नैय्या पार लगाओ, हे! दयानिधान
अतीत में हिंदू छवि से परहेज करने वाली पार्टियां भी खेल रही हिंदू कार्ड. क्या ये भाजपा को उसी के खेल में दे पाएंगी मात?

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 18 सितंबर को सड़क के किनारे बड़े-बड़े पोस्टरों में राहुल गांधी शिवलिंग पर जल चढ़ाते नजर आ रहे थे. कैलाश मानसरोवर की 12 दिन की यात्रा के बाद लौटे कांग्रेस अध्यक्ष ने उस रोज विधानसभा चुनाव वाले इस राज्य में बड़ी रैली की. हालांकि उन्होंने किसी धार्मिक भावना का आह्वान नहीं किया लेकिन पोस्टरों ने इस नए "शिवभक्त'' के जरिए जाहिर कर दिया कि कांग्रेस "सॉफ्ट हिंदुत्व'' की दहलीज पर खड़ी है. बहुसंख्यक मतदाताओं को रिझाने के लिए केवल कांग्रेस ही नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा) और यहां तक कि वामपंथी पार्टियां भी धर्म के उसी मार्ग पर चलती नजर आ रही हैं, जिसके लिए वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कोसती रही हैं.
दरअसल, भाजपा की कामयाबी ने इन पार्टियों को बहुसंख्यक मतदाताओं को धर्म के नाम पर रिझाने का सबक सिखाया है. और यह बेसबब नहीं है. जरा गौर करेः हिंदुत्ववादी कही जाने वाली भाजपा ने करीब 17 करोड़ वोट हासिल कर लोकसभा की 282 सीटों के साथ जोरदार जीत दर्ज की. फिर तीन साल बाद मार्च 2017 में उसने उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव भी भारी बहुमत से जीत लिया. देश के इस सबसे बड़े सूबे में लोकसभा की 80 में 71 सीटें और विधानसभा की 403 में से 312 सीटें भाजपा अपने खाते में करने में सफल रही. प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण का मुद्दा पार्टी के 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र और एजेंडे में था. इस दौरान पार्टी ने जमकर हिंदुत्व का कार्ड खेला और धार्मिक ध्रुवीकरण में कामयाब रही.
मिसाल के तौर पर भाजपा ने जगह-जगह प्रचार किया कि सियासी पार्टियां हिंदू वोटरों को रिझाने की जगह अल्पसंख्यक (मुख्य रूप से मुसलमान) वोट बैंक पर अपनी पकड़ बनाने में जुटे रहीं.
विपक्षी दल के नेताओं ने भी इस धारणा में मदद की. मिसाल के तौर पर, 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान मुलायम सिंह यादव ने बनारस की एक रैली में कहा कि जो लोग मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर सवाल उठा रहे हैं क्या वे बता सकते हैं कि मुसलमानों की मदद सपा से ज्यादा किसने की है. इस तरह के बयानों से ध्रुवीकरण को और बढ़ावा मिला.
ऐसे में पिछले लोकसभा और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया भाजपा ने हिंदुत्व को अपने केंद्र में रखते हुए अपनी विरोधी पार्टियों के मुस्लिम वोट बैंक को प्रभावी नहीं होने दिया (मुस्लिम वोट भाजपा विरोधी दलों में बंट गए). लिहाजा, भाजपा विरोधी पार्टियों ने हिंदू वोटर नाराज न हो, इसको लेकर हिंदू देवी-देवताओं की पैरोकारी तेज कर दी है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल के खुद की हिंदू धर्म में आस्था दिखाने और कैलाश मानसरोवर से लेकर विभिन्न मंदिरों की यात्रा करने को भी इसी रूप में देखा जा रहा है, हालांकि राहुल संसद में स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्हें हिंदुत्ववादी नहीं बल्कि हिंदू धर्म में आस्था है.
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सदस्य जीवीएल नरसिंह राव कहते हैं, "मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा करने वाले दलों के नेता अचानक से मंदिर जाने लगे हैं तो सिर्फ इसलिए कि वे धर्म की राजनीति करने लगे हैं. वामपंथियों से लेकर ममता बनर्जी तक मंदिर जाने लगी हैं. यह अच्छी बात है, लेकिन धर्म के नाम पर सियासत करना ठीक नहीं है.'' यह दीगर बात है कि भाजपा खुद हिंदुत्व को अपने एजेंडे में रखती है.
