कर्नाटक में गौड़ा बनेंगे किंगमेकर !

चुनाव में स्पष्ट रूप से किसी की जीत न होने की स्थिति से निपटने के लिए कांग्रेस और भाजपा, दोनों जद (एस) के साथ रिश्ते नरम बनाए रखना चाहते हैं

एक-दूसरे का सहारा दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देवेगौड़ा की मुलाकात की पुरानी तस्वीर
एक-दूसरे का सहारा दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देवेगौड़ा की मुलाकात की पुरानी तस्वीर

आगामी अप्रैल-मई में कर्नाटक में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव में राजनैतिक पंडित त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी कर रहे हैं. इसके मद्देनजर सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा , दोनों एक दशक से सत्ता से दूर जनता दल (सेक्यूलर) के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की होड़ में लग गई हैं.

हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री और जद (एस) के प्रमुख एच. डी. देवेगौड़ा ने किसी भी प्रतिद्वंद्वी के साथ चुनाव पूर्व गठजोड़ की संभावना को खारिज कर दिया है. यह पार्टी सत्ता हासिल करने के लिए अप्रत्याशित ''रियायतों" के लिए जानी जाती है. वास्तव में जद (एस) के नेताओं ने काफी खुलकर कहा है कि त्रिशंकु विधानसभा उनके लिए फायदेमंद रहेगा. अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों के लिए पिछले दरवाजे खुले हुए हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि दोनों पार्टियों को सौ से कम सीटें ही मिलेंगी, जो 224 सदस्यीय विधानसभा के लिए बहुमत से काफी कम होंगी. एक वरिष्ठ राजनैतिक पर्यवेक्षक ए. वीरप्पा कहते हैं, ''बहुमत के अभाव में दोनों पार्टियों के पास जद (एस) की मदद लेने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा."

वे कहते हैं कि जद (एस) पार्टी किंगमेकर की भूमिका में हो सकती है. माना जाता है कि यह पार्टी करीब 40 सीटें जीत सकती है. जद (एस) अब भी अपने पारंपरिक गढ़ पुराने मैसूरू (दक्षिण कर्नाटक) में प्रमुख ताकत बनी हुई है, जहां उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस होगी. उत्तरी कर्नाटक और तटीय जिलों में मुख्य मुकाबला कांग्रेस बनाम भाजपा प्रत्याशियों के बीच होगा और जद (एस) की मामूली उपस्थिति होगी.

जद (एस) के प्रत्याशी मैसूरू, मंड्या, हासन, टुमकुर, रमणगारा और कोलार जिलों में कांग्रेस की संभावनाओं पर पानी फेर सकते हैं. दक्षिण में जद (एस) की ताकत से वाकिफ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया जरूरत पड़ने पर गठबंधन करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे और अपने पुराने मित्र एच. डी. रेवन्ना पर निर्भर हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री के साथ राज्य के मुख्यमंत्री के रिश्ते अच्छे नहीं हैं. हालांकि, जद (एस) के भीतर सामान्य मनोदशा कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के पक्ष में नहीं है. देवेगौड़ा ने स्वयं 22 जनवरी को इसे यह कहते हुए स्पष्ट कर दिया कि ''हमने कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके अतीत में अपने हाथ जला लिए हैं."

नाम न छापने की शर्त पर जद (एस) के एक वरिष्ठ नेता ने भी इसकी पुष्टि की. उन्होंने कहा, ''कांग्रेस केंद्र में सत्ता में नहीं है. और भाजपा पूरे देश में मजबूत है. इसलिए सबसे लोकप्रिय पार्टी के साथ जाने में ही समझदारी है."

वैसे भी जद (एस) भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला चुकी है. उसके नेता कुमार स्वामी मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बी.एस. येदियुरप्पा उप-मुख्यमंत्री के तौर पर 2007 में सरकार में रह चुके हैं. हलांकि दोनों दलों में दोस्ती होना आसान भी नहीं है. इसकी वजह पुरानी दुश्मनी है.

दरअसल जब जद (एस) और भाजपा की सरकार चल रही थी तो उस वक्त गठबंधन के लिए एक फॉर्मूला था जिसके तहत जद (एस) ने ढाई साल बाद मुख्यमंत्री की गद्दी येदियुरप्पा को सौंपने से मना कर दिया था. इसी को भाजपा ने भुनाया और कुमार स्वामी पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए चुनाव में सहानभूति हासिल कर जीत हासिल की.

उस चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत से चार सीटें कम मिली थीं. मुख्यमंत्री बनने के बाद येदियुरप्पा यहीं नहीं रुके. उन्होंने जद (एस) के  विधायकों को ''ऑपरेशन लोटस" के  तहत तोड़ लिया. उनका इस्तीफा कराया और उप-चुनाव में उन्हें भाजपा के टिकट पर जिता कर लाए भी. येदियुरप्पा की इस चाल से जद (एस) और भाजपा के सियासी रिश्ते और भी तल्ख हो गए.

अब, भाजपा सक्रिय रूप से वोक्कालिगा समुदाय के नेताओं और संतों को लुभाने के लिए सक्रिय हो गई है, जो दक्षिण कर्नाटक के निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं पर पकड़ रखते हैं. अब भाजपा में शामिल हो चुके कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री एस.एम. कृष्णा कम से कम मंड्या जिले में पार्टी के लिए कारगर हो सकते हैं, जहां उसके पास खास समर्थक नहीं हैं.

7 जनवरी को बेंगलूरू के दौरे पर आए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वोक्कालिगा के सबसे सम्मानित धार्मिक केंद्र आदिचुंचनगिरि मठ में ठहरे. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी जब बेंगलूरू में रहते हैं, तो मठ के मुख्य पुजारी से मिलते हैं. वोक्कालिगा राज्य का दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है और पारंपरिक रूप से जद (एस) का समर्थक रहा है.

वीरप्पा कहते हैं, ''वोक्कालिगा वोट बैंक को तोड़ना भाजपा के लिए मुश्किल होगा. लेकिन मतदान के बाद अगर जरूरी हुआ तो जद (एस) को गठबंधन के लिए राजी करने के लिए मठ के पुजारियों के साथ अपने अच्छे रिश्ते का इस्तेमाल कर सकती है." फिलहाल गौड़ा ही हैं, जो इस अनुमान के खेल का पूरा मजा ले रहे हैं.

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