जख्म पर रखना शब्दों के फाहे
साहित्य वार्षिकी 2019 अपने ताजा संस्करण में एक बार फिर 200 से ज्यादा पन्नों की सामग्री के साथ पाठकों के सामने है

कहां तिब्बत, कहां फिलस्तीन और कहां मध्य भारत का वनप्रांत! पुरखों की जमीन से उखाड़ दिए जाने की पीड़ा कविता में एक-सी उभरती है.
भारत में रहते आए युवा तिब्बती कवि तेंजिंग चुंडू का धैर्य कई बार जवाब देने लगता है. अपने साक्षात्कार में वे कहते हैं, ''हम दशकों से जुलूस निकालते हैं, संघर्ष करते हैं—पर बदलता कुछ नहीं.
कोई हमारा साथ नहीं देता...इसलिए एक कुंठा-सी होती है कि हो कुछ नहीं रहा.'' फिलस्तीनी युवा कवि नजवान दरवीश की कविता का मुखड़ा ही है, ''मेरा कोई देश नहीं जहां वापस जाऊं/ और मेरा कोई देश नहीं जहां से खदेड़ा जाऊं.''
और मध्य प्रदेश की एक जनजातीय कवयित्री अन्ना माधुरी तिर्की का आवेश भी मुआवजा कविता में झलकता है, ''जंगल की भी तो की हमने ही रखवाली/ अब तुम कहते हो, मुआवजा लो और कर दो खाली.''
निरीह जनजातीय जीवन पर पैने दांत वाले शहरियों के कहर को मनीषा कुलश्रेष्ठ अपनी मर्मस्पर्शी कहानी लीलण में नजदीक से महसूस कराती हैं: ''नहीं मानती तो साले क्या हैवान बन जाओगे? हरामियो, पकड़े तो जाओगे.''
लंदनवासी हिंदी कथाकार तेजेंद्र शर्मा संदिग्ध कहानी में बातों-बातों में आकार लेती एक बड़ी साजिश की परतें खोलते हैं.
साहित्य वार्षिकी अपने ताजा संस्करण में एक बार फिर 200 से ज्यादा पन्नों की सामग्री के साथ पाठकों के सामने है.
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