आम आदमी पार्टी से खास नेताओं का पलायन
2014 के लोकसभा चुनाव में आप कार्यकर्ताओं से परिचय कराने के दौरान मेरे सरनेम पर काफी जोर दिया गया.’’ पार्टी सूत्रों का कहना है कि ऐसा जातिगत वोट बटोरने के लिए किया गया क्योंकि उनके चुनाव क्षेत्र में उनकी जाति के वोटर काफी हैं.

राजनैतिक दलों का भविष्य नेताओं के पराक्रम से तय होता है और अगर नेता ही पार्टी छोड़ने लगें तो पार्टी के हौसले पर असर पड़ना लाजिमी है. ऐसा ही कुछ इन दिनों आम आदमी पार्टी (आप) के साथ हो रहा है. अगस्त 2018 में दिल्ली में सत्तारूढ़ आप को दो तगड़े झटके लगे जब उसके दो दिग्गजों, आशुतोष और आशीष खेतान ने उसे अलविदा कह दिया. आप नेता पहले भी पार्टी छोड़ते रहे हैं लेकिन इस बार दोनों नेताओं ने व्यक्तिगत कारणों से पार्टी छोड़ी है.
दोनों पेशे से पत्रकार रह चुके हैं पर खेतान अब वकील के तौर पर अपनी नई पारी शुरू करने वाले हैं. उन्होंने अपने फैसले से पार्टी को पहले भी कई बार अवगत कराया था और इसी के चलते अप्रैल में उन्होंने दिल्ली डायलॉग ऐंड डेवलपमेंट कमिशन से इस्तीफा देकर जनहित के मुद्दों को अदालत में उठाने की मंशा जाहिर की थी. उन्होंने बताया, ‘‘फिलहाल दिल्ली हाइकोर्ट में प्रैक्टिस करूंगा. एलएलएम करने के बारे में बाद में सोचा जाएगा.’’
आशुतोष ने निजी कारणों से पार्टी छोड़ने की बात जरूर कही है लेकिन पार्टी के भीतर एक वर्ग उनके आप से जाने को राज्यसभा सीट से जोड़कर देख रहा है. पार्टी की राजनैतिक मामलों की समिति (पीएसी) के सदस्य 53 वर्षीय आशुतोष जनवरी में राज्यसभा में गुप्ता बंधुओं को भेजे जाने के बाद से ही अनमने थे.
उनके इस्तीफे के बाद पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट करके कहा, ‘‘हम कभी भी आपका इस्तीफा कैसे मंजूर कर सकते हैं. ना, इस जन्म में तो नहीं. सर, हम सब आपको बहुत प्यार करते हैं.’’ जहिर है, पार्टी अपने स्तर पर इस्तीफा स्वीकार नहीं कर रही है.
आप के मुख्य प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने इंडिया टुडे से कहा, ‘‘इन दोनों ने इस्तीफा दिया है पर पार्टी ने मंजूरी नहीं दी है. पार्टी कोशिश करेगी कि दोनों वापस आ जाएं.’’ लेकिन आशुतोष ने इससे जुड़े लिखित सवाल के जवाब में कहा, ‘‘मैं पार्टी में वापस नहीं आऊंगा.’’
इससे पहले 29 अगस्त को आशुतोष ने ट्वीट किया, ‘‘पत्रकारिता के पूरे करियर के दौरान कभी मेरी जाति या सरनेम किसी ने नहीं पूछा पर 2014 के लोकसभा चुनाव में आप कार्यकर्ताओं से परिचय कराने के दौरान मेरे सरनेम पर काफी जोर दिया गया.’’
पार्टी सूत्रों का कहना है कि ऐसा जातिगत वोट बटोरने के लिए किया गया क्योंकि उनके चुनाव क्षेत्र में उनकी जाति के वोटर काफी हैं. आशुतोष के इस बयान को आप पर हमला माना गया पर उन्होंने ट्वीट को गलत समझे जाने के साथ ही खुद को पार्टी अनुशासन से मुक्त बताया.
पार्टी की वेबसाइट पर प्रवन्न्ताओं की सूची में खेतान और आशुतोष के साथ कुमार विश्वास का नाम भी शामिल है. लेकिन विश्वास की पार्टी से दूरी इतनी बढ़ चुकी है कि उसका खत्म होना अब नामुमकिन लगता है. इससे पहले प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव जैसे अण्णा आंदोलन के वक्त के साथी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व को चुनौती देने के चक्कर में पार्टी से जुदा हो गए थे.
आप की राजनीति पर नजर रखने वाले राजनैतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘‘पहले जो नेता गए वे लड़कर गए, पार्टी पर कब्जा और नियंत्रण का झगड़ा उसकी वजह थी. लेकिन इन दोनों का मामला निजी वजहों से जुड़ा हुआ है.’’ दुबे के मुताबिक, यह कयास है कि आशुतोष ने राज्यसभा टिकट की वजह से पार्टी छोड़ी है.
दिल्ली के बाद आप के दूसरे सबसे बड़े गढ़ पंजाब में भी पार्टी को गुटबाजी का सामना करना पड़ रहा है. पंजाब विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी आप में सुखपाल सिंह खैरा के नेतृत्व में बागी विधायकों का गुट सक्रिय है.
हालांकि सदन में नेता प्रतिपक्ष हरपाल चीमा ने इंडिया टुडे से कहा, ‘‘उन्होंने वक्त मांगा, हमने उन्हें टाइम दिया, वे विधानसभा में हमारे मुद्दे पर बोले. बातचीत चल रही है. जल्द ही मतभेद दूर कर लिए जाएंगे.’’ आप के लिए पंजाब के सांसदों-विधायकों को नियंत्रण में रखना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है.
जहां तक दिल्ली का सवाल है, संक्चया बल और संगठन की ताकत के लिहाज से आप अपनी विरोधी पार्टियों से आगे नजर आती है लेकिन तब तक जब तक कि उसके नेता एकजुट हैं.
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