करुणानिधि की विरासत की पूरी बागडोर स्टालिन के हाथ
पिता की छत्रछाया में काम करने के बाद स्टालिन पार्टी नेतृत्व के साथ कोई छेड़छाड़ करने से बच रहे हैं—वे इन सभी वयोवृद्ध नेताओं के साथ काम करते हुए बड़े हुए हैं. उन्होंने अध्यक्ष चुने जाने के बाद पार्टी की प्राथमिकताओं का ऐलान किया.

मरीना समुद्र तट पर मुथुवेल करुणानिधि को दफनाए जाने के ठीक 20 दिन बाद द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (द्रमुक) ने पार्टी के दिवंगत पितामह के पसंदीदा पुत्र एम.के. स्टालिन का उनके उत्तराधिकारी के रूप में राजतिलक कर दिया. चेन्नै में पार्टी के मुख्यालय अन्ना अरिवालयम में पार्टी की जनरल काउंसिल ने 28 अगस्त को 65 वर्षीय स्टालिन को पार्टी का नया अध्यक्ष चुन लिया. करुणानिधि के इस तीसरे बेटे ने 1967 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राजनीति में कदम रखे थे जब वे महज 14 साल के थे और स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे. उस चुनाव में द्रमुक ने कांग्रेस को तमिलनाडु से स्थायी तौर पर बाहर कर दिया था.
स्टालिन पार्टी के अपेक्षाकृत कम उम्र के अध्यक्ष हैं, पर पार्टी में अब भी वयोवृद्ध लोगों का पूरा तंत्र है. 95 वर्षीय के. अंबाझगन 1977 से पार्टी के महासचिव बने हुए हैं. अभी तक प्रधान सचिव रहे 70 वर्षीय दुरैमुरुगन को नया कोषाध्यक्ष चुना गया.
जाहिर है, वर्षों तक पिता की छत्रछाया में काम करने के बाद स्टालिन पार्टी नेतृत्व के साथ कोई छेड़छाड़ करने से बच रहे हैं—वे इन सभी वयोवृद्ध नेताओं के साथ काम करते हुए बड़े हुए हैं. उन्होंने अध्यक्ष चुने जाने के बाद पार्टी की प्राथमिकताओं का ऐलान किया.
पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अपने पहले भाषण में उन्होंने द्रमुक के कैडरों से "नरेंद्र मोदी की सरकार को सबक सिखाने'' और केंद्र से "दक्षिणपंथी'' सरकार को बेदखल करने का आह्वान किया. यह 2019 में विपक्ष के महागठबंधन के लिए उत्साहजनक घोषणा है.
कई लोगों का मानना है कि स्टालिन का रास्ता उनके पिता के लोकतांत्रिक और आम सहमति वाले तौर-तरीके से अलग होगा. इस साल मार्च में उन्होंने जिला स्तर के पदाधिकारियों और द्रमुक के कैडरों से कहा था, "अगर आप चाहते हैं कि पार्टी आगे बढ़े तो आपको अब मेरे तानाशाही तौर-तरीकों को स्वीकार करना होगा. पार्टी में अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.'' पार्टी के सर्वेसर्वा के तौर पर स्टालिन पिता के दिए हुए अपने नाम को सही साबित कर सकते हैं (यहां तक कि उनका और रूस के तानाशाह स्टालिन का जन्मदिन भी एक है).
इस बीच स्टालिन के बड़े भाई एम.के. अलागिरी जिन्हें 2014 में पार्टी से निकाल दिया गया था, दोबारा अपनी जगह बनाना चाहते हैं. उन्होंने चेताया है कि नया नेतृत्व (स्टालिन के अधीन) उन्हें पार्टी में लेने से मना करता है तो इसके "गंभीर नतीजे'' होंगे.
वहीं माना जा रहा है कि स्टालिन की सौतेली बहन कनिमोली दिल्ली में उनकी आंख और कान की भूमिका निभाएंगी, ठीक उसी तरह जैसे करुणानिधि के लिए मुरसोलि मारन और उनके बेटे दयानिधि मारन निभाते थे.
चेन्नै के विश्लेषक एन. सत्य मूर्ति का कहना है कि द्रमुक में स्टालिन के लिए कोई चुनौती नहीं है पर पार्टी के बाहर "उन्हें ऐसे नेता के तौर पर उभरना होगा जो चुनावों में पार्टी को जीत दिला सकता है.''
करुणानिधि जब अधिक वृद्ध हो चुके थे (खासकर 2011 के बाद से) तो उनकी जगह पर स्टालिन का प्रबंधन अच्छा नहीं रहा है. उन्होंने जब से पार्टी की कमान संभाली थी तब से द्रमुक लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुकी है और 2014 के लोकसभा चुनावों में तो वह एकदम साफ हो गई थी.
2019 का लोकसभा चुनाव और विधानसभा के दो आगामी उपचुनाव स्टालिन के लिए अपनी काबिलियत साबित करने का सही मौका होंगे. इनमें उन्हें सही उम्मीदवारों के चयन और गठबंधन बनाने में अपनी योग्यता साबित करनी होगी.
तमिलनाडु में करुणानिधि और जयललिता, दोनों के निधन के बाद चुनावी समीकरण बदल रहे हैं. 39 लोकसभा सीटोंकृपांचवां सबसे अधिक सीटों वाला राज्य—वाला तमिलनाडु दिल्ली में सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाएगा. विश्लेषकों के मुताबिक, अगर वे सही गठजोड़ और सही उम्मीदवारों का चुनाव करते हैं तो अच्छा मोल-भाव कर सकते हैं.
कई लोगों का मानना है कि स्टालिन ऐसा कर सकते हैं. उनकी पहचान मेहनती नेता के तौर पर है और कैडरों में अच्छा सम्मान है. 2016 के विधानसभा चुनावों से पहले उनके "नमक्कू नामे'' (हमारी ओर से, हमारे लिए) रोड शो ने लोगों को खूब आकर्षित किया था, खासकर पार्टी के इतर युवा मतदाताओं को.
लेकिन स्टालिन संवाद के मामले में कमजोर और कैडरों के लिए सहज उपलब्ध नहीं रहे हैं. अब अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें अपनी आदत बदलनी होगी और लोगों के लिए उपलब्ध रहना होगा. मद्रास यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्री रामू मणिवन्नन मानते हैं, "गंभीर स्वभाव और दिखावेबाजी से दूरी, दोनों उनकी ताकत हैं पर कमजोरी भी. किसी भी परिस्थिति में वे जल्दबाजी या घबराहट नहीं दिखाते.'' खुलेपन और पारदर्शिता के मामले में वे अपने पिता के आसपास भी नहीं हैं, फिर भी उन्होंने खुद को एक समझदार व्यक्ति के तौर पर पेश किया है—कम नरम, लेकिन अडिग. ठ्ठ
उन्होंने गठबंधन और उम्मीदवारों का सही चयन किया, तो वे 2019 में अच्छा मोल-भाव कर सकते हैं
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