हथियार बनाने की बड़ी चुनौती

मेक इन इंडिया को और रफ्तार देने के लिए सरकार नई डिफेंस प्रोडक्शन पॉलिसी के साथ द्विवार्षिक डिफेंस एक्सपो 2018 में भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता का प्रदर्शन करने जा रही है

पीटीआइ
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रक्षा मंत्रालय थल, नौसेना और देश की आंतरिक सुरक्षा से संबंधित 10वीं द्विवार्षिक डिफेंस एक्स्पो 2018 के जरिए जनता पर जबरदस्त प्रभाव डालने के लिए बेचैन है जो 15 अप्रैल को चेन्नै के पास शुरू हो रहा है.

साउथ ब्लॉक की चर्चाओं की मानें तो प्रदर्शनी स्थल पर भारतीय प्रोटोटाइप होवित्जर की मारक क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए इससे बंगाल की खाड़ी पर फायर कराने की बात हो रही थी. लेकिन, कुछ जानकार लोगों के समझाने पर वह विचार रद्द कर दिया गया.

प्रदर्शनी, परंपरागत रूप से सशस्त्र बलों और उद्योग के लिए हथियारों और उनके निर्माताओं के साथ संपर्क का मंच है जो अब डिफेंस हार्डवेयर देश में बनाने के सरकार के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है. इसका नारा भारत को "उभरते रक्षा और मैन्युफैक्चरिंग केंद्र के तौर पर पेश करता है, जो केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के अधीन मेक इन इंडिया रक्षा नीति को पुनर्जीवित करने के लिए तैयार किया गया है.  

जनवरी में सरकार ने निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से 50 परियोजनाएं पेश करते हुए मेक-II परियोजनाओं की एक सूची जारी की और निजी उद्योगों को खरीद का आश्वासन देते हुए उन्हें बेहतर समाधानों के साथ आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया.

इसका उद्देश्य उद्योग जगत को आशंकाओं को दूर करना है कि सरकार उन उत्पादों को नहीं खरीदती जिनका विकास करने में समय और पैसे खर्च होते हैं. मंत्रालय ने रक्षा निवेशकों के लिए एक संपर्क माध्यम उपलब्ध कराने के मकसद से रक्षा उत्पादन विभाग के तहत एक रक्षा निवेशक प्रकोष्ठ भी बनाया है.

डिफेंस एक्स्पो-2018 इस वर्ष के बजट में प्रस्तावित चेन्नै-बेंगलूरू रक्षा औद्योगिक गलियारे के पास शुरू होने जा रहा है. यह गलियारा चेन्नै के उत्तर में कट्टप्पल्ली को विशाल एलऐंडटी शिपयार्ड, कोयंबटूर के लघु और मध्यम उद्योगों, तमिलनाडु के छह आयुध कारखाने और बेंगलूरू में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड से जोड़ता है. दोनों गलियारों की प्रोजेक्ट रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के लिए रक्षा मंत्रालय की चयन समिति वर्तमान में सलाहकारों के साथ बैठक कर रही है.

23 मार्च को रक्षा मंत्रालय ने प्रतिरक्षा औद्योगिक मैन्युफैक्चरिंग नीति संबंधी एक मसौदा जारी किया, जिसमें स्वदेशी शस्त्र बनाने और भारत की रक्षा आयात पर निर्भरता को कम करने की बात कही गई है जो अभी 70 प्रतिशत से भी अधिक है. उम्मीद है कि इसी साल अधिसूचित की जाने वाली इस नीति से भारत 2025 तक डिफेंस हार्डवेयर में आत्मनिर्भर हो जाएगा.

रक्षा उत्पादन सचिव डॉ. अजय कुमार कहते हैं, "दुनिया के 15 बड़े रक्षा हार्डवेयर उत्पादकों मंद भारत भी है. हम आशा करते हैं कि स्थानीय स्तर पर उत्पादन को बढ़ावा देकर वर्ष 2025 तक भारत शीर्ष पांच देशों में अपनी जगह बना लेगा.''

उन्होंने उदाहरण के लिए मोबाइल फोन के उत्पादन का उल्लेख किया जिसमें चार साल पहले, जहां हमारा देश पूरी तरह आयात-निर्भर था, आज आत्मनिर्भर हो चुका है. इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा, "2014 में हमारा मोबाइल फोन उत्पादन कारोबार 19,000 करोड़ रुपए था जो आज बढ़कर 90,000 करोड़ रुपए हो गया है.''

