वापसी एक खानसामे की
खानसामा गगन आनंद ने भारत में खोला अपना पहला रेस्तरां. पढ़िए बंदीप सिंह से उनकी खास बातचीत

• सालों तक आपको लगता रहा कि भारत में आपके लिहाज से अनुकूल माहौल नहीं. अब आप लौट आए हैं और दिल्ली में रागा खोल दिया है. तो क्या भारत बदल गया या फिर आप?
दोनों. शुक्र है. दिल्ली के शौकीन मिजाज दुनिया घूमते हुए अलग-अलग जायके टेस्ट कर बढ़ी उम्मीदों के साथ लौट रहे हैं.
यहां के नौजवान खानसामे मुझमें खासी जिज्ञासा जगा रहे हैं. उनके साथ पकाते, सीखते और मौज लेते हुए इस तहजीब का हिस्सा बनना चाहता हूं.
• आप जानी-पहचानी झालमुड़ी या नल्ली निहारी को रत्ती-रेशा करके फिर इकट्ठा रख देते हैं. किसी व्यंजन से जुड़ी स्मृतियों में कुछ नया खोजने-जोड़ने और उसके मूल स्वरूप को ही नष्ट कर डालने में कोई फर्क है या नहीं?
देखिए, असली परख तो आपके मुंह में होती है. आप उस चीज का आकार, टेंपरेचर, टेक्सचर बदल सकते हैं पर कुछ तो है जो कनेक्ट करता है.
किसी स्वाद को पहचानते ही आपके चेहरे पर कैसी स्माइल आती है! किसी लजीज व्यंजन का मैं 10 मिनट तक बखान करूं, फिर भी आपको न भाए तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है ना!
• आपना खाना हमेशा दिलोदिमाग को छूने वाला होता है. पर कोई बगावती चीज पॉपुलर हो जाए तो वह मुख्य धारा ही बन जाती है. गगन आनंद खुद से कैसे बगावत करते हैं भला?
मुझे कामयाब बनाने वाली चीजों पर सवाल खड़े करके. सभी जब आपसे अप्रत्याशित की अपेक्षा करने लगें तो वह भी प्रत्याशित ही हो जाता है. आप चाहें तो खुद को रोज दोहराते रहें. मैं ऊब जाता हूं.
• राग जैसा म्यूजिकल आइडिया रागा के मेन्यू को किस तरह से आकार देता है?
खाने के बारे में मैं म्यूजिकली सोचता हूं: उसकी शुरुआत, तैयारी के साथ उठान. और ठहराव. 22 चीजों को एक सुर में आना होता है. क्रम बिगड़ने से किसी भी शानदार डिश का सत्यानाश हो सकता है.