गोवा की गजब रफ्तार
हर चीज इस राज्य के हक में है. प्राकृतिक समृद्धि, देश में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आमदनी और एचडीआइ के प्रमुख मानकों पर असाधारण रिकॉर्ड. लेकिन जन्नत बने रहने के लिए राज्य को अब अपने पर्यावरण की हिफाजत करनी होगी. साथ ही तटीय जिलों तथा मुख्य भू-भाग के बीच का फर्क भी कम करना होगा.

इसकी तटरेखा भले ही महाराष्ट्र की 720 किमी और कर्नाटक की 320 किलोमीटर लंबी तटरेखाओं के मुकाबले छोटी—महज 160 किमी—ही हो, पर यह गोवा ही है जिसे 'पूरब का मोती' कहा जाता है. इसका 450 साल पुराना पुर्तगाली औपनिवेशिक इतिहास इसे अनूठा सांस्कृतिक लोकाचार प्रदान करता है, जो यहां इसके उदार, सहिष्णु और प्रगतिशील रवैये से लेकर खान-पान तक में झलकता है. नीला आसमान, ताड़ के सुनहरे पेड़ों से घिरे तट और समुद्र के भव्य नजारे इसे देशी और विदेशी पर्यटकों, हिप्पियों और अमीर सैलानियों, सभी के लिए समान रूप से छुट्टियां बिताने की शानदार मंजिल बना देते हैं.
यही वजह है कि गोवा आने वाले सैलानियों की तादाद हर साल बढ़ती जा रही है. 2018 में गोवा ने 70,81,559 सैलानियों को आमंत्रित किया था, जो राज्यों में सबसे ज्यादा थे. उस साल 9,33,481 विदेश सैलानी गोवा आए.
पर्यटन के अलावा खनन और फार्मा क्षेत्र गोवा की अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार रहे हैं. राज्य का सकल घरेलू उत्पाद 2017-18 में मौजूदा कीमतों पर तकरीबन 9.95 अरब डॉलर (करीब 70,000 करोड़ रु.) रहा, जो महाराष्ट्र (300 अरब डॉलर से ज्यादा) और कर्नाटक ( 200 अरब डॉलर से ऊपर) के मुकाबले खासा कम था. तो भी गोवा इसलिए अव्वल है क्योंकि इसका प्रति व्यक्ति जीडीपी देश में सबसे ज्यादा है—राष्ट्रीय आंकड़े से ढाई गुना. इतना ही नहीं, गोवा का जीएसडीपी 2011-12 से 2017-18 तक मौजूदा कीमतों पर 10.65 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ा.
खनन—राजा से रंक
गोवा ने ये कामयाबियां महज पर्यटन के दम पर हासिल नहीं की हैं. तटों से दूर स्थित भूभाग खनिजों से भरपूर हैं, जो खनन को राज्य का दूसरा सबसे बड़ा उद्योग बनाते हैं. 2017-18 में देश के 32 फीसद लौह अयस्क का उत्पादन गोवा में हुआ था. राज्य में देश की कुछ अहम खनन कंपनियां स्थित हैं, मसलन सेसा स्टर्लाइट लिमिटेड, वी.एम. सालगांवकर ऐंड बदर्स और फोमेंटो रिसोर्सेज. गोवा के तकरीबन 1,50,000 लोग अपनी रोजी-रोटी के लिए खनन उद्योग पर निर्भर रहने लगे हैं.
इतना ही नहीं, लौह और मैगनीज अयस्क, बाक्साइट, औद्योगिकी मिट्टी और सिलिका रेत के विशाल भंडारों के साथ गोवा कच्चे माल के निर्यात का बड़ा केंद्र बन गया है. देश का 55 फीसद लौह अयस्क का निर्यात गोवा से होता है. राज्य से लौह अयस्क का निर्यात सितंबर 2015 तथा नवंबर 2017 के बीच 1.76 करोड़ टन पर पहुंच गया. मोरमुगांव बंदरगाह ने 2017-18 में 2.69 करोड़ टन माल की ढुलाई की; कुल 1.03 करोड़ टन लौह अयस्क का लदान हुआ. लोहे और मैगनीज की मांग साल 2000 से बढऩा शुरू हुई और 2008 के बीजिंग ओलंपिक की तैयारियों के वक्त तक शिखर पर पहुंच गई. चीन को लौह अयस्क के निर्यात की आपाधापी में, जिसकी तादाद अक्सर राज्य की क्षमता से ज्यादा होती थी, गोवा के खनिज संसाधनों का अति दोहन किया गया, जिससे यहां के पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंची.
