नए उपायों से मुनाफे की खेती
कृषि क्षेत्र को संकट से उबारने और किसानों की झोली में अतिरिक्त आमदनी डालने के लिए केंद्र के प्रश्रय से राज्यों ने शुरू की कई नवोन्मेषी योजनाएं

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने आखिरी पूर्ण बजट भाषण में सबसे पहले कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का जिक्र करके स्पष्ट कर दिया कि नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यही प्राथमिकता का क्षेत्र है. बजट में इस क्षेत्र की विभिन्न मौजूदा और भावी परियोजनाओं के लिए 14.34 लाख करोड़ रु. तय किए गए हैं.
दूसरी ओर राज्यों के लिए भी यह क्षेत्र बेहद अहम है. खासकर हिंदीभाषी राज्यों की सरकारें कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रही हैं. कॉर्पोरेट क्षेत्र किसानों के सपनों को पूरा करने के लिए अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और नवाचार का सहारा ले रहा है.
यही नहीं, विभिन्न राज्यों में निजी स्तर पर भी लोग खेती खासकर बागवानी, डेयरी और मछलीपालन के क्षेत्र में नई विधियों और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके कामयाबी की नजीर पेश कर रहे हैं. ऐसे में इंडिया टुडे ने कृषि के आधुनिकीकरण के लिए विभिन्न स्तरों पर किए जा रहे प्रयासों का विस्तृत जायजा लिया.
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से करीब तीस किलोमीटर उत्तर तुलसीपुर ब्लॉक के पंडितपुरवा गांव के करीब 50 साल के किसान सिद्धार्थ के पास महज पांच बीघा खेत है. दस बीघे खेत बंटाई पर लेते हैं. इस तरह 15 बीघे की खेती करते हैं.
सिद्धार्थ खेती के अच्छे जानकार हैं लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से खेती में उन नए उपकरणों का इस्तेमाल नहीं कर पाते, जिससे लागत भी कम होती है और समय भी बचता है. सिद्धार्थ ऐसे अकेले किसान नहीं हैं जो आधुनिक खेती तो करना चाहते हैं पर उनके पास संसाधन नहीं हैं.
कृषि क्षेत्र में विकास दर के 2.1 फीसदी के पास ठिठक जाने से ग्रामीण भारत एक नए संकट से दो-चार है, और उसका सबसे गंभीर असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ा है.
ताजा आर्थिक सर्वेक्षण में खेती की लागत कम करने और अधिक पैदावार के लिए मशीनीकरण और आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया है. देश में ट्रैक्टरों का बढ़ता चलन शायद इस तरफ ही इशारा कर रहा है.
साथ ही, आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 1960-61 में जहां कृषि में 93 फीसदी काम पशुओं से लिया जाता था, वह 2014-15 में घटकर महज 10 फीसदी रह गया है. लेकिन इस मशीनीकरण का फायदा बड़ी जोत में ही हो सकता है इसलिए छोटे खेतों से ज्यादा फायदा नहीं होगा.
खेती को सहारा देने के के लिए कई राज्य सरकारों ने कदम उठाए हैं. किसान अमूमन ट्रैक्टर वगैरह के लिए बैंक से कर्ज ले लेते हैं और फिर कर्ज के जाल में फंस जाते हैं.
ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार ने 735 कृषि मशीनरी बैंक बनाने की शुरुआत की है, ताकि सिद्धार्थ जैसे गरीब लेकिन प्रगतिशील खेती करने का हौसला रखने वाले किसानों को खेती के जरूरी उपकरणों के मामले में मायूस न होना पड़े.
इस योजना के तहत सूबे के 8-10 किसान मिलकर एक कृषि मशीनरी बैंक स्थापित कर सकते हैं. इन बैंकों में ट्रैक्टर, रोटावेटर और हार्वेस्टर समेत सभी छोटे-बड़े यंत्र होंगे. कृषि विभाग अपनी इस योजना में शुरुआती तौर पर एक कृषि मशीनरी बैंक को 10 लाख रु. के यंत्र मुहैया कराएगा. इसमें एक लाख रुपए किसानों के समूह को मुहैया कराए जाएंगे और इतना ही बैंकों से कर्ज दिलाया जाएगा. शेष आठ लाख रुपए सरकार बतौर अनुदान मुहैया कराएगी.
प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही बताते हैं, ''कृषि मशीनरी बैंक की स्थापना से खेती में आधुनिकतम संसाधनों का प्रयोग बढ़ेगा. इससे किसानों की उपज बढ़ेगी और किराए की बजाए अपने ही बैंक से उपकरण लेकर खेती करने पर उनकी लागत भी घटेगी.
नतीजतन किसान की आय बढ़ेगी." उधर, हरियाणा में भी खेती को आधुनिक बनाने के साथ बाजार के लिहाज से ढालने की कवायद चल रही है लेकिन हरित क्रांति से उपजी समस्याओं के हल की ओर भी ध्यान दिया गया है.
हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर सरकार आने के बाद से पेरी अर्बन एग्रीकल्चर यानी महानगरीय मांग के अनुरूप खेती को बढ़ावा देने पर जोर बढ़ा है. नई-नई योजनाएं लॉन्च की जा रही हैं.
