मेहनत और सौगात का मीठा फल

एन. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी को तेलंगाना विरोधी बताकर उस पर हमला किया जिसने राज्य के विभाजन का विरोध किया था; अंतरराज्यीय जल बंटवारे के मुद्दे पर जनाक्रोश को भी अपने पक्ष में भुनाया.

शिखर पर रावः चुनाव नतीजों के बाद 11 दिसंबर को हैदराबाद में टीआरएस भवन से बाहर निकलते केसीआर
शिखर पर रावः चुनाव नतीजों के बाद 11 दिसंबर को हैदराबाद में टीआरएस भवन से बाहर निकलते केसीआर

तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और उसके संस्थापक के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) के लिए लगातार दूसरे विधानसभा चुनाव की जीत उस समय और भी शानदार हो गई जब उन्होंने 2014 में पहली बार सत्ता में आने के लिए मिले जनादेश से कहीं ज्यादा जोरदार जीत हासिल की. उन्होंने तय वक्त से आठ महीने पहले चुनाव करवाए और लगातार 90 दिन लंबा चुनाव अभियान चलाया. इस तरह जोखिम उठाने के बावजूद तेलंगाना के गौरव और जनसमर्थक कल्याणकारी नीतियों के बलबूते वे सत्ता विरोधी भावनाओं को शानदार चुनावी फतह में बदलने में कामयाब रहे. जल्दी चुनाव करवाने का उनका जुआ कारगर साबित हुआ और तेलंगाना की पहली विधानसभा को भंग करने की वजह के तौर पर उन्होंने जिस "राजनैतिक अस्थिरता'' का जिक्र किया था, वह तेलंगाना के सियासी आसमान से कम से कम इस बार तो छंट गई.

टीआरएस ने सियासी पंडितों की लंबे वक्त से चली आ रही इस धारणा को चकनाचूर कर दिया कि जब लोग बहुत बड़ी तादाद में वोट देने के लिए निकलते हैं तब यह सत्तारूढ़ पार्टी के लिए नुक्सानदेह होता है. टीआरएस ने 2014 में 119 सदस्यों की विधानसभा में 63 सीटें जीती थीं, जबकि 11 दिसंबर को उसने 88 सीटों पर विजय हासिल की. केसीआर ने वोटरों के मन में यह बात बिठाई कि अपनी ढेर सारी कल्याणकारी योजनाओं और रेवडिय़ां बांटकर उन्होंने लोगों को जो फायदे पहुंचाए हैं, वे दिखाते हैं कि उन्होंने अपना हरेक काम लोगों के हित को दिल में रखकर किया है और इस सबके जरिए वे बंगारू (सुनहरे) तेलंगाना के लक्ष्य की तरफ आगे बढ़े हैं. इसका उन्हें जबरदस्त फायदा मिला.

केसीआर ने "रेवडिय़ों की बौछार'' की रणनीति अपनाई और पक्का किया कि उनकी योजनाओं में से कम से कम तीन योजनाओं के फायदे राज्य के हरेक वंचित और साधनहीन परिवार तक पहुंचें. इसका नतीजा यह हुआ कि हरेक निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम 40,000 परिवार उनके कट्टर समर्थक बन गए.

तमाम कल्याणकारी योजनाओं का सीधा फायदा 1.1 करोड़ लोगों को मिला. टीएसआर सरकार इस उसूल पर चली कि असल अहमियत लोगों की है, उनकी नहीं, जो लोगों की नुमाइंदगी करते हैं और इसीलिए उसने सरकारी योजनाओं के फायदे अपने सियासी विरोधियों के निर्वाचन क्षेत्रों के लोगों को भी दिए. सबसे ज्यादा फायदे राज्य के 50,87,332 किसानों को मिले, जिन्हें "रायतु बंधु'' योजना के तहत साल में प्रति एकड़ 8,000 रु. की इनपुट निवेश सहायता दी गई.

