वा घर सबसे न्यारा

सुदर्शन शेट्टी की ताजा प्रदर्शनी शून्य घर विरोधाभासों की गठरी है. इसमें पुरानी सामग्री का प्रयोग है पर यह रचना बिल्कुल नई है. इसकी केंद्रीय संरचना किसी महल-सी भव्य जान पड़ती है पर जल्द ही आप एक छोटे-से कमरे में जा निकलेंगे, जो दरअसल कलाकार के बचपन के कमरे की पुनर्रचना है

शून्य घर सुदर्शन शेट्टी की इस प्रदर्शनी में चार इंस्टालेशन और एक घंटे की एक फिल्म है
शून्य घर सुदर्शन शेट्टी की इस प्रदर्शनी में चार इंस्टालेशन और एक घंटे की एक फिल्म है

बीते सात साल में मुंबई में लग रही अपनी पहली प्रदर्शनी को अंतिम रूप दे रहे कुछ शिल्पकारों को निर्देश देते हुए 55 वर्षीय कलाकार सुदर्शन शेट्टी बताते हैं, ''अपने वर्तमान के बोध के लिए जरूरी है कि हम सब अपने-अपने अतीत का एक खाका सामने रखें. यह सब कुछ महज एक बिंब है लेकिन क्या यह हमारे अस्तित्व तक विस्तारित हो सकता है? आखिर दोनों के बीच की विभाजक रेखा कहां खींची जाए?"

12वीं सदी के कवि गोरखनाथ की रचना शून्य गढ़ से प्रेरित यह प्रदर्शनी विपुलता और व्यर्थता के द्वंद्व को दर्शाने की कोशिश करती है. मुंबई के डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय में 26 दिसंबर तक चलने वाली इस प्रदर्शनी में चार काम रखे गए हैं. सर्वाधिक प्रभावी इसकी केंद्रीय वास्तु-संरचना पुरानी लकड़ी की बनी है, जिसे मुंबई के चोर बाजार और अहमदाबाद समेत पूरे देश से लिया गया है. इसके अलावा मुगलिया दौर को दर्शाने वाला एक गुंबद है, लकड़ी का एक अन्नघर है जैसे केरल में इस्तेमाल किए जाते हैं और स्तंभों की एक शृंखला है जो रोमन साम्राज्य के किसी अवशेष का आभास देती है.

संग्रहालय की प्रबंध ट्रस्टी और मानद निदेशक तस्नीम मेहता के मुताबिक, केंद्रीय संरचना भव्य है. वे बताती हैं, ''इसमें जितनी भी लकडिय़ां इस्तेमाल की गई हैं, वे किसी पुरानी संरचना का अंश रही हैं. इसमें वास्तुप्रभाव, कविता और अनुगूंज का एक मिश्रित एहसास होता है. यह जीवन-चक्र जैसा कुछ है क्योंकि सुदर्शन ने इन पुरानी चीजों में नई जान फूंकी है."

प्रदर्शनी के केंद्रीय विषय के पीछे अपनी प्रेरणा को बताते हुए शेट्टी गोरखनाथ का एक दोहा सुनाते हैं, ''शून्य गढ़ शहर, शहर घर बस्ती, कौन सोता कौन जागे है?" शेट्टी इन पंक्तियों में निहित सौंदर्य को काफी प्रभावी मानते हैं. इसमें कई वास्तुचित्रों की झलक मिलती है लेकिन सबके मूल में एक खालीपन है, कुछ नहीं होने का एहसास है. वे कहते हैं, ''यहां व्याख्या की जबरदस्त गुंजाइशें हैं और यहीं से मुझे शून्य घर की प्रेरणा मिली है."