भारत करीब 1.25 लाख करोड़ रुपए के रक्षा उत्पाद खरीदता है, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माता, आयुध कारखानों और निजी उद्योगों की भागीदारी करीब 40 फीसदी है. बाकी आयात होता है. इसे बदलना बड़ी चुनौती है और 2014 में सत्ता में आई भाजपा सरकार ने चुनावी घोषणापत्र में रक्षा उत्पादन क्षेत्र की आयात निर्भरता के इसी आयाम को मेक इन इंडिया के जरिए पलटने का खाका पेश किया था.

रक्षा उत्पादन नीति के मसौदे में सैन्य-औद्योगिक कॉम्पलेक्स लगाने की ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना की रूपरेखा खींची गई जो अन्य दूसरे क्षेत्रों को प्रभावित करने के साथ करीब 25 अरब डॉलर के कारोबार का आश्वासन दे रहा था जो 20-30 लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराने वाला था.

चार साल बाद भी मेक इन इंडिया उपलब्धि के नाम पर सिफर रहा जिसका प्रमाण है सरकार के नीतिगत प्रयासों के बाद सफलता नहीं मिली. 2016 में सरकार ने भारतीय कंपनियों में विदेशी कंपनियों की हिस्सेदारी सीमा 26 प्रतिशत से ढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दी. सरकार से अनुमति लेने की जरूरत तभी होगी जब किसी विदेशी कंपनी की हिस्सेदारी इस सीमा से अधिक हो.

इस नीतिगत प्रोत्साहन के बावजूद दिसंबर 2017 तक केवल 1.17 करोड़ रुपए की एफडीआइआइ, जबकि इसी अवधि के दौरान अन्य क्षेत्रों में 3.86 लाख करोड़ रु. की एफडीआइ आई. रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया के अंतर्गत एकमात्र बड़ी परियोजना गुजरात के हजीरा में आ रही है. इसके तहत 4,600 करोड़ रुपए से एलऐंडटी कारखाने में स्वचालित होवित्जर 100 के-9 "वज्र'' का निर्माण होना है.

समय काफी निकल चुका है और आज के नाजुक मोड़ पर तीन तरफ  से चिंताएं उभर रही हैं. पहली, चीन-पाकिस्तान की जोड़ी की ओर से पैदा हो रहा खतरा; दूसरी, 1970 और 1980 के दशकों के दौरान खरीदे गए सोवियत काल के लड़ाकू विमानों, टैंकों और पनडुब्बियों की बड़ी संख्या अब पुरानी हो चली है और तीसरी, उन्हें हटाकर नई खेप खरीदने के लिए रक्षा बजट में पर्याप्त राशि नहीं.

सरकार का कार्यकाल और एक हथियार प्रणाली हासिल करने में लगने वाला समय दोनों की अवधि एक बराबर नहीं होती, लिहाजा नेतृत्व संबंधी अनिश्चितता समस्या को और बढ़ा देती है. मौजूदा सरकार के चार साल के कार्यकाल में देश ने चार रक्षा मंत्री देखे और इसके कारण राजनैतिक दूरदर्शिता से महरूम व्यवस्था और बदहाल हो गई.

हथियार खरीद प्रक्रिया काफी धीमी और श्रमसाध्य होती है. सशस्त्र सेनाओं की जरूरतों का मसौदा तैयार करने में ही महीनों लग जाते हैं और फिर हथियारों का परीक्षण, सभी मानदंडों को पूरा करने वाली कंपनी से कीमत पर तोल-मोल और फिर उन्हें खरीदने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर करने में काफी समय लग जाता है.

उपभोक्ता वस्तुओं के उलट जहां थोक में माल बनाकर गोदामों में डाल दिए जाते हैं, रक्षा हार्डवेयर का निर्माण ठेके पर हस्ताक्षर के बाद ही शुरू होता है.

दुनियाभर में किसी भी हथियार प्रणाली को हासिल करने में तीन से पांच साल लग जाता है, जबकि भारत में किसी हथियार को सेना में शामिल करने में 6 से 10 साल लग जाते हैं. के-9 वज्र के लिए दक्षिण कोरियाई कंपनी हनव्हा-टेकविन से हुआ समझौता रक्षा मंत्रालय में चर्चा का विषय बन गया जब खरीद की प्रक्रिया 6 साल में पूरी हुई.

अब तो हस्ताक्षर होने की संभावना पर भी संदेह जहिर किया जा रहा है. कम बजटीय प्रावधान के लिए सरकार पर बरसते हुए संसद में रक्षा मामलों की स्थायी समिति ने बीती 13 मार्च को कहा कि रक्षा बजट में 21,388 करोड़ रु. नए हथियार खरीदने के लिए रखे गए जो कि 29,033 करोड़ रु. की 125 मौजूदा योजनाओं के भुगतान के लिए अपर्याप्त है. जाहिर है प्रतिरक्षा आधुनिकीकरण की चुनौतियां बहु आयामी हैं.

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