अपनी खनिज संपदा के लिए मशहूर राज्य झारखंड ने भी कृषि क्षेत्र पर ध्यान दिया है. झारखंड की भाजपा सरकार ने राज्य में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर ध्यान दिया है और नहरें खोदने की बजाए वर्षा जल के अधिकतम इस्तेमाल के लिए तालाबों और पोखरों के निर्माण की योजना चलाई है. झारखंड के खेतों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए वहां माइक्रोइरिगेशन पर जोर दिया गया है.
मुख्यमंत्री रघुबर दास ने हाल ही में लघु और सीमांत किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए 20,000 पंपिंग सेट बांटने की योजना शुरू की है. राज्य सरकार 1,000 सोलर वाटर पंप 90 फीसदी की सब्सिडी के साथ उपलब्ध कराने की नई योजना लेकर आई है. सूबे से 270 ब्लॉक में कृषि सिंगल विंडो की स्थापना भी की गई है.
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सिंचाई के लिए पानी की कमी को देखते हुए राज्य के शहरी विकास, कृषि, जल संसाधन और लघु सिंचाई विभाग को सीवेज के पानी का ट्रीटमेंट कर उसका इस्तेमाल करने की योजना बनाने को कहा है.
बिहार में करीब 10 लाख क्विंटल बीजों की कमी होती है. ऐसे में गुणवत्तापूर्ण बीजों की आपूर्ति के लिए नीतीश कुमार ने बिहार राज्य बीज निगम को मजबूत बनाने की पहल की है.
2006 से बिहार में नीतीश कुमार ने कृषि रोड मैप बनाने की शुरुआत कर दी थी. इसके फायदे नजर आने लगे हैं. सूबे में धान की प्रति हेक्टेयर पैदावार 90 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 1.3 टन से बढ़कर 2.5 टन हो गई है.
अब नीतीश कुमार दरभंगा में मखाना, पटना में परवल, नालंदा में मगही पान और सूबे के अलग-अलग इलाकों में पपीते, केले और अमरूद की खेती के इलाकावार विकास की विशेष योजनाएं बनाने में लगे हैं.
उत्तर प्रदेश में फल-सब्जी उगाने वाले किसानों की दिक्कतें कम करने के लिए प्रदेश सरकार स्पेन मॉडल को भी लागू करने का विचार कर रही है. इसमें किसान को आधुनिक तकनीकों के बारे में प्रशिक्षित कर फल उगाने में लगने वाली लागत को काफी कम कर दिया जाता है.
जल संकट से जूझ रहे हरियाणा के अधिकांश हिस्सों में धान की एक से अधिक पैदावार लेने की मनाही है, जबकि मछली उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है. 2005 में सूबे का मछली उत्पादन क्षेत्र 10,532 हेक्टेयर जल क्षेत्र था, जो 2016-17 में 18,975 हेक्टेयर हो गया.
प्रदेश सरकार अब खाने की मछली के साथ सजावटी मछली के क्षेत्र में उतर रही है. इसे सिरे चढ़ाने को 14 करोड़ रु. की लागत से झज्जर के तालाब गांव में उत्तर भारत के पहले आधुनिक सजावटी हैचरी का निर्माण किया जा रहा है.
दरअसल, पेरी अर्बन एग्रीकल्चर के बहाने हरियाणा सरकार दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले करीब पांच करोड़ लोगों का करीब 3,600 करोड़ रु. सालाना का बाजार पकडऩा चाहती है.
सूबे के कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ इंडिया टुडे से कहते हैं, ''सरकार धान और गेहूं की बजाए हरियाणा की पहचान ''सब्जी की टोकरी" के तौर पर बनाना चाहती है."
हरियाणा में खेती के कुल 90 लाख एकड़ में बागबानी का क्षेत्र मात्र एक-चौथाई है. सरकार इसका रकबा बढ़ाने में लगी है. कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं, ''इस साल बजट में पेरी अर्बन एग्रीकल्चर को बढ़ावा देने के लिए मत्स्य, पशुपालन, बागबानी का आवंटन बढ़ाया गया है."
केंद्र सरकार ने परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत 1,500 करोड़ रु. की मंजूरी दी है. उत्तराखंड में 10,000 क्लस्टरों में जैविक खेती होनी है. फिलहाल, केवल 8,000 हेक्टेयर भूमि में ही जैविक खेती हो रही है.
महाराष्ट्र सरकार भी कृषि संकट दूर करने के लिए 3 फरवरी को चार नई योजनाएं लाई है. इनमें कर्ज पर ब्याज की सब्सिडी देना, ग्रुप फार्मिंग, छोटे और मझोले कृषि उद्योगों पर ध्यान और कृषि में कौशल विकास शामिल हैं.
देश में अब तक किसानों को अन्नदाता कहकर इज्जत तो बख्शी जाती रही है, और उन्हें वोट की फसल काटने का जरिया भी माना जाता रहा है. पिछड़ते कृषि क्षेत्र में विकास दर को थामने के लिए अब जब राज्यों ने कमर कसी है, तो उम्मीद है कि राज्यों की यह पहल भी योजनाओं की फेहरिस्त में महज कुछ नाम बनकर न रह जाए.
—साथ में, आशीष मिश्र, मलिक असगर हाशमी और अखिलेश पांडे
***

