"ऐक्टिंग और इंजीनिय‌‌रिंग दोनों में जिज्ञासा और समस्या हल करने का गुण होना चाहिए"

अभिनेता अमोल पराशर ने आआइटी डिग्री के बावजूद अभिनय का चुनाव करने और अपनी ताजा वेब सीरीज ग्राम चिकित्सालय के बारे में इंडिया टुडे मैगजीन से खास बातचीत की है

Q+A
अमोल पराशर

अभिनय के वास्ते आपने आइआइटी डिग्री और कॉर्पोरेट करिअर को लात मार दिया. किस भरोसे पर आपने यह छलांग भरी थी?

बाहर से मैं ज्यादा आश्वस्त था. उस ओर पहुंचा तो वैसा था नहीं. आइआइटी डिग्री ने मुझे एक सुरक्षा कवर दिया. ऐक्टिंग और इंजीनिय‌‌रिंग में फर्क क्या है भला? दोनों में जिज्ञासा होनी चाहिए, समस्या हल करने का गुण और लगातार सीखते रहने की चाहत.

ग्राम चिकित्सालय के नए सीजन के बारे में क्या राय है?

इस स्क्रिप्ट में जज्बाती गहराई है. आम आदमी कैसे हमारे हीरो हो सकते हैं, यह उसी की ईमानदार कहानी है. इस सीजन में रिश्ते और गहराई से उभरे हैं. चाहे वे लोग हों, गांव हो या चुनौतियां, सब में कई-कई परतें नजर आती हैं. यह गुदगुदाती है, इसमें गरमास है पर यह कुछ कड़े सवाल भी करती है, वह भी उपदेश दिए बगैर.

बेशरम आदमी के जरिए आपने सोलो प्ले में भी खुद को आजमाया है. स्टेज ऐसा क्या देता है आपको जो फिल्में और वेब सीरीज नहीं दे पातीं?

स्टेज बेहद सकारात्मक अंदाज में आपको डराता है. वहां कोई कट नहीं, कोई रीटेक नहीं, न ही कोई एडिटर बैठा है जो आपको बचाने आएगा. धड़कती सांसों के साथ एक ही जगह आप भी हैं और ऑडियंस भी.

वहां एकदम वहीं जो घट रहा है वह एक नशा है. हर ऑडियंस के साथ हर शो भी भिन्न है. कई बार वे ऐसी जगह हंस पड़ेंगे जहां आपने सोचा भी न था, और कभी उन्हीं मौकों पर वे एकदम सन्नाटा साध लेंगे. आप उस चुप्पी पर भी भरोसा करना सीखते हैं.

सिनेमा को देखने का आपका नजरिया किसी अभिनेता का काम देखने के बाद बदला या किसी फिल्मकार ने वह दृष्टि बदली?

मेरा नजरिया दरअसल उन लोगों को देखते हुए विकसित हुआ है जो अपने काम में बेहद ईमानदारी बरतते हैं. अभिनय की सबसे बड़ी पाठशाला तो जिंदगी है. आप जितना देखेंगे, बातें करेंगे, जितना सफर करेंगे, नाकाम होंगे, प्यार में पड़ेंगे और दिल तुड़वाएंगे, उतने ही मालदार होते जाएंगे. टेक्नीक की अहमियत है पर जज्बात का कोई मुकाबला नहीं.

— दीपा नटराजन लोबो.

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