यहां तक कि वैचारिक अंतर्विरोध के बावजूद वापमंथी दलों ने भी मंदिर और हिंदू धर्म को लेकर अपना रुख लचीला कर लिया है. गॉड्स ओन कंट्री कहे जाने वाले केरल में सितंबर, 2017 में एलडीएफ सरकार के देवस्वम मंत्री के. सुरेंद्रन त्रिशूर स्थित गुरुवायूर मंदिर पहुंचे थे. केरल के वामपंथी सरकार में शायद पहला मौका था जब सरकार के एक मंत्री न सिर्फ मंदिर पहुंचे बल्कि वहां पूजा-अर्चना भी की. भाजपा नेताओं ने इसे अच्छा कदम बताया, लेकिन इसे हिंदू वोटरों को रिझाने की कोशिश भी करार दिया.
विवाद होने पर वामपंथी सरकार कुछ हद तक बैकफुट पर आई और माकपा ने इस मामले पर एक कमेटी बना दी. सूत्रों का कहना है, "पार्टी की विचारधारा के मुताबिक ऐसा करने वाले मंत्री को न सिर्फ सरकार से हटाया जाता है बल्कि पार्टी से भी बाहर का रास्ता दिखाया जाता.'' लेकिन कमेटी ने मंत्री को न तो हटाने की सिफारिश की, न ही मंत्री के मंदिर जाने की निंदा की. उन्हें सिर्फ चेतावनी देते हुए कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा, "सुरेंद्रन का बतौर मंत्री, मंदिर जाना गलत नहीं है लेकिन वहां जाकर पूजा-अर्चना करना पार्टी के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है.'' जाहिर है, एक तरह से पार्टी ने वामपंथी नेताओं या मंत्रियों को मंदिर जाने की मौन स्वीकृति प्रदान कर दी.
वहीं केरल भाजपा के अध्यक्ष पीएस श्रीधरन पिल्लै कहते हैं, "दरअसल वामपंथी पार्टियों को पता चल गया है कि हिंदू वोट के बिना उनका काम नहीं चलेगा. केरल सरकार को पता है कि सुरेंद्रन पर कार्रवाई करने से हिंदू वोटर नाराज हो जाएंगे. यह राज्य में भाजपा की बढ़ती ताकत का परिचायक है कि खुद को नास्तिक बताने वाले वामपंथी भी भगवान की शरण में आ रहे हैं.'' एलडीएफ सरकार की यह मंदिर नीति सीधे तौर पर हिंदू वोटरों को लुभाने की कोशिश भले न दिखे पर हिंदू वोटरों को नाराज होने से रोकने की कोशिश जरूर दिखती है.
इसी तरह पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के साथ-साथ भाजपा की भी धुर विरोधी टीएमसी प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी "हिजाब पहनने'' और "कलमा पढऩे'' की सियासत से निकल कर रामनवमी मनाने का ऐलान करने से खुद को नहीं रोक सकी. भाजपा प्रवक्ता राव कहते हैं कि ममता बनर्जी ने 2017 में रामनवमी का जुलूस नहीं निकलने देने का फरमान जारी किया था लेकिन अचानक उन्हें यह एहसास हुआ कि हिंदू वोटर उनसे दूर जा रहे हैं तो उन्होंने इस बार जुलूस निकालने का आदेश अपने कार्यकर्ताओं को दिया. 2014 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में मोदी लहर को रोकने में कामयाब रही थीं. खुलेआम मुस्लिम वोटरों की पैरोकारी करने वाली ममता जब 2016 में दोबारा मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने सरस्वती पूजा और मूर्ति-विसर्जन के लिए स्थान तय किए जिसे भाजपा ने पूजा पर अंकुश लगाने की साजिश बताई. मामले की गंभीरता को देखते हुए अगले साल ममता ने मू्रति विसर्जन के लिए रास्ते तय करने की कवायद छोड़ दी. राज्य के पंचायत चुनावों में भाजपा के प्रभावी (20 फीसदी सीट हासिल कर टीएमसी के बाद दूसरे नंबर की पर्टी बन गई) प्रदर्शन और उसके बढ़ते काडर को देखते हुए ममता ने अपने रुख को लचीला किया है.
