विरासत की खोज
सरकारी विश्वविद्यालय ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि राज्य सरकारें नियुक्तियों को मंजूरी देने की गुजारिशों को बार-बार नजरअंदाज कर देती हैं, जबकि निजी विश्वविद्यालयों ने इसे खर्च बचाने की रणनीति के तौर पर अपनाया है.

इस फुटबॉल के मौसम में ज्यादातर भारतीय इस बात को लेकर अफसोसजदा हैं कि 1.3 अरब लोगों का देश ऐसे 11 खिलाड़ी नहीं बना सका जो फुटबॉल विश्व कप में खेल सकें. यह अकेला मैदान नहीं है जिसमें भारत दुनिया में पिछड़ा है. विश्वविद्यालय में शिक्षा की हालत ऐसा ही एक और क्षेत्र है.
प्राचीन काल में नालंदा और तक्षशिला सरीखे विश्वविद्यालयों ने हिंदुस्तान को उच्च शिक्षा का केंद्र बना दिया था. वह ऐतिहासिक विरासत कई वजहों से तार-तार हो गई. आज की कड़वी सच्चाई हैरू 850 भारतीय विश्वविद्यालयों में से एक भी विश्वविद्यालय किसी भी वैश्विक रैंकिंग में शीर्ष 20 में नहीं है.
तसल्ली की अकेली बात यह है कि क्यूएस और टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग में विश्व के शीर्ष 1,000 विश्वविद्यालयों में भारत के क्रमशः 24 और 42 विश्वविद्यालयों ने अपना मुकाम बनाया है.
हाल ही में जारी क्यूएस रैंकिंग 2019 में हमारे तीन उच्च शिक्षा संस्थानों को दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में जगह मिली है.
मगर मायूस होने की बजाए इससे जुड़े जिम्मेदार लोगों को एक ऐसा प्रतिस्पर्धी माहौल बनाने के सामूहिक लक्ष्य के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए जो हिंदुस्तानी विश्वविद्यालयों को शीर्ष 100 में दाखिल होने और आखिरकार शीर्ष 20 में अपना मुकाम बनाने के लिए प्रेरित कर सके. देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों का इंडिया टुडे ग्रुप-एमडीआरए सर्वे इसी दिशा में एक कदम है.
अपने पांचवें साल में इस सर्वे ने न केवल अपने फलक का विस्तार किया है, बल्कि छानबीन की ज्यादा मजबूत प्रक्रिया भी अपनाई है (देखें सर्वे का तरीका). बराबरी का मैदान बनाने की गरज से विश्वविद्यालयों को चार श्रेणियों—सामान्य, टेक्निकल, मेडिकल और लॉ—में बांटा गया.
बहुत-से विषयों में पाठ्यक्रमों की पेशकश करने वाले विश्वविद्यालयों पर सामान्य श्रेणी के तहत विचार किया गया. केवल पोस्ट-ग्रेजुएट कोर्स की पेशकश करने वाले विश्वविद्यालयों का रैंकिंग के लिए मूल्यांकन किया गया.
विश्वविद्यालयों के प्रदर्शन की जांच-पड़ताल में जो कड़ाई बरती गई, उसने विश्वविद्यालयों की इंडिया टुडे रैंकिंग को देश का सबसे भरोसेमंद तथा सबसे व्यापक और संपूर्ण सर्वे बना दिया है. केंद्रीय एचआरडी मंत्री प्रकाश जावडेकर कहते हैं, ''इंडिया टुडे सर्वे ने इसलिए नाम कमाया है क्योंकि यह विश्वसनीयता, पारदर्शिता के साथ और निश्चित कसौटियों पर किया जाता है.''
इस साल हमने शीर्ष विश्वविद्यालयों के कुछ यशस्वी पूर्व छात्रों को भी आमंत्रित किया कि वे अपनी मातृ संस्था और इन वर्षों में उसमें आए बदलावों के बारे में लिखें. उन्होंने यह चिंता जाहिर की कि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है और इसकी मुख्य वजह विश्वविद्यालयों में सियासी आधार पर नियुक्तियां होना और जाति तथा क्षेत्र आधारित चयन प्रक्रियाएं हैं.
नतीजा यह है कि विश्वविद्यालय पढ़ाई-लिखाई में उत्कृष्टता के बूते नहीं बल्कि गलत वजहों से सुर्खियों में आते हैं.
