...तो क्या अब एलजी और आप के बीच सबकुछ ठीक है ?
अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम अपनी पहचान बन चुकी धरने की राजनीति से मोहलत लेकर काम पर लौटी, लेकिन उपराज्यपाल और केंद्र के साथ रंजिशों का कड़ाहा अब भी खौल रहा.

अब जब आम आदमी पार्टी (आप) और जाहिरा तौर पर उनके लिए काम करने वाले अफसरशाहों के बीच सुलह हो चुकी है, तो क्या दिल्ली में कामकाज रोजमर्रा के ढर्रे पर लौट आएगा? क्या चुनी हुई सरकार और उपराज्यपाल (एलजी) अनिल बैजल—आप की नजर में केंद्र सरकार की कठपुतली—के बीच खदबदाती रंजिशें फिर शुरू हो जाएंगी?
वे खौफनाक नौ दिन थे. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को एलजी के निवास के बाहरी प्रतीक्षाकक्ष में सोफे पर पसरे हुए देखना. उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को भूख हड़ताल पर जाते देखना. जब दोनों लोगों को आनन-फानन अस्पताल ले जाया गया तो आलोचकों ने नथुने फुलाते हुए कहा, बेहद नाटकीय पैंतरा.
ममता बनर्जी से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक और पिनाराई विजयन से लेकर सीताराम येचुरी, अखिलेश यादव और सियासी नौसिखुए कमल हासन तक विभिन्न नेताओं को केजरीवाल के समर्थन में बोलते देखना और उन्हें ऐसे वक्त में मौजूं और प्रासंगिक बना देना, जब वे एक चलता-फिरता मजाक बनने के खतरे से घिरे थे—डेढ़ पसली का जवान पहलवान को हमेशा चुनौती देता रहा है.
आप ने इन नौ दिनों से विजेता बनकर निकलने का दावा किया. स्तंभकार और सामाजिक टिप्पणीकार संतोष देसाई इस धरने को ‘जोखिम भरा मगर रणनीतिक तौर पर ठोस कदम’ कहते हैं. उनकी दलील है कि जो रोज-ब-रोज ‘घिसाई का शीत युद्ध’ था, वह ‘सरगर्म लड़ाई’ में तब्दील हो गया.
दूसरे लफ्जों में आप ने फोड़े में भाला घोंप दिया. आप की सीनियर कार्यकर्ता और दिल्ली के स्कूलों की हालत सुधारने में चौतरफा तारीफ पाने वाली आतिशी मार्लेना के मुताबिक यह तथाकथित धरना इसलिए ‘अहम’ था क्योंकि इसके जरिए यह सामने लाया गया कि ‘‘एलजी के दफ्तर का केंद्र के हाथों किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा था.’’
वे मानती हैं कि दिल्ली के मतदाताओं का एक खास बड़ा हिस्सा इस बात को समझता है कि ‘‘आप सरकार के काम में रुकावटें डाली जा रही हैं और हालांकि हम असरदार हैं, पर अगर हम इन रुकावटों से मुक्त होते तो कई गुना ज्यादा असरदार हो सकते थे.’’
इस बात को साबित कर पाना बेशक नामुमकिन है. तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला दीक्षित सरीखे कुछ लोग इस बात को हंसी में उड़ा देते हैं. उन्होंने रिपोर्टरों से कहा कि उनकी सरकार ने भी दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग की थी, पर उन्होंने सियासी रक्षाकवच के तौर पर इसका इस्तेमाल नहीं किया.
वे बोलीं, ‘‘हमने इसे विकास का अपना काम नहीं कर पाने का बहाना नहीं बनाया.’’ उनका कहना था कि 1998 में जब वे मुख्यमंत्री थीं, तब भी भाजपा केंद्र की सत्ता में थी और तब गैरजरूरी टकराव के बगैर वे अपने लक्ष्य हासिल कर पाई थीं. केजरीवाल ने इस आरोप का जवाब दिया, हालांकि घुमा-फिराकर. उन्होंने दावा किया कि उन्हें दीक्षित सरीखी ताकत हासिल नहीं है.
