सूचना का कोई अधिकार नहीं
डेडलाइंस यकीनन काफी सख्त होती हैं, और आधिकारिक रूप से पत्रकारों को 15 मिनट से ज्यादा ऑनलाइन रहने की इजाजत नहीं है.

मोअज्जम मोहम्मद
अगस्त की 5 तारीख से ही श्रीनगर के गुलजार रहने वाले न्यूजरूम खामोश हो गए हैं. इसके बजाए रिपोर्टर और संपादक शहर के सोनावर इलाके में एक होटल में स्थित सरकार-नियंत्रित 'मीडिया फेसिलिटेशन सेंटर' में कतार लगाकर जमा होते हैं. खुले, गलीचे लगा यह हॉल सीसीटीवी निगरानी में है और वहां इंटरनेट की सुविधा (बाकी कश्मीर में इंटरनेट पर अब भी रोक है) वाले दस कंप्यूटर हैं. दुनियाभर के 300 पत्रकारों के लिए वहां सिर्फ एक फोन है.
डेडलाइंस यकीनन काफी सख्त होती हैं, और आधिकारिक रूप से पत्रकारों को 15 मिनट से ज्यादा ऑनलाइन रहने की इजाजत नहीं है, फिर भी थोड़ी-बहुत देर हो ही जाती है. लिहाजा डेडलाइन पर खबरें भेजने के लिए बेसब्र पत्रकारों की कतार लंबी होती जाती है और अक्सर पारा गरम हो जाता है. एक उर्दू दैनिक में वरिष्ठ रिपोर्टर, 40 वर्षीय बिलाल फुरकानी कहते हैं, ''यकीनन हमारे काम पर असर पड़ा है, इस बात को नापने का कोई ठीक-ठीक पैमाना नहीं है कि बगैर इंटरनेट या यहां तक कि फोन के, खबर देने में हमें किस कदर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.''
दुनिया के सबसे ज्यादा सैन्यीकृत क्षेत्रों में शामिल कश्मीर में मुश्किलों के बावजूद स्थानीय कश्मीरी मीडिया को प्रमाणिक खबरों के लिए ख्याति हासिल है. स्थानीय लोग स्थानीय प्रेस पर ही यकीन करते रहे हैं. लेकिन अब ग्रेटर कश्मीर, कश्मीर रीडर, और राइजिंग कश्मीर जैसे प्रमुख दैनिकों को भी अपने संस्करणों का आकार 20 पन्नों से कम करके आठ पन्नों का करना पड़ा है और वे भी ज्यादातर प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की खबरों से भरे रहते हैं. न कोई संपादकीय होते हैं, न ही खबरों पर कोई बहस या चर्चा और न ही कोई विश्लेषण होता है.
दूसरी ओर, कभी रौनक से भरपूर रहने वाले श्रीनगर के रीगल चौक पर स्थित अखबार और मैगजीन की स्टॉल के मालिक हिलाल अहमद बट का कहना है कि इंटरनेट न होने के कारण इतनी मांग पहले कभी नहीं रही. राष्ट्रीय अखबार और पत्रिकाएं 12 सितंबर तक श्रीनगर में उपलब्ध नहीं थीं. ऐसा सिर्फ तीसरी बार हुआ है—पहले 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में आतंकवाद के पनपने के वक्त और फिर 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद विरोध के दौरान. लेकिन श्रीनगर में इस समय लोग कश्मीर के बारे में पढऩे को बेताब हैं, भले ही वे उन अखबारों पर ज्यादा यकीन न करते हों.
वहीं, किसी समय काफी लोकप्रिय रही समाचार वेबसाइटों की पाठकों की संक्चया में काफी कमी आई है क्योंकि 5 अगस्त के बाद वे कोई अपडेट ही नहीं कर पा रही हैं. मसलन, एक वेब एनेलिटिक्स फर्म के अनुसार, ग्रेटर कश्मीर की वेबसाइट का मासिक ट्रैफिक 19 जुलाई को 34 लाख था, और 19 अगस्त तक उसके मासिक ट्रैफिक की संक्चया 11 लाख रह गई. कभी लोकप्रिय रही कश्मीर लाइफ वेबसाइट ने मीडिया सेंटर से अपना कामकाज फिर शुरू करने की कोशिश की, पर उसे जूझना पड़ रहा है. उसके पत्रकार मसूद हुसैन मीडिया सेंटर की तुलना ''सार्वजनिक पेशाबघर से करते हैं, जहां हर कोई अपना काम तुरंत करने को आतुर होता है.''
वहीं, सूचना ब्लैकआउट के 60 दिन पूरे होने पर पत्रकारों ने धरना दिया. किसी लोकतंत्र में सूचना एक अधिकार होती है और कश्मीरियों से यह अधिकार भी अब छिन चुका है.
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