और अब ‌गांधारी

अभिनेत्री तापसी पन्नू नेट‌फ्लिरक्स पर रिलीज अपनी नई ऐक्शन फिल्म गांधारीं, स्त्री प्रधान फिल्मों की चुनौतियों और अपनी साफगोई के बारे में

अभिनेत्री तापसी पन्नू (फोटो- बंदीप सिंह)

• बेबी (2015) और नाम शबाना (2017) जैसी ऐक्शन फिल्में करने के अरसे बाद आप इस जॉनर में वापसी कर रही हैं.

करना तो चाहती थी पर सोच यही थी कि ऐसा कुछ करने को मिले जो पहले न किया हो. ऐक्शन फिल्मों में अमूमन शारीरिक दमखम दिखाना होता है लेकिन गांधारी में इमोशनल ऐक्शन है. दुनिया भर की बलाएं उस पर टूटती हैं लेकिन वह उन सबका सामना करती है. शारीरिक दक्षताओं के कोण से मातृत्व को हमेशा ही कमतर करके आंका जाता रहा है. आपको अंदाजा भी नहीं है कि मां अपनी उस भूमिका में किस हद तक जा सकती है.

• लेखिका (इस फिल्म की प्रोड्यूसर और क्रिएटर भी) कणिका ढिल्लों के साथ यह आपकी छठी फिल्म है. आखिर क्या है इस जोड़ी का राज?

कणिका और मैं एक दूसरे को निजी स्तर पर भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं. हम दोनों को एक-दूसरे की क्षमताओं के बारे में भी पता है कि हम क्या पाने में सक्षम हैं और हमारी चुनौतियां क्या हैं.

• आपकी दूसरी कई फिल्मों की तरह गांधारी के नैरेटिव में भी स्त्री केंद्र में है.


देखिए, बनी-बनाई धारणाओं के चलते फीमेल लीड वाली फिल्मों के लिए सफर अब भी आसान नहीं. उनका बजट हमेशा टाइट होता है. कभी किसी प्रोड्यूसर ने नहीं कहा कि आप फिक्र मत करो, बहुत बजट है. मैं तो हमेशा कहती हूं कि हमारी पूरी फिल्म का बजट एक अकेले पुरुष स्टार की सैलरी के बराबर होता है.

आप हमेशा अपनी बेबाकी और साफगोई के लिए जानी जाती रही हैं.

पर धीरे-धीरे मैं खिलाफ नजर आने वाले दृष्टिकोण को भी समझना सीख रही हूं. मुझे नहीं लगता कि खुद को लेकर आश्वस्त और अपनी हां, ना में पूरी तरह से स्पष्ट स्त्रियों को लोग पसंद करते हैं. हफ्ते में एक बार तो मुझे सुनने को मिल ही जाता है कि ‘‘मुझसे निबटना कठिन है’’ मुझे तो लगता है, मुझ पर कोई किताब लिखी गई तो उसका शीर्षक ही होगाः ‘‘आएम डिफिकल्ट’’, मुझसे निबटना मुश्किल है.

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