बेदम हो रही कांग्रेस में राजस्थान की जीत ने भरा दम

पायलट ने तकरीबन मटियामेट पार्टी को खड़ा कर दिया है. जातिगत समीकरणों ने भी कांग्रेस के पक्ष में काम किया

पुरूषोत्तम दिवाकर
पुरूषोत्तम दिवाकर

अगले साल आम चुनावों के पहले सेमीफाइनल कहे जा रहे आठ राज्यों के चुनाव वाले वर्ष का आगाज भाजपा के लिए शुभ तो नहीं ही हुआ. हाल में हुए तीन लोकसभा और दो विधानसभा उपचुनावों ने भगवा पार्टी को निराश ही किया. सबसे करारा झटका तो उसे राजस्थान की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर मिला, जिससे उबरने में उसे काफी कुछ करने की जरूरत होगी.

उसके लिए सुकून की बात यह है कि पश्चिम बंगाल में उलूबेरिया संसदीय और नोआपाड़ा विधानसभा उपचुनाव में वह माकपा और कांग्रेस को पीछे धकेलकर दूसरे स्थान पर पहुंच गई. हालांकि इन दोनों पर तृणमूल कांग्रेस की जीत इतनी भारी है कि भाजपा चाहकर भी जश्न मनाने की स्थिति में नहीं हो सकती. उलूबेरिया में तृणमूल की जीत का अंतर 4.74 लाख है और नोआपाड़ा में 63,000 रहा है.

जश्न मनाने का मौका तो यकीनन कांग्रेस के हाथ लगा है. उसने अजमेर और अलवर की लोकसभा सीटें और मांडलगढ़ की विधानसभा सीट जीतकर राजस्थान में हुए उपचुनावों की तीनों सीटें अपनी झोली में डाल लीं. कांग्रेस के तीनों उम्मीदवारों रघु शर्मा, करण सिंह यादव और विवेक धाकड़ ने कुल सात लाख से ज्यादा वोट पाकर जीत हासिल की.

पिछले चुनाव में ये तीनों सीटें भाजपा के खाते में थीं. लेकिन इस बार इन 17 विधानसभा क्षेत्रों में एक में भी भाजपा बढ़त नहीं दर्ज कर पाई. इससे अगर कांग्रेस के नेता राज्य में वापसी का ख्वाब देखने लगे हैं तो उन्हें इसका हक है.

इन नतीजों ने बतौर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की कुर्सी पक्की कर दी है और अब अगले विधानसभा चुनावों में वे ही पार्टी की अगुआइ करेंगे. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सलाहकार की भूमिका निभाते रहेंगे, क्योंकि पार्टी को उनके तजुर्बे की भी जरूरत है.

उधर, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को अपनी कार्यशैली में जबरदस्त बदलाव लाना होगा. साथ ही, उन्हें मंत्रिमंडल में भी भारी फेरबदल करना होगा और कुछ दिग्गज मंत्रियों को हटाकर जमीनी काम करने के लिए भेजना होगा. हालांकि प्रदेश भाजपा इस हार का ठीकरा नोटबंदी, जीएसटी और आरएसएस का सहयोग न मिलने पर फोड़ रही है, पर ऐसे बहाने विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन सुधारने में कोई मदद नहीं करेंगे.

वैसे, यह तय है कि राजे को फिर से वैसे ही सक्रिय होना चाहिए जैसे वे पिछले तीन साल के दौरान थीं. उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं और आम लोगों से मेल-मुलाकात और बात करनी चाहिए और पक्का करना चाहिए कि उनके फरमानों पर अमल हो. वजह जो भी हो, वे कुशल प्रशासक की अपनी छवि गंवा चुकी हैं.

नतीजों के बाद एक बड़े अफसर ने कहा, ''अफसरशाही के एक धड़े ने उन्हें कामकाज को लेकर ऐसे सब्जबाग दिखाए जिन्हें कभी पूरा नहीं किया जा सकता था. दूसरा धड़ा अपने में ही डूबा रहता है और इस कदर गैर-सियासी है कि उसे उनके फैसलों के असर और नतीजे समझ में नहीं आते.''

उधर, चुनाव जीतने के फौरन बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने इंडिया टुडे से कहा, ''मुझे ताज्जुब नहीं हुआ. लोकसभा चुनाव के फौरन बाद भी हमने विधानसभा की चार सीटों में तीन जीती थीं.'' यह इसलिए भी बड़ी बात है क्योंकि पायलट ने तकरीबन मटियामेट पार्टी की कमान संभाली थी. उन्होंने पिछले चार साल में छोटे-छोटे कदमों से पार्टी को नए सिरे से खड़ा किया है. शायद ही कभी किसी कांग्रेस नेता ने खुद को स्थापित करने के लिए इतनी कड़ी मेहनत की होगी.

जातिगत समीकरणों ने भी पायलट के हक में काम किया. यादवों के दबदबे वाली सीट पर दिग्गज नेता करण सिंह यादव को उतारने का पायलट का फैसला कारगर रहा. इसके अलावा कांग्रेस को मेव मुसलमानों का भी समर्थन मिला, जिन्हें इस इलाके में भाजपा की गोरक्षा ब्रिगेड ने निशाना बनाया है.

अजमेर में भी भाजपा के ब्राह्मण वोट काटने के लिए रघु शर्मा को खड़ा करने का पायलट का फैसला कामयाब रहा. अपने सहयोगी शर्मा के लिए गहलोत ने कड़ी मेहनत की. खुद कांग्रेस के लिए भी सबसे ज्यादा हैरानी की बात मांडलगढ़ की जीत है. हालांकि यह सीट कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रही है, पर पार्टी के एक बागी नेता के मैदान में उतरने के बाद इसे हारा हुआ मान लिया गया था.

पायलट ने सरकार की खामियों पर लगातार चोट की और किसानों की खुदकशी, जन-सुविधाओं की बुरी हालत और धार्मिक असहिष्णुता सरीखे मुद्दों को उभारा. वे कामयाब भी रहे. गहलोत ने पार्टी कार्यकर्ताओं को याद दिलाया कि अगर पार्टी गुजरात में इतना अच्छा प्रदर्शन कर सकती है, तो राजस्थान में भी कर सकती है. वहीं, भाजपा का कोई पासा इस बार मुआफिक नहीं पड़ा.

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