सर्वश्रेष्ठ यूनिवर्सिटीः बड़े मुकाम की ओर
एनएलएसआइयू-बेंगलूरू के पोस्ट-ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में एक वर्षीय एलएलएम कोर्स, एक वर्षीय एमफिल, पीएचडी, चार वर्षीय एलएलडी रिसर्च डिग्री, दो साल मास्टर इन पब्लिक पॉलिसी और डिस्टेंस एजुकेशन इन मास्टर ऑफ बिजनेस लॉ हैं.

हर उस व्यक्ति ने जिसने हाल के दिनों में नेशनल लॉ स्कूल (एनएलएस) से पढ़ाई की होगी, उसे अपने पहले साल में एक चकरा देने वाले सवाल का सामना करना पड़ा होगा—''इतिहास क्या है?''
स्कूल से सीधे निकलकर आने वाले छात्रों के लिए जहां उत्कृष्टता से तात्पर्य अक्सर बस अपने पाठ्यक्रम को बढिय़ा से सीख जाना भर होता है, इस सवाल ने मुझे भौचक कर दिया था.
इसने मुझे डरा दिया था, खासतौर से तब जब इतिहास की प्रोफेसर वी.एस. एलिजाबेथ ने सबके बीच से यह प्रश्न मुझसे ही पूछ लिया. मैंने कई तथ्यों को जोड़कर मिला-जुला जवाब देने की कोशिश तो की पर नाकाम रहा.
फिर यह सोचने लगा कि कहीं एनएलएस में दाखिला लेकर मैंने कोई गलती तो नहीं कर दी है. लेकिन यह बात पंद्रह साल बाद भी, आज मुझे भली-भांति याद है क्योंकि यह वाकया एनएलएस के जीवन को प्रतिबिंबित करता है—बुनियादी मान्यताओं पर सवाल खड़े करना, छात्रों को मौलिक सोच विकसित करने के लिए प्रेरित करना, वे चाहे जिस पृष्ठभूमि से आए हों उसे भुलाकर स्पष्टवादिता की एक ऐसी संस्कृति को पनपने का मौका देना जिसमें सबके विचारों को भरपूर सम्मान मिलता हो.
एनएलसी को महान बनाने का श्रेय, संस्थान में सवाल पूछने और एक दूसरे का सम्मान करने की संस्कृति को जाता है. इसे छात्रों की संस्था का समर्थन प्राप्त है और कोई भी व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 19(1)(ए) के द्वारा कॉलेज के बोर्ड पर अपने विचार खुलकर रख सकता है.
प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में मैं अपने सीनियर्स के साथ किसी भी विषय पर खुलकर असहमति जता सकता था, बशर्ते इसके पीछे उचित कारण और सही तर्क हों. जूनियर्स के मार्गदर्शन को सीनियर हमेशा तैयार रहते थे.
असल में एक सीनियर, जो कि अब मेरे अजीज मित्र और एक बड़े लॉ फर्म में साझीदार हैं, ने एनएलएस में मेरे प्रवेश के तीसरे ही दिन मेरे सामने अपना दिल खोलकर रख दिया था. उन्होंने लॉ स्कूलों में ग्रेड्स (केवल मूट्स नहीं) की अहमियत समझाई और इस पर अफसोस जाहिर किया कि उन्होंने कॉलेज के पहले वर्ष की पढ़ाई में पर्याप्त गंभीरता नहीं बरती.
यहां की सबसे अनूठी बात है—चाहे किसी छात्र ने अच्छे ग्रेड हासिल किए हों या न हों—यहां आपको जिंदगी की असल शिक्षा मिल जाती है जो जिंदगी में अच्छा मुकाम हासिल करने में हमेशा काम आती है.
यह यहां के शानदार प्रोफेसरों की बदौलत संभव हो सका है जिनका अपने विषय के प्रति हद से ज्यादा जुनून है. एनएलएस में मैंने जितने भी कोर्स लिए, उसके बारे में मेरा विचार है कि चाहे वह मुस्लिम पर्सनल लॉ में विरासत से जुड़े अजीबोगरीब नियम हों या फिर संविधान के अनुच्छेद 14 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्यस्थता और समानता के बीच का अजीब घालमेल, यहां कानून का अध्ययन राजनीति और सत्ता का अध्ययन था.
कानून, जैसा मैंने एनएलएस में सीखा, राज्य की शक्ति का एक वैध साधन है जो अक्सर बहुसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए डिजाइन किया गया है.
यदि कानून व्यवस्था और समानता स्थापित करने के लिए होते हैं, तो समय-समय पर उसे अनुचित, अन्यायपूर्ण और भेदभाव से भरा होने की वजह से चुनौती भी देनी होगी. यहां कानून सिखाना और उसी पर उंगली उठाना भी, दोनों की पढ़ाई साथ-साथ चलती थी.
यह जानकार खुश हूं कि एनएलएस एक बार फिर से नेशनल रैंकिंग में अव्वल आया है. जैसा कि मैंने पहले भी संस्थान के सिद्धांतों का जिक्र किया और जो इसे शीर्ष पर पहुंचाते हैं, उसी का अनुसरण करते हुए मुझे इस उपलब्धि पर स्वस्थ संदेह करने की जरूरत भी महसूस होती है.
यह सिर्फ एनएलएस ही नहीं बल्कि देश के लिए भी चिंता की बात है कि एनएलएस भारत का सर्वश्रेष्ठ लॉ स्कूल होने के बावजूद, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लॉ कॉलेजों के आसपास भी कहीं नहीं फटकता.
