नेपाल में भी बिहार के टॉपर्स घोटाले की आंच!
बिहार से पढ़े हुए डॉक्टरों पर नेपाल में गिरी गाज, नेपाल मेडिकल काउंसिल से मिली मान्यता हो सकती है रद्द.

बच्चा राय और लालकेश्वर की करतूतों से बिहार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत होना शुरू हो गई है. पड़ोसी देश नेपाल में बिहार से इंटरमीडिएट पास करने वाले लोग न सिर्फ शक की निगाह से देखे जाने लगे हैं, बल्कि उनके साथ सरकार आतंकियों-सा सलूक कर रही है. पिछले दिनों नेपाल के तराई इलाके में कार्यरत 10 जिलों के 36 डॉक्टरों के साथ नेपाल की केंद्रीय जांच एजेंसी सीआइबी ने कुछ ऐसा ही किया. उन्हें उनके कार्यस्थल मसलन सरकारी अस्पताल, निजी अस्पताल और क्लीनिकों से पकड़कर पुलिस वैन में ऐसे ठूंसा गया गोया ये कोई बड़े अपराधी या आतंकी हों. हद तो यह है कि आधा दर्जन महिला चिकित्सकों के साथ भी ऐसा ही बर्ताव हुआ.
डॉक्टरों ने इस गिरफ्तारी का विरोध करते हुए सरकार की भेदभावपूर्ण नीति की कड़ी आलोचना की है. नेपाल मेडिकल एसोसिएशन (एनएमए) के अध्यक्ष अंजनी कुमार झा ने कहा, ''गलती करने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन ''आतंकी शैली" में नहीं." एनएमए ने इस पूरे घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इस घटना से नेपाल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हुआ है. सर्टिफिकेट का सत्यापन तो एनएमसी भी कर सकती थी. अगर सर्टिफिकेट गलत पाए जाते तो गिरफ्तारी से पहले इन डॉक्टरों का लाइसेंस रद्द किया जाना चाहिए था. गिरफ्तार 36 में से 35 डॉक्टरों के पास एनएमसी से मान्यता प्राप्त लाइसेंस हैं. एनएमसी के महासचिव मुक्ति राम श्रेष्ठ ने देश के डॉक्टरों से प्रैक्टिस से पहले सरकार से सर्टिफिकेट सत्यापित करवाने का आदेश जारी किया है.
बीरगंज में भारी विरोध प्रदर्शन और इमर्जेंसी सेवा ठप करने के डॉक्टरों के अल्टीमेटम के बाद भी गिरफ्तार डॉक्टरों की रिहाई नहीं हो सकी. बिहार इंटरमीडिएट काउंसिल के फर्जी सर्टिफिकेट पेश कर डॉक्टर बनने और मेडिकल काउंसिल के कथित जाली सर्टिफिकेट का इस्तेमाल कर चिकित्सकीय कार्य करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए 36 चिकित्सकों को सीआइबी ने 19 जून को काठमांडू की अदालत में पेश किया. जिसके बाद पांच दिन हिरासत में रखकर जांच करने का आदेश काठमांडू की जिला अदालत ने सीआइबी को दिया है. बीरगंज, चितवन, जनकपुर, विराटनगर, काठमांडू समेत 10 जिलों से इन चिकित्सकों को सीआइबी ने 17 जून को एक साथ छापेमारी कर गिरफ्तार किया था.
सूत्रों की मानें तो सीआइबी ने लगभग 150 ऐसे चिकित्सकों की लिस्ट बना रखी है, जिन पर नकली सर्टिफिकेट इस्तेमाल करने का अंदेशा है. इस लिस्ट के तहत नेपाल में प्रैक्टिस करने वाले उन 900 एमबीबीएस डॉक्टरों के सर्टिफिकेट्स की गुपचुप तरीके से जांच की गई, जिन्होंने बिहार से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की है. नेपाल सीआइबी का दावा है कि बिहार की फर्जी डिग्री पर एमबीबीएस करके ये डॉक्टर नेपाल मेडिकल काउंसिल से गलत तरीके से लाइसेंस हासिल कर नौकरी और प्रैक्टिस कर रहे थे. पिछले साल जनवरी में भी 15 डॉक्टरों को फर्जी सर्टिफिकेट मामले में गिरफ्तार किया गया था.
नेपाल में फर्जी सर्टिफिकेट पर प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टरों के खिलाफ ऑपरेशन अभियान की कमान संभाल रहे सीआइबी प्रवक्ता और सुपरिंटेंडेट ऑफ पुलिस देबेश लोहानी को लेकर भी मधेश में तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गरम है. ऐसी चर्चा है कि लोहानी की मधेश और भारत विरोधी छवि है और गिरफ्तार डॉक्टरों में भी अधिकांश मधेश क्षेत्र से आते है.
लोहानी पहले बीरगंज में एसपी थे, जिनके कार्यकाल में मधेशी नागरिकों पर कथित जुल्म किया गया था. भूकंप के समय भी भारतीय मदद लेने की राह में लोहानी रोड़ा बने थे. हालांकि लोहानी इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते है कि ऑपरेशन क्वैक को पूरा करने में नेपाल मेडिकल काउंसिल और हायर सेकंडरी एजुकेशन बोर्ड का सहयोग लिया गया है. नेपाली कानून के जानकारों के मुताबिक, अब संबंधित जिलों की अदालतों के पास मामले स्थानांतरित होंगे. आरोप सिद्ध होने पर इन डॉक्टरों को पांच साल जेल की सजा हो सकती है. डॉक्टरों की गिरफ्तारी को लेकर विरोध के स्वर उठ रहे हैं, लेकिन शक के आधार पर इस तरह का व्यवहार कितना उचित है?