ओडिशाः सेवायतों से हारे जगन्नाथ
श्री मंदिर का प्रबंध तंत्र शंकराचार्य की उपेक्षा करता है. कभी भी मुझसे सुझाव मांगने या सलाह लेने की जरूरत नहीं समझी जाती. सुप्रीम कोर्ट द्वारा भेजे गए गोपाल सुब्रह्मण्यम मेरे पास जरूर आए थे, उनसे विस्तार से बातचीत कर मैंने सुझाव भी दिए.

भगवान जगन्नाथ ने मानो अपने ही सेवायतों के आगे हाथ खड़े कर दिए हैं. भक्तिभाव से पुरी आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर परिसर में आए दिन अपमानित होना पड़ता है और कभी-कभी तो वे सेवायतों के हाथों पिट भी जाते हैं. ज्यादातर मामलों में बखेड़े की एक ही वजह होती हैः बेजा वसूली.
इस अव्यवस्था से परेशान श्रद्धालुओं की आम शिकायत है कि मंदिर में धनी जजमान की आवभगत होती है जबकि गरीब जजमान का अपमान. श्री मंदिर क्षेत्र के सिंहद्वार थाने में ऐसी कई रिपोर्ट दर्ज हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी सेवा के कार्य में लगे सेवायतों के जेबी संगठन जगन्नाथ सेना ने श्री मंदिर सुधार के सुझावों पर अमल करने के विरोधस्वरूप 3 अक्तूबर को पुरी बंद के नाम पर भारी हिंसा की. इसमें पुलिस, जेबी संगठन के बंदूकधारियों और मीडिया कर्मियों समेत 26 लोग चोटिल हुए. दोतरफा फायरिंग हुई.
भक्तजन दिन भर भूखे प्यासे रहे. नतीजाः बाजार वीरान हो गए और वाहनों की आवाजाही भी बंद गई. सुधार पर अमल करने की पहल करने वाले श्री मंदिर प्रशासन के कार्यालय में सेवायतों के संगठन ने तोडफ़ोड़ और लूटपाट की. इस संगठन के लोगों ने राजस्व मंत्री महेश्वर महंति के आवास पर भी तोडफ़ोड़ की. पुरी के लोग बताते हैं कि जगन्नाथ मंदिर के सामने इतनी हिंसा पहली बार देखी गई. इस मामले में 47 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है.
सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर सुधार के विरोध में हुई हिंसा पर संज्ञान लेते हुए 10 अक्तूबर को कहा कि मंदिर के भीतर पुलिस को जूते पहनकर और हथियार लेकर दाखिल नहीं होना चाहिए. पुरी मंदिर प्रबंधन से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार पुरी निवासी जगन्नाथ बस्तिया का कहना है, ''हिंसा की घटना दुर्भाग्यपूर्ण है. दोषी लोगों के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए. पंक्तिबद्ध अनुशासित तरीके से दर्शन व्यवस्था की जाए. भगवान जगन्नाथ की सेवा पूजा निर्धारित समय पर होनी चाहिए. दान श्री मंदिर प्रशासन को मिलना चाहिए ताकि संचालन अच्छी तरह से किया जाए.''
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार को श्री जगन्नाथ मंदिर के प्रबंधन में सुधार के लिए पुरी जिला जज के प्रस्तावों को लागू करने के निर्देश दिए थे. आए दिन होने वाली भक्तों की प्रताडऩा की शिकायत को लेकर दायर की गई याचिका की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के जज आदर्श कुमार गोयल और एस. अब्दुल नजीर की बेंच ने आदेश दिया कि ओडिशा सरकार यह सुनिश्चित करे कि भक्तों से कोई जोर जबरदस्ती ना हो. सुधार के लिए सिफारिशें लागू की जाएं.