मगर खराब नियुक्तियों से भी ज्यादा चिंता की बात शिक्षकों की कमी है. इस साल जनवरी में देश के बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय ने शिक्षकों की 48 फीसदी कमी होने की इत्तिला दी—1,706 स्वीकृत पदों में से 805 खाली पड़े थे.
उसके बाद विश्वविद्यालय ने तकरीबन 150 शिक्षक नियुक्त किए हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय कोई अलग-थलग मिसाल नहीं है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 33 फीसदी पद भरे नहीं गए हैं. 2009 के बाद स्थापित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 49 फीसदी पद खाली पड़े हैं.
राज्य और निजी विश्वविद्यालयों में भी यही हालत है. इस कमी से उबरने के लिए विश्वविद्यालयों ने तदर्थ या अस्थायी शिक्षकों की सेवाएं लेने का रास्ता अख्तियार किया है. सरकारी विश्वविद्यालय ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि राज्य सरकारें नियुक्तियों को मंजूरी देने की गुजारिशों को बार-बार नजरअंदाज कर देती हैं, जबकि निजी विश्वविद्यालयों ने इसे खर्च बचाने की रणनीति के तौर पर अपनाया है, तदर्थ शिक्षकों को कम तनख्वाह जो देनी पड़ती है. इसने शिक्षा की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया है.
एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज के महासचिव फुरकान कमर ने अपने एक हालिया लेख में भारतीय और अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात का दिलचस्प विश्लेषण किया. वैश्विक रैंकिंग्स में शीर्ष स्थान पाने वालों में प्रत्येक विश्वविद्यालय औसतन 18,000 छात्रों को दाखिला देते हैं.
इसकी तुलना में भारत के शीर्ष विश्वविद्यालय औसतन 11,000 छात्रों का नामांकन करते हैं. वैश्विक स्तर पर शीर्ष विश्वविद्यालय 1,800 योग्य शिक्षकों की औसत तादाद होने का दावा करते हैं, जबकि भारत के शीर्ष विश्वविद्यालयों में यह आंकड़ा 600 से भी कम है.
भारत के विश्वविद्यालयों के दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में नहीं होने की एक बड़ी वजह शोध और नवाचार में खराब प्रदर्शन भी है. आर्थिक सर्वे 2018 बताता है कि किस तरह शोध और विकास में भारत का खर्च बीते दो दशकों से जीडीपी के 0.6-0.7 फीसदी पर ठहरा हुआ है. इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों में बुनियादी अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाओं और आर्थिक सहायता की शुरुआत की है (पढ़ें: प्रकाश जावडेकर का इंटरव्यू).
जाने-माने अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने हाल ही में कहा कि सभी विश्वविद्यालयों को एक ही चश्मे से देखना मुनासिब नहीं है और सरकार को उनमें से कुछ को चुनकर वैश्विक प्रतिष्ठा की शोध संस्थाओं के रूप में विकसित करना चाहिए. उन्होंने कहा, ''आप 700 शीर्ष स्तरीय विश्वविद्यालयों के साथ देश को नहीं चला सकते.
आपको तैयार होना होगा कि उनमें से 680 विश्वविद्यालय पढ़ाई की अच्छी और ठोस शिक्षा देने वाली दुकानें होंगी. बाकी 20 अनुसंधान विश्वविद्यालय होंगे. लोग वहां अत्याधुनिक अनुसंधान करेंगे, आप उन्हें जगह, शोध के लिए रकम और सहारा देंगे. मैं समझता हूं, भारत तभी परवान चढ़ेगा.''
केंद्र जल्दी ही उन 20 उत्कृष्ट संस्थाओं की सूची का ऐलान करेगा जिन्हें इस मकसद से चुना गया है. इससे बसु के सुझाव के
एक हिस्से पर तो अमल हो जाएगा. अगला कदम यह होगा कि बाकी विश्वविद्यालयों
को कम से कम विश्वस्तरीय 'शिक्षा की दुकानें' तो बनाएं.
ऐसे की गई विश्वविद्यालयों की रैंकिंग
नई दिल्ली स्थित रिसर्च एजेंसी मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स (एमडीआरए) ने नवंबर 2017 और मई 2018 के बीच इंडिया टुडे ग्रुप का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय सर्वे 2018 किया. सर्वे में चार स्ट्रीम—सामान्य, टेक्निकल, मेडिकल और लॉ—के 100 से ज्यादा विश्वविद्यालयों को शामिल किया गया. सिर्फ उन्हीं विश्वविद्यालयों पर विचार किया गया जहां फुलटाइम क्लासरूम पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं और 2017-18 के अकादमिक साल तक जहां से कम से कम तीन बैच उत्तीर्ण होकर निकल चुके हैं. उन्हें उनके पोस्ट-ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों के आधार पर रैंक दी गई.
