बिजनेस स्कूलों में अव्वल मकाम
आइआइएम-ए को प्लेसमेंट और सैलरी पैकेज से कहीं ज्यादा उसके काबिल प्रोफेसरों, समकक्ष व्यक्तियों के शानदार समूहों और बहु-आयामी शिक्षा की वजह से अव्वल बी-स्कूल माना जाता है.

दीप कालरा
साल दर साल जब मीडिया भारत के सर्वश्रेष्ठ बिजनेस स्कूलों के बारे में रिपोर्ट करता है, तब वह सांस रोककर हमें देश के शीर्ष संस्थानों के सैलरी पैकेज और प्लेसमेंट के बारे में बताता है. मुझे संदेह है कि आने वाले दिनों में इसमें कोई बदलाव आएगा. आखिरकार जो लोग मोटी तनख्वाह की कॉर्पोरेट नौकरियां हासिल करके आर्थिक अवरोधों को तोडऩा चाहते हैं, उनके लिए यह खुश होने और जश्न मनाने की स्वाभाविक वजह है—एक ऐसी अकादमिक संस्था जहां से शीर्ष बिजनेस एग्जीक्यूटिव निकलते हैं और फिर दुनियाभर में अपनी काबिलियत का डंका बजाते हैं.
भारत के बहुतेरे बी-स्कूल में भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद (या आइआइएम-ए), सीधे-सादे शब्दों में कहें तो मैनेजमेंट शिक्षा के बिल्कुल शिखर पर है. इस संस्थान की दुनिया भर में कायम प्रतिष्ठा तब और पुख्ता हो जाती है जब नामी-गिरामी कंपनियां प्लेसमेंट सीजन के दौरान यहां आती हैं और यहां के ग्रेजुएट छात्रों में से चुनकर ले जाती हैं. हालांकि यह हाल ही का रुझान है—मुझे वह वक्त अब भी याद है जब हैरतअंगेज सैलरी पैकेज बी-स्कूल के प्लेसमेंट अभियानों में आम बात नहीं हुआ करते थे.
मिसाल के लिए, इन्फो एज (जो जॉब पोर्टल नौकरी डॉट कॉम की मालिक है) के संस्थापक संजीव भीकचंदानी मुझे बताते हैं कि जब 1989 में उन्होंने आइआइएम-ए से ग्रेजुएशन किया था, तब ग्रेजुएट छात्रों की भर्ती के लिए ज्यादा कंपनियां कैंपस में नहीं आती थीं. अलबत्ता 1992 आते-आते हालात काफी कुछ वैसे हो चले थे जैसे आज हैं. तब तक कंसल्टिंग फर्म और एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) कंपनियां कैंपस में आने लगीं और उस साल दुनिया भर में जानी-मानी कंसल्टिंग फर्म मैकिंजी ने दो ग्रेजुएट यहां से लिए थे और किसी भी भारतीय बिजनेस स्कूल से उसने पहली बार ऐसी भर्तियां की थीं.
अलबत्ता जानी-मानी कंपनियों में प्लेसमेंट और उसके साथ मिलने वाली मोटी तनख्वाह के संकीर्ण नजरिए से आगे आइआइएम-ए को अपने बेहद काबिल प्रोफेसरों, शानदार समकक्ष लोगों के समूहों (पियर ग्रुप्स) और संस्थान की बहुआयामी शिक्षा की वजह से सर्वश्रेष्ठ में भी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. यहां मिलने वाली शिक्षा छात्रों को जिंदगी भर के लिए गढ़ती है. आइआइएम-ए सरीखे संस्थान अपनी इस बुनियादी उत्कृष्टता की वजह से ही अतीत में भी अत्यधिक सम्मान हासिल करते थे—सबसे अच्छे संस्थानों से उच्च शिक्षा हासिल करना अपने आप में एक विशेषाधिकार है.
मैंने बैचलर डिग्री के लिए सेंट स्टीफंस में दाखिला लिया और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की. पूरे सत्र के दौरान मैंने ज्यादा हाथ-पैर नहीं मारे लेकिन मेरे मन में पक्का था कि उसके बाद मुझे क्या करना है. भारतीय प्रबंध संस्थानों में से एक के जरिए कॉर्पोरेट करियर का रास्ता सबसे स्वाभाविक विकल्प मालूम देता था (यह अलग बात है कि मैंने कॉर्पोरेट करियर में बहुत लंबे समय तक नहीं रहने का फैसला किया और नौकरी के कुछ ही वर्षों बाद खुद अपने उद्यम में हाथ आजमाया). सेंट स्टीफंस से ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने आइआइएम, एक्सएलआरआइ और एफएमएस में आवेदन किया.