प्रधानमंत्री को संबोधित एक चिट्ठी में केजरीवाल ने दावा किया कि अगर मोदी ने ‘2015 के एक आदेश के जरिए’ दिल्ली की पिछली सरकारों को हासिल अधिकार आप सरकार से ‘छीन’ न लिए होते, तो ‘‘हम आइएएस अफसरों की हड़ताल की शिकायत लेकर आपके पास नहीं आते. हम खुद ही उसका रास्ता निकाल लेते. आज सारे अधिकार आपके पास हैं और सारी जिम्मेदारियां हमारे ऊपर हैं. ऐसे कैसे काम चलेगा?’’
यह टेढ़ा सवाल है. क्योंकि जैसा कि हड़तालें—चाहे वे अफसरशाहों की हों या दिल्ली सरकार की—दिखा चुकी हैं कि हड़तालें काम नहीं आतीं. दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन ने भी आप की ‘गैरसंजीदा धरना सियासत’ की खासी तीखी आलोचना की है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ट्वीट में इस धरने को ‘अराजकता’ करार दिया. उन्होंने लिखा, ‘‘एक तरफ यह नाटक चल रहा है और इसका शिकार दिल्ली की जनता हो रही है.’’ कांग्रेस मुश्किल हालात में घिर गई है—दिल्ली में आप की विरोधी होने के नाते वह उसके धरने का समर्थन नहीं कर सकती थी, पर उसने इस संभावना के दरवाजे भी खोल दिए कि कांग्रेस के बगैर विपक्षी एकता मुमकिन है और यह मानकर नहीं चला जा सकता कि मोदी और भाजपा के खिलाफ संयुक्त विपक्ष की अगुआई कांग्रेस ही करेगी.
मार्लेना कहती हैं, कांग्रेस ने दिखा दिया कि उसके तुच्छ सियासी तकाजे और दूसरों से बेहतर दिखने की चालाकी सिद्धांतों पर हावी है. वे बताती हैं कि पुदुच्चेरी में कांग्रेस की सरकार का अडंग़े डालने वाली और तुच्छ सियासत करने वाली उपराज्यपाल के खिलाफ लगातार शिकायतें करना कांग्रेस के ढोंग और पाखंड की मिसाल है.
मार्लेना कहती हैं, ‘‘दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा की तरह काम करती हैं. यह खालिस सियासी अवसरवाद है.’’ देसाई भी कहते हैं कि कांग्रेस में अब ‘‘बारीक पेचीदा फर्कों को साफ-साफ बयान करने की कुव्वत नहीं रह गई है.’’ आप के पूर्व दिग्गज और अब नई सियासी पार्टी स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव आप की नाकामियों और ‘राजकाज के व्याकरण और यहां तक कि संवैधानिक प्रावधानों की जानकारी’ के उसके अभाव की तीखी आलोचना करते हैं.
मगर यादव भी यह तो स्वीकार करते हैं कि एलजी द्वेष की भावना से काम करते दिखाई देते हैं. अपना नाम उजागर करने के अनिच्छुक आप के एक भीतरी शख्स के मुताबिक, ‘‘एलजी का गुरूर—यहां तक कि अब टकराव खत्म होने के बाद भी—मुख्यमंत्री के साथ मुलाकात करने से उनके इनकार से साफ जाहिर होती है.
आइएएस अफसर एलजी के इशारे पर चलते हैं और एलजी केंद्र के इशारों पर. यह बैर-भाव अभूतपूर्व है.’’ इसका मतलब है कि मौजूदा टकराव का खत्म होना दरारों पर महज परदा डालना है. दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी कहते हैं, ‘‘कोई नहीं जानता, केजरीवाल धरने पर बैठने का अगला फैसला कब करेंगे. कोई नहीं जानता, अव्वल तो वे धरने पर बैठे ही क्यों थे और उन्होंने क्या हासिल किया.’’