इसी साल 18 मार्च को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उनकी पत्नी के साथ सेवायतों के दुव्र्यवहार का मामला चर्चा में आने के बाद सेवायतों की मनमानी को गंभीरता से लिया गया. राष्ट्रपति के साथ हुए भेदभाव की खबर सामने आने के बाद पुरी जिला एवं सेशन जज ने कहा था कि थाली और कलश में किसी से दान लेना अवैध है. दान देने वाले हुंडी में पैसा डाल सकते हैं.
कोर्ट के संज्ञान में यह बात भी लाई गई थी कि बड़ी संख्या में विदेशी पुरी मंदिर को देखने आते हैं पर गैर-हिंदू होने के कारण इन लोगों को मंदिर के भीतर जाने नहीं दिया जाता. सुप्रीम कोर्ट ने श्री मंदिर प्रबंधन से गैर-हिंदुओं को भी प्रवेश पर विचार करने को कहा. कोर्ट ने यह भी साफ तौर पर कहा कि भक्तों के चढ़ावों पर सेवायतों का कोई अधिकार नहीं है. मंदिर की व्यवस्था सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सेवायतों ने पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्णय लिया है.
श्री मंदिर प्रशासन के जनसंपर्क अधिकारी लक्ष्मीधर पूजापंडा की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार, ''महाप्रभु जगन्नाथ के 36 निजोग के दस हजार सेवायत हैं. अधिकांश लोगों का कहना है कि सेवायतों के पारिवारिक उत्तराधिकार की व्यवस्था समाप्त होनी चाहिए.'' हालांकि महाप्रभु जगन्नाथ के प्रथम सेवायत दिव्यसिंह देव कहते हैं, ''पारिवारिक उत्तराधिकार समाप्त नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन सेवायतों को भी अपना दायित्व ईमानदारी से निर्वहन करना चाहिए.'' मंदिर के संचालन का एक दल तिरुपति मंदिर समेत देश के कुछेक मंदिरों में गया भी था.
एक सदस्य का कहना है कि सेवायत लोग चढ़ावा तो लेते ही हैं साथ ही सरकार से भी अनौपचारिक रूप से रकम ऐंठते हैं. रथयात्रा और नवकलेवर के मौके पर रथ में चढऩे की एवज में लाखों रु. ऐंठे जाते हैं. दइतापति निजोग के सभापति रामकृष्ण दास महापात्र का कहना है, ''सेवायतों का आचरण और व्यवहार भक्तों को लेकर अच्छा होना चाहिए. जगन्नाथ जी की रीति-नीति बाकी मंदिरों से अलग है. यहां 12 बार भोग लगता है. ऐसे में पंक्तिबद्ध दर्शन व्यवस्था होने पर बड़ी संख्या में भक्त एक साथ दर्शन ही नहीं कर पाएंगे.''
जगन्नाथ संस्कृति के जानकार असित महंति बताते हैं, ''रीति के अनुसार जिस सेवायत की जो सेवा निर्धारित है वह वही कर सकता है. सेवायत इस का फायदा उठाते हैं.'' दूसरी तरफ इस प्रथा का नतीजा कितना गंभीर हो सकता है इसका एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मान लें रसोई की सेवा के लिए नियुक्त सेवक के परिवार में किसी की मौत हो गई और वह नहीं आ पाया तब ऐसे में परंपरा के अनुसार 50 लाख का महाप्रसाद मंदिर परिसर में बने कोइली बैकुंठ में दफना दिया जाएगा.
दइतापति निजोग के सहमंत्री विश्ववसु विनायक दास महापात्र का कहना है कि सेवायतों को भी अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए. सेवायतों की ओर से याचिका तैयार की जा रही है. सेवायतों के रवैए से साफ है कि राज्य में सरकार चाहे जिसकी हो पर मंदिर में तो सेवायतों की सरकार है. सुप्रीम कोर्ट का दखल कितना कारगर होता है यह तो समय बताएगा पर पुरी में सेवायतों के विरोध से तनाव है.
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