मैंने जितने भी बी-स्कूल में आवेदन किया था, उन सभी से इंटरव्यू का बुलावा आना खासी उत्साह बढ़ाने वाली बात थी, पर जब मुझे आइआइएम अहमदाबाद में दाखिला मिल गया, तब मुझे लगा कि मेरी मेहनत सचमुच रंग लाई है. जब आप देश के बेहतरीन बी-स्कूल में दाखिला लेने में कामयाब हो जाते हैं, तो शुरुआत में आपको लगता है कि आप कोई तुर्रम खां हैं. लेकिन जल्दी ही आपको एहसास होने लगता है कि भले ही आप अपने छोटे-से तालाब की बड़ी मछली रहे हों, लेकिन जब आप विशाल समुद्र में आते हैं तब आप वाकई खाकसार हैं और आपकी कोई अहमियत नहीं है. पहले मैनेक (मैनेजमेंट अकाउंटिंग) क्विज ने एक झटके में मुझे जमीन पर पटक दिया. यह मेरी जिंदगी की अकेली बड़ी हार थी. मैं बेहद दुखी इसलिए था क्योंकि ऐसे नंबर मुझे पहले कभी मिले नहीं थे. मैं जानता था कि अब कमर कस लेने का वक्त आ गया है. बहुत जल्दी ही मुझे अपनी लीक मिल गई.
आइआइएम-ए से पढ़ाई करने के असाधारण पहलुओं में एक यह है कि आपको सबसे शानदार प्रोफेसरों से सीखने को मिलता है—ऐसे प्रोफेसर जो आपके ऊपर व्यापक और तीक्ष्ण ढंग से सोचने के लिए, समस्याओं को ठीक-ठीक पहचानने और परिभाषित करने के लिए और उन्हें व्यवस्थित और सुसंगत ढंग से हल करने के लिए जोर डालते हैं. मुझे प्रोफेसर ए.के. जैन से पढऩा याद है, जो बेमिसाल शिक्षक रहे हैं और आइआइएम-ए ग्रेजुएट के 40 बैचों को पढ़ा चुके हैं. उन्होंने हमें प्रेरित किया कि हम अपने सामने आने वाले हरेक तथ्य और आंकड़े के सटीक विश्लेषण से कम किसी भी चीज पर समझौता न करें.
हममें से जिन लोगों ने उनके साथ केस चर्चाएं की हैं और कक्षा में प्रजेंटेशन देने के लिए बुलाए गए हैं, वे कभी भूल नहीं सकते कि किस तरह वे 'क्यों' और 'तो क्या' की झड़ी लगा देते थे और सही जवाब की खोज के लिए हमारे ऊपर अथक जोर डालते थे. देश के सबसे चतुर सुजान छात्रों में कुछ होने को लेकर जो भी आरामदायक भ्रम हमारे मन में रहे हों, वे उसी क्षण तेजी से नेस्तनाबूद हो गए जब हमने खुद को उनके छानबीन करने वाले सवालों के घेरे में पाया. हमें यह सीखने में बहुत वक्त लगा कि सही जवाब खोजने के लिए आपको पहले सही सवाल पूछना होता है. इसने हमें विनम्रता के भी दो-एक सबक पढ़ाए.
आइआइएम-ए देश के उन अव्वल संस्थानों में से एक है जिन्होंने प्रबंधन के सिद्धांतों को सीखने के लिए केस स्टडी के नवोन्मेषी तरीके को सबसे पहले अपनाया. यह एप्लाइड लर्निंग पर संस्थान के फोकस का एक उदाहरण है. केस स्टडी के तरीके से न केवल छात्र और शिक्षक के बीच जुड़ाव बढ़ता है बल्कि यह छात्रों के बीच आपस में भी ज्यादा बातचीत और संवाद को प्रोत्साहित करता है, जो सहभागी शिक्षा और समूह में काम करने की आदत की ओर ले जाता है. आइआइएम-ए में यह नवोन्मेषी कोशिश हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के साथ मिलकर काम करने से आई है और आज यहां के शिक्षकों और छात्रों की जिंदगी का ढंग बन गई है.
देश के कुछ सबसे मेधावी और प्रतिभाशाली व्यक्तियों, बेहद प्रतिस्पर्धी माहौल और अविश्सनीय शिक्षा से घिरा होना जहां भय और श्रद्धा उपजाता है, वहीं अपनी दूसरी अभिरुचियों को भी पूरा करने की छात्रों की क्षमता देखकर हैरानी हो सकती है. पाठ्यक्रम से जुड़े अत्यंत कठोर कार्यों के बावजूद आइआइएम-ए ढेरों पाठ्येतर गतिविधियों—खेल, वाद-विवाद, फैकल्टी के साथ अनौपचारिक बातचीत तथा और भी बहुत कुछ—के अवसर मुहैया करता है ताकि सर्वांगीण व्यक्तित्व विकसित करने में छात्रों की मदद की जा सके.