15 मार्च, 2018 को गोवा में लौह अयस्क निकालने सहित तमाम खनन गतिविधियां ठप पड़ गईं. तकरीबन दो साल में दूसरी बार ऐसा हुआ था. यह सुप्रीम कोर्ट के 7 फरवरी, 2018 के उस आदेश के बाद हुआ, जिसमें लौह अयस्क की 88 खदानों की लीज रद्द कर दी गई थीं. सरकार ने लीज की नीलामी का अधिकार देने वाले खदान और खनिज (विनियमन तथा विकास) अधिनियम के ठीक पहले 2014-15 में इन खदानों की लीज का नवीनीकरण किया था. खुदाई पर पाबंदी के चलते राज्य को हर साल तकरीबन 3,500 करोड़ रुपए से 4,000 करोड़ रुपए तक के राजस्व का जबरदस्त नुक्सान हुआ. हजारों लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ीं, सो अलग.
लौह अयस्क की खुदाई को लगे इस झटके के चलते राज्य दूसरे क्षेत्रों में हाथ-पैर फैलाने का जतन कर रहा है. पर्यटन और खनन के साथ-साथ फार्मास्यूटिकल उद्योग पारंपरिक तौर पर राज्य की ग्रोथ का तीसरा सबसे बड़ा कारक रहा है—2017-18 में गोवा के निर्यात में दवाइयों और बायोलॉजिकल उत्पादों के निर्माण का हिस्सा 51 फीसदी रहा था.
इंडिया टुडे को दिए गए एक एक्सक्लूजिव इंटरव्यू में गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सरकार की प्राथमिकताएं गिनाते हुए कहा: ''सबसे ज्यादा ध्यान युवाओं के लिए निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित करने पर है. किसी भी नए उद्यम में अस्सी फीसद नौकरियां गोवा के स्थानीय निवासियों को देनी होंगी.'' उन्होंने यह भी बताया कि दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा ध्यान ''युवाओं के लिए स्वरोजगार को बढ़ावा देने पर है और यह उद्योग (स्वच्छ उद्योग), सेवाओं, कृषि, डेयरी फार्मिंग तथा मछलीपालन में निवेश के लिए स्टार्ट-अप कंपनियों को प्रोत्साहनों के जरिए किया जा रहा है.''
स्टार्ट-अप कंपनियों को दिए जा रहे ये बड़े प्रोत्साहन कौन-कौन-से हैं? सावंत कहते हैं, ''25 लाख रुपए से शुरुआत करने वाले स्टार्ट-अप को राज्य के प्रोत्साहनों की मदद से रिटर्न के तौर पर 10 लाख रुपए वापस मिलना तय है. इसके अलावा, सरकार स्टार्ट-अप में भर्ती किए गए कर्मचारियों की 50 फीसद तनख्वाह देने में मदद देगी.''
एक और शीर्ष प्राथमिकता बुनियादी ढांचा है. सावंत कहते हैं, ''जोर सड़क मार्गों, पुलों और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के निर्माण पर है.'' वे यह भी कहते हैं, ''अगली प्राथमिकता पर्यटन के तीन चरणों पर है—पहला धूप, रेत और समुद्र; दूसरा, मुख्य भूभाग में पर्यटन और आखिर में मेडिकल टूरिज्म. फिर हम गोवा को स्वच्छ उद्योगों के औद्योगिक केंद्र के तौर पर बढ़ावा देना चाहते हैं. क्योंकि ये उद्योग खासकर गोवा के स्थानीय निवासियों को नौकरी देने की ओर उन्मुख होते हैं.''
खनन के बारे में क्या? सावंत कहीं ज्यादा सतर्क हैं. वे कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट की पूर्व शर्तों को ध्यान में रखते हुए हम खदानों की ई-नीलामी की योजना बना रहे हैं.''
सरकार के मिशन की रूपरेखा बताते हुए मुख्यमंत्री कहते हैं, ''हमारा विजन गोवा को खासकर छोटे राज्यों में भारत के सर्वश्रेष्ठ, सबसे ज्यादा विकसित राज्य के तौर पर प्रचारित करने का है. हम चाहेंगे कि गोवा स्वास्थ्य, शिक्षा, जीडीपी अनुपात और कारोबारी सहूलियत सहित विकास की विभिन्न श्रेणियों में शीर्ष पर हो. हम निवेशकों को आकर्षित करने के लिए देश में सबसे सस्ती बिजली, बुनियादी ढांचे की कुछ बेहतरीन सुविधाएं, उच्च शिक्षित कार्यबल और शानदार स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करेंगे.''