असरदार तरीके से अपना धरना खत्म करके एलजी के घर से केजरीवाल के रुखसत होने के महज कुछ ही घंटे बाद आप के पूर्व मंत्री सोमनाथ भारती ने कहा कि वे और दूसरे विधायकों ने एलजी से मिलने की कोशिश की थी, पर पुलिस ने उन्हें अपनी पहरेदारी में परिसर से बाहर निकाल दिया.
नाराज केजरीवाल ने ट्विटर पर पूछा, ''यह क्या चल रहा है, एलजी विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, मुख्यमंत्री से मिलने से इनकार क्यों कर रहे हैं? क्या एलजी जानते हैं कि उनसे मिलना उनका संवैधानिक कर्तव्य है?
उनके पास मिलने के अलावा कोई चारा नहीं है. यह अजीब है.’’ यही वजह है कि आप राष्ट्रीय राजधानी को राज्य का दर्जा देने के लिए इतना तीखा अभियान चला रही है. पार्टी के एक प्रमुख कार्यकर्ता और प्रवक्ता राघव चड्ढा ने धरने को ‘पहली जीत’ कहा, जिसकी बड़ी जंग अभी होनी है.
11 जून को दिल्ली विधानसभा ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित कर दिया. यह एक प्रतीकात्मक कदम था. अखबार में छपे एक लेख में यादव ने लिखा कि ‘दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे का हक है.’ मार्लेना कहती हैं कि केंद्र सरकार एनडीएमसी (नई दिल्ली म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन) के इलाके, लुटियंस की दिल्ली और डिप्लोमैटिक ऐक्लेव पर अपना पूरा नियंत्रण रख सकती है, पर ‘‘बाकी शहर की 2 करोड़ लोगों की अपनी सरकार होनी चाहिए जो उनके प्रति और केवल उनके प्रति जवाबदेह हो.’’
नवंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट में रखी गई दलीलों में केंद्र के वकीलों ने कहा था कि केंद्र शासित प्रदेशों को पूर्ण राज्य में नहीं बदला जा सकता, उन्हें राष्ट्रपति शासित करते हैं (जो एलजी की नियुक्ति करते हैं) और खासकर दिल्ली में कार्यपालिक अधिकार राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से पूरी तरह दिल्ली सरकार को नहीं सौंपे जा सकते.
मगर दिल्ली में भाजपा बरसों से पूर्ण राज्य की मांग करती रही है. 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी ने राजधानी के लिए एक घोषणापत्र जारी किया था और पूर्ण राज्य की मांग उसमें शामिल थी.
केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन उस वक्त दिल्ली भाजपा अध्यक्ष थे और यह जानना दिलचस्प होगा कि अप्रैल 2014 में उन्होंने कहा था, ‘‘यह चुनाव नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए लड़ा जा रहा है, (और) हम उनसे पहली मांग यह करेंगे कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दें.’’
उस वादे से फरवरी 2015 में दिल्ली के चुनाव से पहले पल्ला झाड़ लिया गया. कांग्रेस और भाजपा दोनों मानती हैं कि दिल्ली के मतदाताओं को लोकतांत्रिक मताधिकार का पूरा फायदा मिलना चाहिए. तो फिर पूर्ण राज्य की आप की मांग को कपोल कल्पना कहकर मजाक क्यों उड़ाया जा रहा है?
देसाई कहते हैं कि दिल्ली के राजकाज का ‘ढांचा ही अनबन के लिए बनाया गया है.’ और कई पर्यवेक्षक मानते हैं कि केंद्र में भाजपा इसी बेढंगे ढांचे का जिस तरह फायदा उठा रही है, उसी के चलते दिल्ली की स्थिति पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो गया है. आप शहर के राजकाज के प्रति अपने समर्पण पर गर्व करती है. वह दावा करती है कि मोदी सरकार की अजीबोगरीब खुन्नस की वजह से उसे अपना काम नहीं करने दिया जा रहा.