वस्तुनिष्ठ रैंकिंग के लिए एमडीआरए ने विश्वविद्यालयों की सबसे समग्र और संतुलित तुलना के लिए सावधानीपूर्वक 120 से ज्यादा खूबियों का चयन किया. कामकाज के इन संकेतकों को मिलाकर पांच व्यापक मानदंड बनाए गए—प्रतिष्ठा और गवर्नेंस, अकादेमिक और शोध उत्कृष्टता, इन्फ्रास्ट्रक्चर और माहौल, व्यक्तित्व और नेतृत्व का विकास और करियर की तरक्की और प्लेसमेंट. विश्वविद्यालयों द्वारा दिए गए इस साल के डेटा पर आधार पर मूल्यांकन किया गया.
रैंकिंग नीचे लिखे चरणों में की गई
1. सभी मानदंड पूरा करने वाले 700 से ज्यादा विश्वविद्यालयों को शॉर्टलिस्ट किया गया
2. विश्वविद्यालयों की श्रेणियों से जुड़े मानदंड और उप-मानदंड तय करने के लिए संबंधित क्षेत्रों के तजुर्बेकार विशेषज्ञों से सलाह ली गई. सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की पहचान के लिए अत्यंत अहम संकेतकों को सतर्कता के साथ तय किया गया और उनका सापेक्ष वजन निर्धारित किया गया
3. विश्वविद्यालय की हरेक श्रेणी के लिए विस्तृत और वस्तुनिष्ठ प्रश्नावली बनाई गई और उसे सभी पात्र विश्वविद्यालयों को भेजा गया. 100 से ज्यादा विश्वविद्यालयों ने तय समय सीमा में अपनी जानकारियां और डेटा तथा उनकी तस्दीक के लिए भारी तादाद में दस्तावेज मुहैया करवाए.
4. विश्वविद्यालयों से वस्तुनिष्ठ डेटा मिलने के बाद उनके द्वारा दी गई जानकारियों को मौजूद सूचनाओं और तस्दीक (सहयोगी दस्तावेजों की छानबीन, पिछले समय का डेटा, अनिवार्य खुलासे, टेलीफोन से पूछ-ताछ, ई-मेल से तस्दीक और वेबसाइटों पर जाना वगैरह) के जरिए दोबारा जांच की गई. नाकाफी/गलत जानकारी की स्थिति में संबंधित विश्वविद्यालयों से पूरी, सही और ताजातरीन जानकारी देने के लिए कहा गया.
5. कई मामलों में भौतिक पड़ताल (सत्यापन) की गई ताकि विश्वविद्यालयों के वस्तुनिष्ठ डेटा की तस्दीक की जा सके. जहां जरूरी हुआ, वहां सुधार किए गए.
6. धारणात्मक सर्वे 23 शहरों में फैले 318 जानकार उत्तरदाताओं (23 वी-सी/प्रो-वी-सी, 96 डायरेक्टर/डीन/रजिस्ट्रार, 199 सीनियर फैकल्टी/एचओडी) के बीच किया गया.
उत्तरः दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुडग़ांव, फरीदाबाद, मेरठ, देहरादून, लखनऊ, जोधपुर, जयपुर और लुधियाना
पश्चिमः मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, इंदौर
दक्षिणरू चेन्नै, बेंगलूरू, हैदराबाद और कोयंबतूर
पूर्वः कोलकाता, भुवनेश्वर, गुवाहाटी और पटना
इन विशेषज्ञों से उनके अनुभव के संबंधित क्षेत्र में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय रैंकिंग ली गईं और उन्हें क्रमशः 75 फीसदी और 25 फीसदी वेटेज या वजन दिया गया. उन्होंने पांचों अहम मानदंडों में से हरेक पर भी विश्वविद्यालयों को 10 के रेटिंग पैमाने पर आंका.
7. वस्तुनिष्ठ अंकों की गणना के वक्त पक्का किया गया कि सिर्फ डेटा के जोड़ का इस्तेमाल न हो. डेटा को छात्रों की संख्या के आधार पर एकसार किया गया. वस्तुनिष्ठ और धारणात्मक सर्वे से निकले अंकों को 50-50 के अनुपात में जोड़कर कुल संयुक्त अंक निकाले गए. इस रिसर्च में कई जानकार शामिल थे...


