैंकों ने जमाकर्ताओं के उच्च स्तर के भरोसे का आनंद लिया है. हालांकि, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ('सरकारी बैंक') के लिए सुरक्षा की धारणा आम तौर पर अधिक है. सेबी-प्रमाणित वित्तीय सलाहकार फर्म, कैपिटल कोशिएंट के सह-संस्थापक और सीईओ, सौरव चक्रवर्ती कहते हैं, ''एक सामान्य धारणा है कि आरबीआइ निजी बैंकों के मुकाबले पीएसयू बैंकों को ज्यादा सुरक्षा देता है. हाल के दिनों में, आरबीआइ ने व्यवस्थित रूप से महत्वपूर्ण बैंकों (एसआइबी) की एक सूची तैयार की है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. यदि ऐसे बैंक विफल हो जाते हैं, तो आरबीआइ निस्तारण विकल्प प्रदान करने और जमाधारकों की सुरक्षा करने के लिए कदम बढ़ाएगा. कई बड़े निजी बैंक अब इस सूची का हिस्सा हैं.'' वर्तमान में, सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक एसबीआइ और निजी क्षेत्र के दो बैंक, एचडीएफसी बैंक और आइसीआइसीआइ बैंक, आरबीआइ की सूची में हैं.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि केंद्रीय बैंक छोटे बैंकों को बचाने के लिए कार्य नहीं करेगा. चाहे यह एक निजी बैंक हो या सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक, कोई भी भारतीय सरकार या आरबीआइ ऐसी स्थिति में नहीं रहना चाहेगा जहां कोई बैंक उनकी नजरों के सामने गड़बडिय़ां करता जाए. जब भी केंद्रीय बैंक को किसी बैंक में परेशानी की किसी वजह का पता चलता है, वह उसे दूर करने के लिए तुरंत सुधारात्मक कार्रवाई करता है जैसा कि उसने लक्ष्मी विलास बैंक के मामले में किया था. यदि स्थिति में सुधार नहीं होता, तो आरबीआइ आमतौर पर उसे किसी मजबूत बैंक के साथ विलय की सुविधा देता है. हाल के दिनों में आरबीआइ ने ऐसा ही किया जब ग्लोबल ट्रस्ट बैंक (एक छोटा-सा निजी बैंक) उसे संकट में दिखा तो उसने एक पीएसयू बैंक ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, के साथ उसका विलय कर दिया था.

चक्रवर्ती कहते हैं, ''आखिरकार अगर किसी अनियंत्रित चूक के कारण बैंकिंग पतन की ओर बढ़ता है, तो निजी और सार्वजनिक क्षेत्र, दोनों तरह के बैंक निस्तारण योजना के तहत केंद्रीय बैंक की कार्रवाई के अधीन होंगे. इस समय, चाहे वह विलय हो या फिर अधिग्रहण, जमा धारकों के लिए जोखिम एक जैसा है.'' बेशक, सतर्क रहने की जरूरत होती है. वित्तीय शिक्षक, मनी मेंटर और फिन्सफे के संस्थापक, मिन्ना अग्रवाल  कहते हैं, ''बैंकों के बीच सुरक्षा का स्तर उनकी वित्तीय स्थिति के आधार पर भिन्न होता है. उच्चतर एनपीए और कम पूंजी पार्यप्तता अनुपात वाले बैंकों से बचा जाना चाहिए.''

एक कोऑपरेटिव (सहकारी) बैंक के साथ आपका पैसा सुरक्षित है?

सभी वाणिज्यिक बैंक, चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के, सीधे आरबीआइ द्वारा शासित होते हैं. लेकिन जब सहकारी बैंकों की बात आती है, तो उनके पास दोहरे विनियमन होते हैं. आरबीआइ के अलावा, उन्हें केंद्रीय या विभिन्न राज्य सहकारी समितियों के संबंधित रजिस्ट्रारों द्वारा भी विनियमित किया जाता है, जिसके तहत वे पंजीकृत हैं. पैसाबाजारडॉटकॉम के सीईओ और सह-संस्थापक नवीन कुकरेजा कहते हैं, ''कॉर्पोरेट गवर्नेंस और व्यावसायिकता की कमी सहकारी बैंकों के कमजोर स्वास्थ्य के मुख्य कारण हैं. दोहरे विनियमन भी पीएमसी बैंक जैसे शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) को अनियमितताओं का पता लगाने से बचने का रास्ता देते हैं. सहकारी बैंकों में पेशेवर बोर्ड नहीं होते क्योंकि उनके निदेशक मंडल सीधे बैंक के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं. व्यावसायिक बैंकों के विपरीत, सहकारी बैंकों को मुख्य कार्यकारी नियुक्त करते समय आरबीआइ की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती है.''

