सैम पित्रोदा की वापसी

अगर सब कुछ योजना के मुताबिक होता है, तो वे कांग्रेस के सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री बन सकते हैं. राहुल गांधी को जितना मैं जानता हूं, उस बिना पर कह सकता हूं कि वे सरकार की जिम्मेदारी संभालने से हिचकेंगे.

 नया नेता! कांग्रेस में वे बड़े नेता के रूप में उभरने जा रहे
नया नेता! कांग्रेस में वे बड़े नेता के रूप में उभरने जा रहे

अगर सब कुछ योजना के मुताबिक होता है, तो वे कांग्रेस के सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री बन सकते हैं. राहुल गांधी को जितना मैं जानता हूं, उस बिना पर कह सकता हूं कि वे सरकार की जिम्मेदारी संभालने से हिचकेंगे. और तब यही शख्स राहुल का मनमोहन सिंह होगा.'' यह कहना है कांग्रेस के एक महासचिव का, जो वे स्वाभाविक ही नाम उजागर न करने की शर्त पर कहते हैं. यह बात टेलीकॉम उद्यमी सैम पित्रोदा के बारे में कही गई है, जो इन दिनों गुजरात में पार्टी का प्रचार कर रहे हैं. राज्य में दिसंबर में मतदान होना है.

पार्टी महासचिव का यह बयान बेशक अटकल ही है, पर सियासी आवाज के तौर पर पित्रोदा के उभार को अनदेखा नहीं किया जा सकता. उन्हें पहले ही कुर्ता और जानी-पहचानी गांधी टोपी में देखा गया है. वे ऐसे भाषण दे रहे हैं जो चुनावी माहौल में दबे-छिपे इशारों से भरे हैं. एक नमूना देखिए_ ''अगर आप लोकतंत्र की बात करें, तो आपको सामूहिक अगुआई की जरूरत होती है. आप ऐसा नहीं कर सकते कि कोई एक आदमी तमाम फैसले ले. वह भगवान ही क्यों न हो, यहां तक कि वह भी इतना काबिल नहीं.''

जाहिरा तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए पित्रोदा के शब्द. सियासत में यह उनकी दूसरी पारी है. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीबी सलाहकार पित्रोदा को अक्सर हिंदुस्तान की दूरसंचार क्रांति का श्रेय दिया जाता है. वे ओडिशा के तीतलागढ़ के एक गुजराती परिवार में जन्मे. उनका मूल नाम सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा है. वे भारत के राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के प्रमुख रहे हैं और उन्होंने जन सूचना, बुनियादी ढांचा और नवाचार पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार की जिम्मेदारी निभाई है. इसी साल उन्होंने ओडिशा सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी सलाहकार का पद छोड़ा है.

दूसरे कई लोगों के उलट नेहरू-गांधी परिवार के साथ उनका जुड़ाव सालों से जस का तस कायम है. राहुल हालांकि उनसे तकरीबन तीन दशक छोटे हैं, पर उन्हें उनके पहले नाम से पुकारते हैं. कांग्रेस के कई युवा नेता राहुल गांधी की छवि में आए हाल के बदलाव का श्रेय पित्रोदा को देते हैं. बताते हैं, पार्टी के विदेश महकमे के अध्यक्ष ने ही अमेरिका की कई जगहों पर राहुल के भाषणों का 'इंतजाम' किया था.

पार्टी ने गुजरात में पित्रोदा को दो वजहों से उतारा है. वे गुजराती हैं और शहरी युवा वोटरों में उनकी आइकन सरीखी अपील है. यही वह इलाका है जहां भाजपा ने पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है. उन्होंने अपनी स्कूल की पढ़ाई सूबे के वल्लभ विद्यानगर से की और फिर वडोदरा के इंजीनियरिंग कॉलेज में गए. पित्रोदा फिलहाल पांच शहरों—वडोदरा, अहमदाबाद, राजकोट, जामनगर और सूरत का दौरा कर रहे हैं और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि शहरी गुजराती कांग्रेस से क्या उम्मीद करते हैं.

योजना के मुताबिक छोटे कारोबारियों, कामगारों और औरतों से बातचीत की जा रही है और संभावना है कि उनसे मिली सलाह को चुनाव घोषणापत्र में शामिल किया जाएगा. पित्रोदा को उस टीम का प्रभारी बनाया गया है जो 'जनता का घोषणापत्र' तैयार करेगी और जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, छोटे और मझोले उद्यमियों, रोजगार सृजन तथा पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया जाएगा.

बात में असर पैदा करने के लिए पित्रोदा गांधी के नाम की दुहाई भी देने लगे हैं. यह बेकार भी नहीं जा रही. उन्होंने गुजरात सरकार पर हमला किया कि उसने वह स्कूल बंद कर दिया जिसमें महात्मा गांधी गए थे.

मोदी के गुजरात मॉडल का जिक्र किए बगैर पित्रोदा उनके सबसे असरदार चुनावी नारे यानी विकास पर प्रधानमंत्री से मोर्चा ले रहे हैं. वे 'बड़ी परियोजनाओं से हांके जाते अमेरिकी मॉडल' के हक में नहीं हैं. वे श्ग्रामीण विकास, किसानों और छोटी परियोजनाओं पर गांधीवादी जोर्य देने के हिमायती हैं. पार्टी सोच-समझकर 35 साल से कम उम्र के युवाओं पर निशाना साध रही है और उसके दो अंदरूनी सर्वे में कहा गया है कि राज्य सरकार से छात्रों की नाराजगी की एक वजह शिक्षा की ऊंची लागत है. पित्रोदा इस मामले में भी आवाज बुलंद करते हैं, ''गुजरात में शिक्षा को निजी हाथों में सौंपना बड़ा मुद्दा है. छात्रों को मोटी फीस चुकाने के लिए मजबूर किया गया है.''

अकेली चूक (है तो) अब तक यही कि प्रचार-प्रसार के एक औजार के तौर पर सोशल मीडिया की भूमिका के प्रति बेरुखी बरती गई है. वह भी तब जब राहुल को नई क्चयाति इसी की बदौलत हासिल हुई है. मोदी की तरफ एक और इशारा करते हुए वे कहते हैं, ''कुछ नेताओं को लोगों के साथ संवाद के लिए फेसबुक और ट्विटर सरीखे औजारों पर निर्भर होना पड़ता है.'' यह सेल्फ-गोल तो नहीं!

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