उन्होंने पहले ये इंस्टॉलेशन चेंबूर स्थित अपने घर और स्टुडियो में तैयार किए. इसे एक वीडियो के सेट की तरह बनाया गया था जिसकी पटकथा प्रेम, जीवन, हास्य, आक्रोश और मृत्यु पर आधारित थी. इसके बाद उन्होंने अपने शिल्पकारों के साथ उसे विखंडित कर दिया और एक पुरानी खदान में जाकर इसे दोबारा जोड़ा ताकि वीडियो शूट किया जा सके.

वे बताते हैं, ''लोनावाला के रास्ते में एक पहाड़ में बड़ा-सा छेद है. निर्माण कार्य के लिए वहां से पत्थर निकाले जाने के कारण वह जगह खाली हो चुकी है. लिहाजा वहां यह संरचना बनाए जाने का एक प्रतीकात्मक महत्व था." इस इंस्टॉलेशन के निर्माण में लगे शिल्पकारों की फुटेज को शेट्टी ने अपनी पटकथा के वीडियो के साथ मिलाकर घंटे भर की एक फिल्म बनाई जो अब प्रदर्शनी का अंग है. शेट्टी कहते हैं, ''जब मैं वीडियो की पटकथा लिख रहा था, उस वक्त इंस्टॉलेशन को एक सेट के बतौर निर्मित किया गया था. कह सकते हैं कि उस पर फिल्म का प्रभाव था."

पिछले साल दिल्ली की मॉडर्न आर्ट राष्ट्रीय कला दीर्घा में उन्होंने पहली बार इसका प्रदर्शन किया था. तब से लेकर अब तक यह प्रदर्शनी बंद कमरे में ही लगाई गई है. शेट्टी मानते हैं कि इससे उसे एक नई अर्थछवि मिलती है और देखने वाले का अनुभव नाटकीय तरीके से बदल जाता है. वे कहते हैं, ''पहले इसे पुरातात्विक स्पेस के भीतर दिखाया जाता था, तो ऐसा लगता कि उन जगहों पर इसे थोपा जा रहा हो."

डॉ. भाऊ दाजी लाड संग्रहालय जैसे मुक्तांगन में ''यह किसी ऐसी वस्तु-सा जान पड़ता है जो यहीं की रही हो. किसी संग्रहालय के भीतर हम किसी वस्तु को कैसे देखते हैं, इसे लेकर मेरे मन में हमेशा से एक जिज्ञासा रही है. हमें सिखाया गया है कि संग्रहालयीकरण की अवधारणा का लेना-देना उस जगह से है जहां से वह वस्तु लाई गई है. मुझे नहीं लगता कि यह बात सही है. आप जब भी लोगों की नजरों से उसे देखते हैं, उसका अर्थ ही बदल जाता है."

शून्य घर को एक निरंतर विकसित होती परियोजना के रूप में समझाते हुए शेट्टी कहते हैं कि इस पर काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण रहा है. वे बताते हैं, ''इसे बनाने में हमें करीब 18 महीने लगे. इसे ऐसा बनाया जाना था कि इसे हर बार खंडित किया जा सके और दोबारा प्रदर्शन के वन्न्त जोड़ा जा सके. इसमें लकड़ी की मात्रा इतनी ज्यादा है कि कभी-कभार वे लाने, ले जाने में गायब हो जाती हैं. ऐसे में मुझे उसी की तरह दिखने वाली दूसरी चीजें खोजनी पड़ती हैं. ऐसा करना एक बार फिर प्रतीकों के साथ खेलना होता है."

एक और कलात्मक चुनौती यह थी कि कुछ ऐसा बनाया जाए जो कालखंड में आपको कुछ पीछे ले जा सके. वे समझाते हुए कहते हैं, ''यह संरचना पुरानी जान पड़ती है, हमारे समय से कटी हुई. फिल्म में भी विषय से कुछ दूरी बरती गई है चूंकि एक भी क्लोज-अप शॉट नहीं है. मतलब कि किसी और देश-काल और उसमें हुई घटनाओं से यह दूरी पैदा करने का एक तरीका है."

—रिंकी कुमार

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