पश्चिम बंगाल के भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "यह भाजपा की नैतिक जीत है कि मुख्यमंत्री को रामनवमी मनाने का फैसला करना पड़ा. पिछले साल उन्होंने इसका विरोध किया था.
टीएमसी के जो लोग यह तर्क दे रहे थे कि भगवान राम की पूजा बंगाल में होने की परंपरा नहीं रही है वह दरअसल बंगाली और गैर-बंगाली हिंदुओं में फूट डालना चाहते हैं.
जिस धूमधाम से रामनवमी मनाई गई उसने टीएमसी के झूठ को टिकने नहीं दिया.'' जाहिर है, 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रणनीतिक तौर पर ममता अब दूर्गापूजा, सरस्वतीपूजा, रामनवमी जैसे त्यौहार में टीएमसी कार्यकर्ताओं को शामिल होने के लिए कह रही हैं. टीएमसी के एक नेता मानते हैं कि रामनवमी जैसे जुलूस के विरोध से हिंदुओं में गलत धारणा बन रही थी. खासकर भाजपा जिस तरह से टीएमसी को हिंदू विरोधी पार्टी बताने में लगी थी उससे टीएमसी को नुक्सान होता.
आगामी आम चुनाव के सियासी दांव-पेच में 80 लोकसभा सीट वाला उत्तर प्रदेश बेहद अहम है. यहां खुद को मुस्लिम वोटरों की सबसे बड़ी हितैषी बताने वाली सपा भी अब प्रमुखता से हिंदू देवी-देवताओं की बात करने लगी है. सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसी साल अगस्त में घोषणा की कि अगर अगली बार राज्य में सपा सरकार बनेगी तो वे कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर की तर्ज पर भव्य विष्णु मंदिर बनवाएंगे. उन्होंने कहा, "सपा सरकार आने पर इटावा में 2,000 एकड़ भूमि पर विष्णु का भव्य मंदिर बनेगा. भगवान विष्णु के नाम पर मंदिर के पास एक शहर भी विकसित किया जाएगा.''
सपा का यह मंदिर राग पार्टी के उस अतीत को पीछे छोड़ चुका है जब सपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कथित तौर पर बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए कारसेवकों पर फायरिंग का आदेश दिया था और इसको लेकर हिंदुत्ववादी उसे घेरते रहे हैं.
अब तक खुले तौर पर इससे बचने वाले दलों के हिंदुत्व का चोला पहने की कवायद सिर्फ इन छिट-पुट राज्यों और स्थानीय दलों तक सीमित नहीं है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने पिछले साल गुजरात चुनाव में मुस्लिम परस्त होने के भाजपा के आरोपों की काट के लिए राहुल गांधी ने हर मंदिर केदर्शन किए, खुद को शिवभक्त घोषित कर दिया, तो उनके सिपहसलारों ने उन्हें जनेऊधारी ब्राह्मण के रूप में प्रचारित किया. अब फिर मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में राहुल ने चुनाव प्रचार के दौरान मंदिर दर मंदिर जाना शुरू कर दिया है. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच जब राहुल गांधी पहुंच रहे हैं तो "हर-हर भोले और बम-बम भोले'' नारे लग रहे हैं. गुजरात के बाद कर्नाटक चुनाव के दौरान भी राहुल का मंदिर जाना सुर्खियों में था. वहीं संसद के मॉनसून सत्र से तो राहुल ने हिंदू धर्म में अपनी आस्था का खुलकर इजहार शुरू कर दिया है.
कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, "भाजपा खुद को हिंदुत्ववादी पार्टी बता कर मॉब लिंचिंग और अन्य अनैतिक कार्यों को जायज ठहराने की कोशिश करती है. जबकि हिंदू धर्म ऐसा नहीं है. हिंदू धर्म में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं और राहुल गांधी उसी की बात करते हैं.''