मार्लेना कहती हैं कि आप के हाथ-पैर एक बेहूदा व्यवस्था की जंजीरों में जकड़ दिए गए हैं और अपनी बात के समर्थन में सिसोदिया के लिखे एक लेख का हवाला देती हैं. वे शिक्षा नीति पर उन्हीं की मुख्य सलाहकार थीं, जिन्हें तीन साल काम करने के बाद अप्रैल में केंद्र सरकार ने बर्खास्त कर दिया था, इस तरह मानो एक चुनी हुई सरकार को खुद अपने नियुक्त व्यक्तिरयों को रखने का हक नहीं होना चाहिए.
सिसोदिया ने लिखा था, ‘‘चाहे वह आनंद विहार में चैन छिनैती की घटना हो या शालीमार बाग में नन्ही बच्ची के साथ बलात्कार, दिल्ली के लोग जिस अकेले चुने हुए प्रतिनिधि को जवाबदेह ठहरा सकते हैं, वे भारत के गृह मंत्री हैं, जिन्हें इसके साथ जम्मू-कश्मीर, उत्तर पूर्व और मध्य भारत में माओवादी विद्रोह के मुद्दे भी देखने होते हैं.’’
क्या आप बहुत ज्यादा विरोध करती है? यह सवाल दिल्ली के मतदाताओं के लिए है. हालांकि पार्टी बहानेबाजी न कर पाए और उसे अपनी कथनी के मुताबिक अपनी नीतियों पर अमल करने के लिए मजबूर किया जाए, यह पक्का करने का अकेला तरीका शायद यह है कि उनकी इस बात पर विचार किया जाए कि एनडीएमसी के इलाके को छोड़कर बाकी दिल्ली का राजकाज चुनी हुई सरकार के दायरे में हो.
विरोध की जमीन
19 फरवरी, दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश एक टीवी कैंपेन में देरी को लेकर केजरीवाल के सरकारी निवास पर आप के विधायकों पर हमला करने का आरोप लगाते हैं. विरोध में कई सिविल सेवक कामकाज बंद कर देते हैं.
11 जून, केजरीवाल और उनके मंत्रिमंडल के साथी मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और गोपाल राय एलजी अनिल बैजल के सरकारी निवास जाते हैं और जब तक कि बैजल आइएएस अफसरों को उनकी हड़ताल खत्म करने का आदेश नहीं देते, वे वहां से जाने से इनकार कर देते हैं.
13 जून, सिसोदिया भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं, जैन के ऐसा करने के एक दिन बाद. भाजपा के चार विधायक और आप के बागी विधायक कपिल मिश्र केजरीवाल के सरकारी निवास के प्रतीक्षा कक्ष में खुद अपना विरोध शुरू कर देते हैं.
16 जून, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के मुख्यमंत्री एलजी से केजरीवाल से मिलने की इजाजत मांगते हैं, पर उन्हें इनकार कर दिया जाता है. अगले दिन नीति आयोग की बैठक में वे प्रधानमंत्री से टकराव हल करने के लिए कहते हैं.
17 जून, आइएएस अफसर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा करते हैं कि वे हड़ताल पर नहीं थे और वे असुरक्षित महसूस कर रहे थे. वे केजरीवाल से अपनी सुरक्षा की मांग करते हैं.
19 जून, एलजी केजरीवाल को अफसरशाहों से मिलने का निर्देश देते हैं, उधर अफसर मुख्यमंत्री के आश्वासन का अच्छा जवाब देते हैं और आप के मंत्रियों के साथ बैठकों में आना शुरू कर देते हैं. जैन और सिसोदिया, जिन्हें उपवास के दौरान अस्पताल में भर्ती करवाया गया था, काम पर लौट आते हैं. केजरीवाल और राय भी अपना धरना खत्म कर देते हैं.
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