"पिछले दसेक साल में अच्छे नाटकों की मांग तेजी से बढ़ी है"

चर्चित रंगकर्मी रजत कपूर के निर्देशन में तैयार, आद्यम थिएटर के ताजा नाटक 'द ‌थिंग विद फेदर्स' का प्रीमियर आठ अगस्त को मुंबई में हो रहा. इंडिया टुडे हिंदी पर इस बारे में रजत कपूर से खास बातचीत पढ़िए.

‌Q+A,
रजत कपूर

आपके ताजातरीन नाटक 'द ‌थिंग विद फेदर्स' के पीछे की प्रेरणा आखिर क्या है?

मैं बीसवीं सदी के पहले 50 वर्षों की पृष्ठभूमि वाला कोई मजमून करना चाहता था. यह नाटक रिसर्च और इंप्रूवाइजेशन की प्रक्रिया में तैयार हुआ. पिछले तीसेक साल से मेरी यही प्रोसेस है. मैं स्क्रिप्ट के साथ शुरू नहीं करता—मेरे पास एक विचार होता है और उसकी एक इमेज. उस पर ऐक्टर्स कुछ काम करते हैं और फिर वहां से हम उसका पूरा ताना-बाना रचते हैं.

उसकी कहानी आज के समय के फ्रेम में किस तरह से और कितनी प्रासंगिक है?

आज के समय में तो इतिहास का कोई भी कालखंड मौजूं है. वे 50 साल काफी कुछ आज के समयकाल जैसे ही हैं. बीसवीं सदी की शुरुआत में भी टेक्नोलॉजी ने इसी तरह की तरक्की की थी. इस लिहाज से उस कालखंड में हमने जबरदस्त छलांग लगाई. बिजली, ऑटोमोबाइल, रेडियो, टेलीग्राम, एक्स-रे और जहाजों का आविष्कार उसी दौर में तो हुआ.

रंगमंच किस तरह से इतिहास को मानवीय संवेदनाओं के साथ जोड़ता है?

नाटक हो, किताब या फिल्म—कोई भी आर्ट फॉर्म, जिस दुनिया में हम रह रहे हैं उसको हमें नई रौशनी में दिखाता है. कोई ऐतिहासिक नाटक तथ्यों और गिनती के बारे में नहीं हो सकता क्योंकि इन्सानी किस्से ज्यादा ताकतवर होते हैं. जब हम देखते हैं कि कोई चीज मनुष्यों पर किस तरह से असर करती है तब हम उसे सही मायनों में समझते हैं.

देश में आज के दौर में थिएटर की स्थिति के बारे में क्या कहेंगे?

पिछले दसेक साल में अच्छे नाटकों की मांग तेजी से बढ़ी है. खासकर बड़े शहरों में लोगों के पास ज्यादा डिस्पोजेबल इन्कम आई है, जिससे वे नाटक, स्टैंड-अप कॉमेडी और कंसर्ट्स वगैरह देखने-सुनने पर खर्च कर पा रहे हैं.

— नेहा किरपाल

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