इसके जर्नल्स अच्छे तो हैं पर शानदार नहीं. इसके फैकल्टी द्वारा होने वाले प्रकाशन सीमित हैं और छात्र नए आयामों को हासिल करने की जगह कॉर्पोरेट जगत में ऊंचे वेतन वाली नौकरियों के पीछे ही भागते हैं. समय आ गया है कि एनएलएस अब सिर्फ भारत के सर्वोच्च लॉ स्कूल पर इतराना छोड़, दुनिया के चोटी के पांच कॉलेजों में अपना स्थान बनाने की दिशा में प्रयास करे.
एनएलएस से निकलने के बाद युनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड, जो कि असल में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक है, में पांच साल बिताने के बाद मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि एनएलएस इस लक्ष्य को हासिल कर सकता है.
इसके लिए एनएलएस को कुछ बुनियादी बदलावों के लिए तैयार होना पड़ेगा. पहली बात, सरकार को एनएलएस को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित करना चाहिए. देश के अग्रणी लॉ कॉलेज में अनुसंधान को लेकर उत्कृष्टता बढ़ाने की छटपटाहट होनी चाहिए न कि राज्य और क्षेत्रीय कोटा जैसी ओछी राजनीति में उलझकर रह जाना चाहिए.
दूसरी बात, इसे कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (सीएलएटी) से बाहर आना चाहिए. सीएलएटी छात्रों के लिए परीक्षाओं की संख्या में कटौती करने में अच्छी भूमिका निभाता है, पर उसे दुनिया की सर्वोत्तम प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए संक्षिप्त, सावधानी के साथ तैयार और तर्क-आधारित परीक्षण प्रक्रिया की ओर बढऩा चाहिए.
तीसरी बात, कोई भी संस्थान अपने पूर्व छात्रों को फैकल्टी के रूप में वापस कॉलेज की ओर आकर्षित किए बिना उत्कृष्टता हासिल नहीं कर सका है. इस दिशा में एनएलएस का रिकॉर्ड मिला-जुला है. हालांकि कई पूर्व छात्र एनएलएस में पढ़ाते रहे हैं फिर भी यह संख्या और अधिक हो सकती थी.
दुनिया का हर महान लॉ स्कूल अपने उन छात्रों की बदौलत महान बना है जो आगे चलकर अपने कॉलेज के ही प्रोफेसर बने. इस दिशा में एनएलएस को भी गौर करना होगा.
चौथी बात, विश्व के सर्वश्रेष्ठ लॉ कॉलेजों में जगह बनाने के लिए उच्च-गुणवत्ता वाले जर्नल निरंतर प्रकाशित करने की जरूरत है. न केवल दुनियाभर से अच्छे फैकल्टीज को आकर्षित करने की जरूरत है, बल्कि उन्हें केवल पढ़ाने या फिर परीक्षा और प्रोजेक्ट को जांचने के काम में लगाए रखने की जगह उन्हें लिखने-पढ़ने के भी पर्याप्त अवसर दिए जाने चाहिए तभी अच्छे जर्नल और गुणवत्ता वाले लेख प्रकाशित हो सकेंगे. छात्र संस्था का आकार दुरुस्त किया जाना चाहिए और उत्कृष्ट फैकल्टी-स्टुडेंट अनुपात बहुत जरूरी है.
नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया रिव्यू के पूर्व संपादक के रूप में, मुझे पता है कि उच्च गुणवत्ता वाली कानून समीक्षाएं के प्रकाशित करने की हमारे पास जबरदस्त क्षमता मौजूद है. भारत में कानूनी पेशे की प्रकृति ऐसी है कि चंद उल्लेखनीय अपवादों को छोड़ दें तो, अकादमिक प्रकाशनों में शायद ही कभी वास्तविक जगत का प्रभाव झलकता है.
एनएलएस को इस स्थिति को बदलने के प्रयासों की अगुआई करनी होगी. उसे न केवल उच्च-गुणवत्ता वाली कानून समीक्षाएं प्रकाशित करनी होंगी बल्कि जनहित याचिकाएं दायर करके अदालतों के हस्तक्षेप से अपने शोध के परिणामों को वास्तविक दुनिया में स्थापित कराने की भी कोशिश करनी होगी.
एनएलएस में पढ़ाई के दौरान हम यह सुनने के आदी हो गए थे कि यह स्कूल खुद को 'हार्वर्ड ऑफ द ईस्ट' मानता था. प्रोफेसर माधव मेनन ने वकीलों के रूप में सोशल इंजीनियर्स तैयार करने के विजन के साथ एनएलएस की नींव रखी थी.
यह एक मौलिक विचार था क्योंकि भारत को अपने वकीलों और कानूनविदों की जरूरत थी न कि अमेरिकी संविधान के प्रति समर्पित नकलचियों की.
समय आ गया है कि हम प्रोफेसर मेनन के उसी मौलिक विचार की ओर लौटने के लिए प्रयास करें और 21वीं सदी के नजरिए से इसे वास्तविक बनाने की कोशिश करें. यह तभी संभव होगा जब हमारा दृष्टिकोण, एनएलएस के हमारे मूलमंत्र-'वेयर नॉलेज इज फ्री' पर आधारित और मौलिक होगा.
फ्री नॉलेज न केवल नेशनल लॉ कॉलेज को पूर्व का हॉर्वर्ड बनाने में सफल होगा बल्कि यह भारत का गौरव बढ़ाएगा और तीसरी दुनिया के देशों के विश्वविद्यालयों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में उभरेगा.
लेखक नेशनल लॉ स्कूल (एनएलएस) के पूर्व छात्र और विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के शोध निदेशक हैं.
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