उसके बाद तमाम वंचित तबकों के 39,58,771 लोगों को "आसरा'' पेंशन (हकीकत में मासिक खैरात) दी गई. गर्भवती माताओं के लिए केसीआर किट और बालिकाओं तथा दुलहनों को सहारा देने के लिए "कल्याण लक्ष्मी'' और "शादी मुबारक'' नाम से दी गई सहायताएं शामिल थीं. उनकी एक और योजना "कांति वेलुगु'' के तहत 15 अगस्त से 3 दिसंबर के बीच एक करोड़ जितनी बड़ी तादाद में लोगों को आंखों की देखभाल की सेवा मुहैया की गई, जिसमें तकरीबन 17 लाख जरूरतमंद लोगों को पढऩे के चश्मे देना भी शामिल था.

केसीआर ने इस बात को लेकर पूरा होमवर्क किया था कि खैरातों की भरमार की उनकी रणनीति कैसे वोट की बरसात लेकर आएगी. ऐसा हुआ भी. 119 में से केवल 17 को छोड़कर तमाम निर्वाचन क्षेत्रों में 2014 के मुकाबले ज्यादा बड़ी तादाद में लोग वोट देने निकले, जबकि 31 में से 14 जिलों में आदमियों की बनिस्बत औरतें ज्यादा तादाद में वोट देने आईं. उनसे पहले दूसरों ने भी खैरातों की बौछार की इस रणनीति पर भरोसा किया था और काफी हद तक कामयाब रहे थे.

इनमें तमिलनाडु में एआइएडीएमके की (दिवंगत) मुखिया जे. जयललिता और अविभाजित आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के (दिवंगत) पूर्व मुख्यमंत्री वाइ.एस. राजशेखर रेड्डी (2009 के लोकसभा चुनाव की दौड़ में दूसरा कार्यकाल पक्का करने के लिए) प्रमुख थे. हैदराबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रामब्राह्मन इवातूरी कहते हैं, "राज्य के गठन की शुरुआती दिक्कतों के बावजूद कल्याणकारी उपायों के लिहाज से उन्होंने खासा काम किया. वे लोगों के साथ टिकाऊ रिश्ता जोडऩे में भी कामयाब रहे. "इंथाति बक्कोडि मीडाकि इंथा मांडा'' (इस कमजोर आदमी के खिलाफ इतने सारे लोग?) जैसी सीधी और चटक लाइनें उनके भाषणों की पहचान बन गईं और लोगों के सीधे दिल में उतर गईं.''

केसीआर को इस बात से भी मदद मिली कि कांग्रेस की अगुआई वाले चार पार्टियों के गठबंधन "प्रजाकुटमी'' ने वक्त रहते एकजुटता नहीं दिखा पाया. राजनैतिक टीकाकार सी. नरसिंह राव कहते हैं, "केसीआर हरेक तबके को यह बताने में कामयाब रहे कि लोगों की चिंताएं उनकी अपनी हैं. कांग्रेस के पास टीआरएस को हराने के अलावा कोई और राजनैतिक थीम नहीं था. लोगों ने इस बात को तवज्जो ही नहीं दी कि कांग्रेस टीआरएस से बेहतर हो सकती है." हालांकि वे मानते हैं कि "क्लीन स्वीप की उम्मीद किसी को नहीं थी.''

कला चलो की बजाय कांग्रेस ने दिल्ली में एनडीए का ज्यादा बड़ा अखिल भारतीय विकल्प खड़ा करने के अपने मकसद से एन. चंद्रबाबू नायडू की अगुआई वाली टीडीपी सहित दूसरी पार्टियों के साथ हाथ मिला लिया. विश्लेषकों के साथ-साथ कांग्रेस के भीतरी लोग भी अब मानते हैं कि यह गठबंधन कांग्रेस के खिलाफ गया. इतना ही नहीं, सीटों के बंटवारे पर बातचीत में इस कदर देरी हुई कि कुछ सीटों के उम्मीदवारों के नामों का ऐलान पर्चा भरने की आखिरी तारीख से एक दिन पहले किया गया. इससे उन्हें प्रचार करने के लिए बहुत कम वक्त मिला.