सुरजेवाला के मुताबिक, "जो लोग राहुल गांधी के शिवभक्त होने या उनके मंदिर जाने की आलोचना करते हैं, दरअसल उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है. अगर ऐसा नहीं होता तो राहुल गांधी के मंदिर जाने से भाजपा को क्यों आपत्ति होती? दरअसल, भाजपा और आरएसएस लंबे समय से यह भ्रम फैला रही है कि कांग्रेस हिंदू विरोधी पार्टी है. अब उनकी साजिश बेनकाब हो गई है इसलिए राहुल के मंदिर जाने से भाजपा के लोग घबरा गए हैं.''
दरअसल, विपक्षी दल भाजपा की उस रणनीति को कुंद करना चाहते जिसके तहत ध्रुवीकरण का माहौल बनता है. भाजपा विरोधी दल यह बात अच्छी तरह से समझते हैं कि धुव्रीकरण की स्थिति में खासकर हिंदी पट्टी में भाजपा से मुकाबला करना कठिन है. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल मिलाकर लोकसभा की 225 सीटे हैं, जहां विपक्ष भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है. इसलिए विपक्षी दल किसी भी हाल में भाजपा को यह मौका देना नहीं चाहते कि वह इन राज्यों में विपक्षी दलों को मुस्लिम परस्त बता सके. भाजपा पर आक्रामक होने के लिए विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस ने नरम हिंदुत्व का राग छेड़ा है. वह मॉब लिंचिंग जैसे मुद्दे तो भाजपा के खिलाफ उठा रही है, लेकिन यह सावधानी भी बरत रही है कि इस चक्कर में वह मुस्लिम तुष्टिकरण करते हुए न दिखे.
राहुल गांधी या सुरजेवाला जब कहते हैं कि "हमारा (कांग्रेस का) हिंदुत्व वह नहीं है जो भाजपा या आरएसएस का है'' तो वे यह जताना चाहते हैं कि कांग्रेस उस हिंदुत्व को मानती है जिसे बहुसंख्य हिंदू मानते हैं यानी जिसमें हिंसा का निषेध हो. इसके जरिए कांग्रेस मुसलमानों का भरोसा भी कायम करना चाहती है और साथ ही हिंदुओं को भी नाराज होने का मौका देना नहीं चाह रही.
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "ध्रुवीकरण का माहौल बनाकर आरएसएस के लोग बहुसंख्यक वोटों (हिंदू वोट) को एकजुट रखने की चाल चलते थे, वहीं भाजपा विरोधी दल मुस्लिम पैरोकारी की बात करते थे और उनमें मुसलमान वोट बंट जाता था, लेकिन वह मौका अब भाजपा को नहीं मिलेगा.'' बीते दो साल में विपक्षी दलों ने ऐसा माहौल बना दिया कि भाजपा को अब अपने कोर वोट बैंक (हिंदू) को एकजुट रखने में मुश्किल हो रही है. महंगाई, किसानों की समस्या, दलित मसला, बेरोजगारी से लेकर भ्रष्टाचारी के आरोप कारोबारियों के भाग जाने और राफेल जैसे मुद्दों को लेकर भी लोगों में नाराजगी है. इन सत्ताविरोधी रूझान के कारण इस बार हिंदू वोट बैंक में बंटवारे को रोकना भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती है.
लेकिन भाजपा के मीडिया विभाग के प्रमुख तथा राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी कहते हैं, "कांग्रेस इस मुगालते में है कि राहुल गांधी खुद को शिवभक्त बताकर वोट हासिल कर लेगी. भाजपा को न सिर्फ हिंदुओं बल्कि मुसलमानों का भी वोट मिलेगा. भाजपा विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है. कर्नाटक और गुजरात में कांग्रेस को हराकर लोगों ने बता दिया कि जनता मोदी के साथ है न कि राहुल गांधी के साथ.''
सियासी दलों में खुद को हिंदू हितैषी बनाने की होड़ से आरएसएस भी गदगद है. संघ से जुड़े नेताओं का मानना है कि "केंद्र सरकार के लिए यह बेहतर मौका है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अन्य दलों से बातचीत शुरू करे.'' संघ को उम्मीद है कि ऐसे में राम मंदिर को लेकर आमराय बनाई जा सकती है.
विभिन्न दलों के नरम हिंदुत्व का रास्ता अपनाने से भाजपा को चुनौती मिले न मिले पर बहुसंख्यक वोटों के बंटवारे का आधार तैयार हो गया है.
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