संभावनाओं से भरपूर गोवा
गोवा अपने मुख्यमंत्री की तमाम उम्मीदों को पूरा करने के लिए अनूठी स्थिति में है. सबसे पहले इसकी प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे ज्यादा है. 2019 में 35.6 लाख आबादी के साथ 15 सितंबर, 2019 को गोवा की प्रति व्यक्ति आय के 3,37,734 रुपए होने का अनुमान लगाया गया था, जो 87,623 रुपए की अखिल भारतीय प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय के मुकाबले बहुत ज्यादा है. क्षेत्रफल के लिहाज से गोवा भारत का सबसे छोटा राज्य है; जहां तक आबादी की बात है, तो केवल तीन राज्यों की आबादी गोवा से कम है. छोटे राज्यों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली 2,62,682 रु. की प्रति व्यक्ति आय (देखें प्रति व्यक्ति संपन्नता) के साथ गोवा से पीछे था. प्रति व्यक्ति आय में यह बढ़ोतरी बुनियादी ढांचे में भारी निवेश और बनिस्बतन नए क्षेत्रों के विकास के बाद 2013-14 से ही लगातार बनी हुई है.
दूसरे, राज्य ने मानव विकास के मुख्य सूचकांकों में अपना शानदार रिकॉर्ड कायम रखा है. शिक्षा और स्वास्थ्य के मानक तो गोवा में पारंपरिक तौर पर ही ऊंचे रहे हैं. ग्यारहवें वित्त आयोग ने गोवा को उसके बुनियादी ढांचे के लिए सबसे अच्छी स्थिति वाले राज्य का दर्जा दिया था जबकि राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग ने 12 मुख्य संकेतकों के आधार पर गोवा को जीवन की श्रेष्ठतम गुणवत्ता में शीर्ष पायदान पर रखा था. टेलीफोन एक्सचेंजों के ठोस नेटवर्क के साथ गोवा 100 फीसद स्वचालित टेलीफोन प्रणाली हासिल करने वाला दूसरा राज्य है. गोवा में बिजली की कुल स्थापित क्षमता सितंबर 2017 तक 547.88 मेगावॉट थी—यह उन थोड़े-से राज्यों में है जिसने 100 फीसद ग्रामीण विद्युतीकरण हासिल किया है.
गरीबी को अलविदा
ग्रोथ के गतिशील चालकों, एचडीआइ के ऊंचे मानकों और ऊंची प्रति व्यक्ति आमदनी का नतीजा यह हुआ है कि गोवा में गरीबी दर भी देश में सबसे कम है. प्रति माह या प्रति दिन प्रति व्यक्ति खपत खर्च के आधार पर गरीबी की गणना करने वाली तेंडुलकर समिति के तरीके के मुताबिक (देखें-शानदार प्रदर्शन), 2011-12 की जनगणना के दौरान गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात गोवा में 5.1 फीसदी था. यह 21.9 फीसद के राष्ट्रीय औसत से चार गुना कम था, जबकि कम गरीबी दर सूचकांकों के लिए मशहूर केरल (7.1 फीसद), पंजाब (8.3 फीसद), और अविभाजित आंध्र प्रदेश (9.2 फीसद) सरीखे दूसरे राज्यों के मुकाबले भी कम था.
चमत्कार की बात यह है कि गोवा 2004-05 में नौवां सबसे कम गरीबी दर वाला राज्य होने से लंबी दूरी पार करके 2011-12 में कुल सबसे कम गरीबी दर वाला राज्य बन गया. 2004-05 में गोवा में गरीबी की दर 25 फीसद थी, जो 2011-12 में 5 फीसद पर आ गई. यानी सात साल में करीब 20 फीसद अंकों की बड़ी गिरावट आई है. इसी अवधि में देश में गरीबी की दर में औसत गिरावट तकरीबन 15 फीसद अंकों पर बनी रही है.
गरीबी की दरों में गिरावट गोवा के ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी क्षेत्रों में ज्यादा तेज रही है. 2004-05 से 2011-12 के बीच ग्रामीण बीपीएल आबादी का प्रतिशत जहां 28 फीसद से घटकर 6.8 फीसद पर आ गया, वहीं शहरी गरीबी की दर इसी अवधि में 22 फीसद से घटकर 4 फीसद पर आ गई, जो क्रमश: 76 फीसद और 82 फीसद की गिरावट है.