कुकरेजा कहते हैं, ''जहां तक इन बैंकों के विनियमन का संबंध है, आरबीआइ सामान्य बैंकिंग कार्यों को नियंत्रित करता है जबकि सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार इन बैंकों के प्रशासन और लेखा परीक्षा को विनियमित करते हैं.'' यह दोहरा नियंत्रण, नियामक ढांचे में कुछ खामियां छोड़ देता है. वित्त मंत्री ने दोहराया है कि मंत्रालय नियामक खामियों को दूर करने के लिए नियमों में बदलाव करेगा. यदि ऐसा होता है, तो हम सहकारी बैंकों में बेहतर विनियमन देख सकते हैं.

जमा के लिए बीमा कवर सबके लिए

सबसे खराब स्थिति में, जब आरबीआइ और तब की सरकार किसी भी प्रस्ताव को खोजने में विफल रहती है और बैंक में हलचल होती है, तो जमाकर्ताओं के पास अंतिम सुरक्षा तंत्र के रूप में बीमा जमा होता है. लगभग सभी बैंकों में यह सुविधा है जिसके तहत जमाकर्ताओं को 1 लाख रुपए तक की जमा पर बीमा कवर मिलता है जिसमें मूल और ब्याज दोनों शामिल हो सकते हैं.

कुकरेजा कहते हैं, ''बैंक के विफल हो जाने पर यह बीमा 1 लाख रुपए तक की बैंक जमा राशि को कवर करता है, जिसमें हर जमाकर्ता की सावधि, बचत, चालू और आवर्ती जमा शामिल हैं. डिपॉजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (डीआईसीजीसी) के तहत शामिल और कवर किए गए किसी भी प्रकार के बैंक में जमा की सुरक्षा के स्तर में कोई अंतर नहीं है. डीआइसीजीसी एक आरबीआइ के पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है जिसका एकमात्र उद्देश्य जमाओं को बीमा कवर प्रदान करना और क्रेडिट सुविधाओं की गारंटी देना है.

हालांकि, ऐसे तरीके हैं जिनसे आप उच्च जमा बीमा कवर का आनंद ले सकते हैं. आप अपनी जमा राशि को विभाजित कर सकते हैं और इसे विभिन्न बैंकों में रख सकते हैं; एक ही बैंक में अपनी जमा राशि को अलग-अलग खातों में विभाजित करें, जिसे अलग-अलग अधिकार और क्षमता में रखा गया है. उदाहरण के लिए, खाते को एक व्यक्ति, या एक संयुक्त खाताधारक, एक फर्म के साझेदार, एक कंपनी के एक निदेशक, नाबालिग के संरक्षक आदि के रूप में रखें, फिर ये सभी खाते अलग-अलग 1 लाख रुपए के बीमा कवर के पात्र होंगे.

कवर बढ़ाएं

1993 तक, जमा बीमा कवर नियमित रूप से बढ़ाया गया था. लेकिन पिछले 26 साल से नहीं बढाया गया है. कई लोगों ने चिंता व्यक्त की है कि 1 लाख रुपए का बीमा कवर अपर्याप्त कैसे था. मृण अग्रवाल कहते हैं, ''यह देखते हुए कि केवल 28 प्रतिशत जमा का बीमा होता है और दुनिया में सबसे कम जमा का बीमा कवर भारत में है. इस कवर को बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है. एसबीआइ की एक हालिया रिपोर्ट में वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक अलग कवर के साथ कवर को दोगुना करने की सिफारिश की गई है.'' उम्मीद है कि सरकार मुद्रास्फीति और छोटे जमाकर्ताओं के लिए उच्च सुरक्षा जाल की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कवर को बढ़ाएगी.

बैंक कैसे जमाकर्ताओं की जमा को सुरक्षित रखते हैं?

सभी सरकारी और निजी बैंकों को भारतीय रिजर्व बैंक के मानकों का समान रूप से पालन करना होता है.

सभी वाणिज्यिक बैंकों को जमाकर्ताओं की कुल जमा पूंजी के 22.75 फीसदी के बराबर राशि विभिन्न रिजर्व के रूप में आरक्षित रखनी होती है.

बैंकों की ओर से दिए गए कर्ज के 9 फीसदी के बराबर राशि को हमेशा पूंजी के रूप में बनाए रखना जरूरी

संकट की स्थिति में कें द्रीय बैंक किसी बैंक को प्रॉम्ट करेक्टिव एक्शन की सूची में डालता है, जिससे इसे उबारने में मदद मिले. 

बैंकों की स्थिति में सुधार न आने पर रिजर्व बैंक इसे किसी मजबूत बैंक के साथ विलय करने में मदद करता है.

जब बैंक को उबारने के सभी प्रयास असफल रहते हैं तो अंत में  अधिकतम 1 लाख रुपए तक की जमा का बीमा जमाकर्ताओं के लिए अंतिम सुरक्षा कवच होता है.

सहकारी बैंकों पर दोहरा नियंत्रण विनियमन के स्तर पर कई खामियों का कारण बनते हैं. आरबीआइ के अलावा इन्हें सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार भी नियंत्रित करते हैं

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