इसका पुराना कैंपस प्रसिद्ध लुई कान के वास्तुशिल्प की शुरुआती अलंकृत शैली में—पूरी तरह लाल ईंटों से—गढ़ा गया है और ग्रे सीमेंट से बना नया कैंपस अब उसे संगत दे रहा है. अलबत्ता ये छात्रों और आगंतुकों, दोनों के लिए समान रूप से आकर्षक बने हुए हैं. जो बात संस्थान को और भी ज्यादा उल्लेखनीय बनाती है, वह है इसका अत्याधुनिक बुनियादी ढांचा और भविष्य के लिए तैयार पाठ्यक्रम, जो यह आगामी कल के नेतृत्वकर्ताओं को तैयार करने के लिए प्रस्तुत करता है.
इसे केवल विडंबना से भरा बदलाव कहा जा सकता है कि 1990 के दशक में आइआइएम-ए उद्यमशीलता का एक कोर्स मुहैया करता था, जिसे मैंने उस वक्त चुना. अपनी जिंदगी में बाद में कहीं जाकर मैंने जाना कि मैं कॉर्पोरेट जीवन बिताने के बजाए अपने दम पर कुछ न कुछ अपना निर्माण करना चाहता था. एमबीए करने के बाद मैंने एबीए एम्रो और फिर जीई मनी में कुछ वक्त काम किया.
मगर निजी उपलब्धि के एहसास का अभाव मुझे भीतर ही भीतर कुतरता रहता था और मैं कुछ ज्यादा करने के लिए छटपटा रहा था. मुझे इंटरनेट का कीड़ा लग चुका था और मैं मानता था कि इंटरनेट जिस तरह उस वक्त तक अकल्पनीय ढंग से सूचना को लोकतांत्रिक बना रहा था, उसको देखते हुए सामान्य कामकाज में बड़ा और सार्थक बदलाव आने वाला है. शुरुआत मुंबई के मॉल में एक वेंचर कैपिटलिस्ट के साथ मुलाकात से हुई—हमने उत्साह के साथ एक पेपर नैपकिन पर नए कारोबार की योजना लिखी और बाकी इतिहास है.
मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि यह संस्थान आज पहले से कहीं ज्यादा उद्यमियों को तैयार कर रहा है. कुछ छात्र तो अपने दम पर अपना कुछ शुरू करने के लिए प्लेसमेंट में शामिल तक नहीं होते—वे बहुत छोटा-सा हिस्सा हो सकते हैं, पर शुरुआत तो हो रही है. जिस वक्त मैंने खुद अपना काम शुरू करने के लिए अपनी कॉर्पोरेट नौकरी को तिलांजलि दी, मैं आइआइएम-ए के कुछ मुट्ठीभर लोगों में से था, जिन्होंने अलग रास्ता चुना था.
फिर ऐसे भी पूर्व छात्र हैं जो सामाजिक उद्यमी बनने का रास्ता चुन रहे हैं और इस धारणा को चुनौती दे रहे हैं कि बिजनेस स्कूलों से केवल कैपिटलिस्ट लीडर ही बनकर निकलते हैं. गिव इंडिया सरीखे संगठन, जो प्रमाणित नॉन-प्रोफिट दानदाताओं की फंडिंग की व्यवस्था करते हैं; भारत में माइक्रोलेंडिंग का नवोन्मेषी संगठन बैसिक्स या प्रयास सरीखे चैरिटी संगठन आइआइएम-ए के पूर्व छात्रों ने स्थापित किए हैं और वे ही इन्हें चला रहे हैं.
दुनिया के बेहतरीन बिजनेस स्कूलों के साथ मिलकर काम करने, रिसर्च में गहरी भागीदारी, नोबेल पुरस्कार विजेताओं सहित जाने-माने अध्येताओं के कैंपस में आने के साथ और नवाचारी इन्क्यूबेशन तथा उद्यमशीलता केंद्र के तौर पर आइआइएम-ए विश्व स्तरीय शिक्षा की बदलती जरूरतों के साथ कदमताल कर रहा है. इसका पूर्व छात्र होने के नाते मेरे लिए पूर्वाग्रह से मुक्त हो पाना मुश्किल है, पर इस संस्थान, इसके शिक्षकों और पूर्व छात्रों के नेटवर्क के साथ संपर्क में रहने के चलते मैं आइआइएम-ए के भविष्य को लेकर बेहद आशान्वित हूं.
(दीप कालरा आइआइएम-अहमदाबाद के पूर्व छात्र और मेकमाइट्रिप डॉट कॉम के सीईओ हैं).
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