अर्थव्यवस्था में कृषि की अहमियत हालांकि पिछली आधी सदी के दौरान लगातार सिकुड़ती रही है, लेकिन गोवा की आबादी के काफी बड़े हिस्से को यह क्षेत्र अल्पकालिक रोजगार मुहैया करता है. धान मुख्य कृषि फसल है और उसके बाद काजू, सुपारी और नारियल का स्थान है. मछलीपालन 40,000 लोगों को रोजगार देता है, हालांकि हाल के सरकारी आंकड़ों से मछली पकडऩे में गिरावट का पता चलता है, जिसकी वजह शायद यह है कि पारंपरिक तरीके की जगह बड़े पैमाने पर मशीनों से मछलियां पकड़ी जाने लगी हैं.
मध्यम और छोटे उद्योगों में वे मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां शामिल हैं जो कीटनाशक, उर्वरक, टायर, ट्यूब, फुटवियर, रसायन, दवाइयां, गेहूं के उत्पाद, स्टील रोलिंग, फलों और मछलियों के डिब्बे, काजू, कपड़े और पेय उत्पाद तैयार करती हैं. इन सभी में हजारों लोग काम पर लगे हैं. गोवा अपनी सस्ती बीयर, वाइन और अन्य शराबों के लिए भी जाना जाता है और इसकी वजह यहां अल्कोहल पर उत्पाद शुल्क का बहुत कम होना है. पर्यटन, आतिथ्य-सत्कार और मनोरंजन क्षेत्र भी, जिसमें भव्य मंडोवी नदी पर फलते-फूलते कैसिनो भी शामिल हैं, रोजगार पैदा करता है.
सावंत सरकार ने खासकर हरित जैविक खेती सहित कृषि के साथ-साथ इन मध्यम पैमाने के क्षेत्रों पर जोर देना शुरू किया है. गोवा में 16 नियोजित विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) हैं, हालांकि स्थानीय राजनैतिक दलों, पर्यावरणवादियों और साथ ही कैथोलिक चर्च के विरोध को देखते हुए सरकार ने अब और एसईजेड की इजाजत नहीं देने का फैसला किया है. राज्य में नकदी का एक और बड़ा स्रोत, केरल की तरह गोवा के अनिवासी नागरिकों की तरफ से भेजी गई रकम है. गोवा उन विरले राज्यों में है जहां अनिवासी भारतीय (एनआरआइ) मामलों के लिए आयुक्त है, जिसे कबीना मंत्री का दर्जा हासिल है.
शहरी कामयाबी
गोवा को 62.2 फीसद शहरी आबादी के साथ देश का सबसे ज्यादा शहरीकृत राज्य होने का गौरव भी हासिल है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, गोवा की शहरी आबादी 31.1 फीसद के राष्ट्रीय औसत से दुगुनी है. विकसित राज्यों में तमिलनाडु (48.4 फीसद) दूसरे पायदान पर है, जिसके बाद केरल (47.7 फीसद), महाराष्ट्र (45.2 फीसद) और गुजरात (42.6 फीसद) का नंबर आता है. गोवा की शहरी आबादी में 2001 के बाद 12.9 फीसद की उछाल आई है, तब यह 49.8 फीसद थी. राष्ट्रीय स्तर पर यह बढ़ोतरी महज 3.3 फीसद थी. राज्य की राजधानी पणजी में शहरी घनत्व सबसे ज्यादा है जहां 1,14,759 लोग रहते हैं. इसके बाद मडगांव (1,06,484) और मोरमुगांव (1,01,326) हैं. हालांकि शहरी इलाकों का बड़ा हिस्सा तटीय पट्टी पर बसा है, जिसकी वजह से मुख्य ग्रामीण भूभागों में बहुत ज्यादा उद्योग नहीं हैं. तटीय जिलों और मुख्य भूभागों का बड़ा फासला गोवा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बना हुआ है.
साक्षरता के लिहाज से गोवा राज्यों में तीसरे पायदान पर और विकसित राज्यों में दूसरे पायदान पर है. 1961 में भारत के साथ जुडऩे के वक्त गोवा में साक्षरता की दर 31 फीसद थी. 2011 की जनगणना के मुताबिक, यह 88.7 फीसद हो गई थी, जो 73 फीसद के राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा थी (देखें साक्षरता में शीर्ष पर). केरल अकेला विकसित राज्य है जिसकी सारक्षता दर (94 फीसद) गोवा से ज्यादा है. महाराष्ट्र (82.3 फीसद) और तमिलनाडु (80.1 फीसद) दो अन्य विकसित राज्य हैं जिनकी साक्षरता दर 80 फीसद से ज्यादा है. फिर भी वे गोवा से पीछे ही हैं. नीति आयोग ने 2018 में सभी के लिए समावेशी और समतामूलक अच्छी शिक्षा सुनिश्चित करने में गोवा को 'अग्रणी' राज्य घोषित किया था. गोवा में प्राथमिक (कक्षा 1 से 8) और माध्यमिक (कक्षा 9 से 10) स्कूल स्तरों पर समायोजित विशुद्ध नामांकन दर 90.46 फीसद है, जो तमिलनाडु (92.86 फीसद) और केरल (91.76 फीसद) से कम है, लेकिन 75.8 फीसद के राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है. माध्यमिक स्तर पर औसत सालाना ड्रॉप आउट दर गोवा में सबसे कम 11.15 फीसद है, जो तमिलनाडु (8.1 फीसद) और पंजाब (8.86 फीसद) से ज्यादा है.
