तकनीक बदलेगी तकदीर
बीटी कॉटन से कीटनाशकों के प्रयोग में कमी आई, पर नीतिगत सुस्ती से यह कामयाबी दूसरे फसलों में दोहराई नहीं जा सकी

भारत में सालाना करीब 65 करोड़ लोग कृषि के जरिए ही अपनी आजीविका का प्रबंध करते हैं. हरित, श्वेत, पीत और नीली क्रांतियों ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता दी, फिर भी आज दुनिया के एक-चौथाई भूखे और दरिद्र लोग भारत में ही हैं.
कृषक-गैर कृषक की आय के अंतर का अनुपात आज 1:4 का हो चुका है. औसत कृषि उत्पादन और कुल कारक उत्पादकता (टोटल फैक्टर प्रोडक्टिविटी) की वृद्धि दर काफी कम है. भूमि, जल, जैव-विविधता और अन्य प्राकृतिक संसाधनों में गिरावट आई है जबकि 2050 तक भारत की आबादी 1.6 अरब हो जाएगी और इससे जलवायु परिवर्तन तथा बाजार की अस्थिरता का संकट गहराएगा.
राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक विश्लेषणों से पता चलता है कि कृषि-आधारित या कृषि के व्यापक प्रभाव वाले भारत जैसे देशों के लिए भूख और दरिद्रता को खत्म करने में कृषि की उन्नति, किसी अन्य क्षेत्र की विकास से आने वाले परिणाम के मुकाबले तीन गुना अधिक असरदार होगी.
देश के भीषण कृषि संकट को देखते हुए भारतीय कृषि में बदलाव की जरूरत है. इसे चिरस्थायी, समग्र और लोचदार बनाना होगा ताकि थोड़े संसाधनों में अधिक से अधिक लोगों के लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन किया जा सके.
बीटी कॉटन, जीन क्रांति की देन है. यह 70 लाख छोटे कपास उत्पादकों के लिए कृषि में आधुनिक तकनीक के प्रयोग की सफलता का सुंदर उदाहरण है. इससे कपास की खेती में कीटनाशकों के प्रयोग में सात गुना कमी आई वहीं कपास का उत्पादन तीन गुना बढ़ा है.
लेकिन नीति और उसके कार्यान्वयन की सुस्ती के कारण अन्य फसलों में ऐसे लाभ नहीं लिए जा सके. सिंचाई परियोजनाओं में सरकारी खजाने से भारी-भरकम रकम खर्च होती है जबकि इसकी कार्यदक्षता का स्तर मात्र 38 से 40 प्रतिशत ही है.
दूसरी तरफ, ड्रिप और स्प्रिंक्लर सिंचाई तकनीक में पानी की दक्षता का स्तर 60 से 90 प्रतिशत तक का होता है. पानी के प्रयोग की दक्षता को बढ़ाने से पोषकों के प्रयोग की दक्षता भी बढ़ जाती है. मसलन, बूंद सिंचाई में यदि पानी में घोलकर उर्वरकों का प्रयोग किया जाए तो इससे उर्वरकों की कम से कम 40 प्रतिशत बचत होती है.
यूरिया सुपर ग्रेन्युल्स (यूएसजी), लीफ कलर चार्ट (एलसीसी), ग्रीन सीकर का प्रयोग करने वाले सेंसर, कुछ ऐसी नई खोज हैं जिनसे पोषक की उपयोग दक्षता को बढ़ाया जा सकता है. उर्वरक की उपयोग दक्षता को अधिकतम करने के लिए फसल एवं क्षेत्र आधारित विशेष उर्वरकों का निर्माण करना होगा.
खासकर बोरॉन, तांबा, मैंगनीज और मॉलिब्डेनम जैसे खनिज पोषकों का प्रयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए क्योंकि इन खनिजों की कमी और विषाक्त सीमा के बीच अंतर बड़ा सूक्ष्म अंतर होता है. इसके अलावा, समय आ गया है कि भारतीय कृषि में नैनो-तकनीक, रोबोटिक्स, रिमोट सेंसिंग का व्यापक इस्तेमाल हो.
आज, विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में, एक सक्षम वातावरण मौजूद है क्योंकि भारत सरकार कृषि में आधुनिक तकनीक के लाभों का फायदा उठाने के लिए उत्सुक है.
डिजिटल इंडिया कार्यक्रम में मोबाइल आधारित एप्लीकेशन को विकसित करने की अपार संभावना है, उद्यमशीलता और युवाओं की योग्यता बढ़ाने पर विशेष बल, मृदा स्वास्थ्य कार्ड के द्वारा वृहत मृदा आंकड़े संग्रहण, जल उत्पादकता संवर्धन, रासायनिक खादों के प्रयोग में कटौती, अनुबंध खेती को प्रोत्साहन, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम से कम करना- ये सब मिलकर किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करने की राह प्रशस्त करेंगे.
लेखक केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इंफाल के कुलपति हैं और पद्म भूषण से सम्मानित हैं
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