इसके उलट टीआरएस के ज्यादातर उम्मीदवारों के नाम भी विधानसभा भंग होने के फौरन बाद 6 सितंबर को घोषित कर दिए गए थे. लिहाजा जब वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों का तीसरा दौरा कर रहे थे, तब प्रजाकुटमी के उम्मीदवारों के पास चुनाव से पहले निर्वाचन क्षेत्रों में महज एक बार जाने का वक्त था.

रामब्राह्मन कहते हैं, "कांग्रेस और टीडीपी के कई पारंपरिक समर्थकों को "प्रजाकुटमी'' रास नहीं आया, इसलिए भी कि दोनों एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे थे. सबसे अहम बात यह कि यह गठबंधन लोगों के बीच भरोसा कायम नहीं कर सका.'' इसके अलावा मजबूत ताकत के तौर पर उभरने के लिए प्रजाकुटमी के पास ज्यादा वक्त भी न था.

ऐसा नहीं था कि केसीआर विपक्षी गठबंधन से हैरान-परेशान न हुए हों. चुनाव प्रचार के आखिरी हफ्ते में उन्होंने अपने बेटे के.टी. रामराव और भतीजे टी. हरीश राव को कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में भेजा और खुद हेलिकॉप्टर से छोटे-छोटे पड़ावों के चुनाव अभियान पर निकल गए. उन्होंने लोगों को आगाह किया कि तेलंगाना का आत्मसम्मान दांव पर लगा है और प्रजाकुटमी की साजिशें तेलंगाना की तरक्की का गला घोंट देंगी. यहां तक कि आखिरी दिनों में उन्होंने नायडू को तरक्की के दुश्मन जैसे एक हौवे के तौर पर पेश किया. इस अभियान के कई पड़ावों पर केसीआर ने कहा, "नायडू मेंटल केस हैं. वे बार-बार दोहराते हैं कि हैदराबाद के निर्माण का श्रेय उन्हें जाता है, जबकि अमरावती के निर्माण के लिए वे एक ईंट तक नहीं लगा सके हैं.''

टीआरएस ने प्रजाकुटमी को इस चुनाव में बड़ा झटका दिया है. वोटों में उसकी हिस्सेदारी 2014 के 34.3 फीसदी से उछलकर 46.8 फीसदी तक पहुंच गई जबकि कांग्रेस का वोट शेयर 2014 के 25.2 फीसदी से बढ़कर 28.4 तक ही जा सका. सबसे बड़ी पराजय टीडीपी के खाते में आई है. उसका वोट प्रतिशत 14.7 फीसदी से घटकर महज 3.4 फीसदी तक पहुंच गया. इस करारी हार में कांग्रेस सिर्फ 19 सीटों तक सिमट गई, इसमें प्रदेश अध्यक्ष एन. उत्तम कुमार रेड्डी भी शामिल हैं, जबकि टीडीपी आंध्र प्रदेश से लगे खम्मम इलाके में 2 सीटें ही जीत पाई. विपक्षी पार्टियों में भाजपा तो तबाह हो गई और उसके प्रदेश पार्टी अध्यक्ष के. लक्ष्मण भी चुनाव हार गए. उनकी एकमात्र जीत हैदराबाद के बेगम बाजार सीट पर हुई जहां से विवादित टी. राजा सिंह दोबारा जीते. इधर, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) ने 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और उसमें से इसने 7 पर जीत का परचम लहराया. इस तरह ओवैसी ने पुराने हैदराबाद पर अपनी पकड़ फिर से साबित की.

अब बंगारू तेलंगाना का वादा और चुनाव अभियान के दौरान किए गए ताजे वादे पूरा करना केसीआर के सामने बड़ी चुनौती होगी. उन्होंने ऐलान किया है कि जिस दिन राज्य के किसानों के पास अपने-अपने बैंक खाते में 10 लाख रुपए होंगे, तब यह कहने का सही वक्त होगा कि "बंगारू तेलंगाना'' सच्चे मायनों में साकार हो चुका है. टीआरएस के प्रमुख कहते हैं, "राज्य का यह जो नया एजेंडा है, यही मेरी प्राथमिकता है.'' इस नए एजेंडे में शामिल है—मुसलमानों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षा और रोजगार में 12 फीसदी आरक्षण पक्का करना, राज्य सरकार के कर्मचारियों की रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 61 साल करना, आसरा पेंशन की पात्रता की उम्र 65 से घटाकर 57 साल करने के साथ-साथ इसकी रकम बढ़ाकर 2,016 रुपए महीना करना, बेरोजगार नौजवानों को 3,016 रुपये की खैरात देना और पूरी आबादी को सेहतमंद बनाने के लिए राज्य भर में ज्यादा स्वास्थ्य जांच और कवर देना. इस मद में 50,000 करोड़ रुपए की जरूरत होगी.