साल 2003 में शुरू हुआ राज्यों की दशा-दिशा (एसओएस) सर्वे राज्यों के प्रदर्शन का विश्लेषण करने के लिए महत्वपूर्ण मानक के तौर पर उभरकर आया है. सर्वे दृढ़ता से मानता है कि देश का भविष्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निहित है. गोवा का राज्य की दशा-दिशा सर्वे एक कदम और आगे जाता है: यह विकास के एक दशक के दौरान विभिन्न श्रेणियों में गोवा के जिलों और तालुकाओं के प्रदर्शन का विश्लेषण करता है. प्रत्येक श्रेणी आम तौर पर ऐसे मानदंडों का मिश्रित सूचकांक है, जिन्हें समय के अंतराल के पश्चात भी मापा जा सकता है, बर्शते डेटा मौजूद हो. गोवा के मामले में आदर्श तो यही है कि उत्तर बनाम दक्षिण में स्थित दो जिलों, जिनमें हरेक में छह तालुका हैं, की तुलना की जाए. तालुका स्तर का डेटा आधा-अधूरा है और केवल कुछ ही मानकों का डेटा मौजूद है.
आगे का रास्ता
अंग्रेजी कथन 'स्मॉल इज वंडरफुल' गोवा की अनेकानेक ताकतों को बखूबी जाहिर करती है. इंडिया टुडे की 2018 की एसओएस की सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की रैंकिंग में भारत के अपेक्षकृत छोटे राज्यों में भी गोवा तीन संकेतकों—अर्थव्यवस्था, राजकाज और पर्यटन—पर पहले पायदान पर रहा; बुनियादी ढांचे और पर्यावरण में दूसरे पायदान पर और शिक्षा तथा स्वास्थ्य में तीसरी पायदान पर रहा.
जिला/तालुका आधारित एसओटीएस विभिन्न रैंकिंग से पता चलता है कि गोवा में प्रति व्यन्न्ति आमदनी, गरीबी में कमी, मानव विकास के मुख्य संकेतकों में सर्वश्रेष्ठ राज्य है और शहरीकरण, स्वास्थ्य तथा शिक्षा में शीर्ष पर है. हालांकि, भविष्य अपने साथ कई चुनौतियां लेकर आता है. गोवा में एक तो मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि की गुंजाइश सीमित ही है. उद्योग के लिए आमतौर पर विशाल भूभाग की जरूरत पड़ती है—इस लिहाज से गोवा में कम ही गुंजाइश है. पारंपरिक खनन क्षेत्र का भी काफी दोहन कर लिया गया है और यह क्षेत्र गंभीर कानूनी और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों से घिरा है. ये उद्योग कम लागत पर हाथ से काम करने वाले लोगों की बदौलत फलते-फूलते हैं, जिनकी गोवा में कमी है. सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) और बायोटेक्नोलॉजी से जुड़े उद्योगों सरीखे हाईटेक उद्योग विकल्प हैं, मगर इसके लिए भारी-भरकम पूंजी निवेश और बेहतर शिक्षित कामगारों की जरूरत है.
गोवा के लिए एक और गंभीर चुनौती कृषि की उत्पादकता में तेज गिरावट है, जिसकी वजह है जमीन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल और प्रदूषण. गोवा खेती योग्य जमीन और खेतिहर मजदूरों की जबरदस्त कमी का सामना भी कर रहा है. राज्य के शुद्ध घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा देश में सबसे कम 8 फीसद से भी नीचे है. कृषि में गोवा को जो अकेला तुलनात्मक फायदा हासिल है, वह है नकद फसलों—यानी काजू, नारियल, सुपारी, कटहल और केले सरीखी फसलों—का. गोवा को जैविक खेती और एग्रो-प्रोसेसिंग के जरिए नई कृषि उपजों में हाथ-पैर फैलाने की जरूरत है. इस सबके लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी और तकनीकों के साथ कृषि में जबरदस्त निवेश, कृषि कार्यबल को शिक्षित करने और उत्पादन के साधनों दोनों में क्रांतिकारी बदलाव की जरूरत है.
***