सोना भी फौलाद का

स्टार मुक्केबाज लवलीना बोरगोहैन 2026 के एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने के बाद अपने सफर और भारतीय मुक्केबाजी के उभार पर

स्टार मुक्केबाज लवलीना बोरगोहैन (फोटो- रॉयटर)

•एशियाई खेलों में गोल्ड अपने लक्ष्यों में से एक रहा होगा. मकसद पूरा होने पर कैसा लग रहा है?

सच कहूं तो एशियाड में खेलते हुए मुझे बहुत मजा आया. पिछली बार के रजत पदक का रंग सुनहरा करने की बात मेरे जेहन में तो थी. अब ओलंपिक वाले पदक का भी मुझे इसी तरह से रंग बदलना है.

•राष्ट्रमंडल और एशियाई खेल दोनों में धाकड़ मुक्केबाजों की पूरी जमात है. क्या आपको लगता है कि महिला बॉक्सिंग में भारत एक बड़ी ताकत बन गया है?

बिल्कुल. इसमें दो राय नहीं. मैं तो कहूंगी कि महिला, पुरुष दोनों वर्गों के मुक्केबाज कमाल का प्रदर्शन कर रहे हैं. आइची-नगोया में बॉक्सिंग मेडल टेबल में तो हम शीर्ष पर रहे ना ! इंडियन बॉक्सर अब कॉम्पेटीटिव माइंडसेट के साथ उतरते हैं. हमारे पास अच्छी सुविधाएं, ट्रेनिंग पार्टनर, बढ़िया कोच और इंटरनेशनल एक्सपोजर भी है. अब हम खेलने जाएं तो दूसरे देश गंभीरता से लेते हैं क्योंकि हमारे पास हर श्रेणी में खासे दमदार मुक्केबाज हैं.

•आप लगातार दो ओलंपिक का हिस्सा रही हैं. 75 किलो वाली श्रेणी में आपको हरा पाना मुश्किल है. अपने खेल में इतने लंबे समय तक शीर्ष पर बने रहने का क्या राज है?

मुझे तो पता नहीं चला कि बॉक्सिंग शुरू किए हुए मुझको 15 साल हो गए. सफर आसान नहीं रहा. रास्ते में कितना कुछ खोना पड़ा. मानसिक रूप से आपको बेहद सशक्त होना होता है. मुझे लगता है मुझमें वह संकल्पशक्ति और मुकाबले में पिछड़ने के बावजूद कभी न हार मानने वाला एटीट्यूड है.

•आप और मीराबाई चानू ऐसी खेल आइकन हैं जिनसे हर बार पदक लेकर आने की उम्मीद की जाती है. कंधों पर यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी नहीं है?

हम में कुछ तो होगा, तभी तो हर बार हमें पदक की तगड़ी दावेदार के रूप में देखा जाता है. ‌और इसीलिए हम कभी भी इसे हल्के में नहीं लेते. पहले तो पूर्वोत्तर के लोग खेल में किसी तरह की जगह पाने के बारे में कल्पना भी नहीं कर पाते थे. लेकिन अब नई पीढ़ी इसे लेकर जागरूक है. उसे ओलंपिक और एशियाई खेलों के बारे में अच्छी तरह से पता है. मां-बाप भी अब बच्चों को खेल में हाथ आजमाने का मौका देने में यकीन करने लगे हैं.

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