हैदराबाद विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर ई. वेंकटेश कहते हैं, "टीआरएस के सामने जो चुनौतियां मौजूद हैं, उनमें मंत्रिमंडल में कई सारे सामाजिक वर्गों को नुमाइंदगी देना (पहले कार्यकाल में कोई महिला मंत्री नहीं थी), अलग राज्य के गठन के आंदोलन के वक्त उठाए गए मुद्दों से मुखातिब होना, एक करोड़ एकड़ जमीन को सींचना, राजकाज के सुधार, तेलंगाना के भीतर क्षेत्रीय संतुलन पक्का करना और विकेंद्रीकृत राजकाज को बढ़ावा देना प्रमुख हैं.''

इसके आगे केसीआर "गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा राष्ट्रीय विकल्प'' के तौर पर क्षेत्रीय पार्टियों का एक राष्ट्रीय संघ बनाने के लिए उत्सुक है और इसकी खातिर वे आने वाले महीनों में दिल्ली में पड़ाव डालने का मंसूबा बना रहे हैं. केसीआर कहते हैं, "गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा फेडरल फ्रंट सरकार लोगों की आकांक्षाएं पूरी करने के लिए अकेला रास्ता है. भाजपा और कांग्रेस दोनों दिल्ली में बैठकर राज्यों के ऊपर सामंती नियंत्रण कायम रखना चाहती हैं. मैं कुछ विषय राज्यों को विकेंद्रीकृत करने की मांग करता आ रहा हूं, पर वे मेरी आवाज को दबाने पर आमादा हैं.''

सहकारी संघवाद को मजबूत करने की अपनी कोशिश में टीआरएस लंबे-चौड़े ढांचागत सुधारों की मांग कर रही है. इनमें एक तो यह है कि केसीआर देश के तमाम हिस्सों में सुप्रीम कोर्ट की पीठें बनाने के साथ एक अखंड सुप्रीम कोर्ट का आधिपत्य खत्म करना चाहते हैं. वे कहते हैं, "हमें जन केंद्रित आर्थिक मॉडल के साथ-साथ कृषि मॉडल की जरूरत है. यह दुखद है कि मोटे तौर पर कृषि प्रधान मुल्क होते हुए भी हम उत्पादकता के बजाय केवल पैदावार के बारे में सोचते हैं और इसकी वजह से कोई 15 करोड़ किसान तकलीफें उठा रहे हैं.''

बहरहाल, आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि बीते दो दशक में कुल पड़े वोटों में क्षेत्रीय पार्टियों का हिस्सा लगातार बढ़ता गया है. 1984 के आम चुनाव में उन्हें 11.2 फीसदी वोट मिले थे, जबकि 2009 आते-आते यह आंकड़ा बढ़कर 28.4 फीसदी पर पहुंच गया. विश्लेषकों का अनुमान है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 180 से ज्यादा सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के मुकाबले क्षेत्रीय पार्टियों की अहमियत कहीं ज्यादा होगी. केसीआर कहते हैं, "हम पुरानी घिसी-पिटी लकीर पर चलने वाले नहीं हैं, बल्कि एक नए सौदे की पेशकश करेंगे.'' इसके ब्योरों का खुलासा अलबत्ता वे नए साल की शुरुआत में करने का वादा करते हैं. उन्हें उम्मीद है कि अगले संसदीय चुनाव के बाद यह फेडरल फ्रंट ही सत्ता में आएगा.

Read more!