मेरी फिल्म ने हिंसा नहीं भड़काई, पंजाब को एक किया
सतलज फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की इंसाफ की लड़ाई और बाद में उनकी मौत की सीबीआइ जांच के बारे में है. इस फिल्म की पायरेटेड प्रतियां व्हाट्सऐप, टेलीग्राम चैनलों, टॉरेंट्स और यूट्यूब पर घूमने लगीं.

फिल्मकार हनी त्रेहन बीते तीन साल से बस इतना चाहते थे कि पंजाब’95 के नाम से बेहतर जानी गई उनकी फिल्म रिलीज हो जाए. उनकी यह फिल्म केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के साथ अंतहीन जंजाल में फंसी थी. सो, त्रेहन और उनके प्रोड्यूसर रॉनी स्क्रूवाला ने अंततः सिनेमाघरों में फिल्म को रिलीज करने का इरादा छोड़ दिया और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ज़ी5 का विकल्प चुना, जहां सेंसर प्रमाणपत्र होना अनिवार्य नहीं है.
वहां भी त्रेहन का सपना ज्यादा सांसें नहीं ले सका. महज दो दिनों के भीतर फिल्म को भारत में इस स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया. कुछ दिनों बाद सरकार ने फिल्म पर रोक की वजह बताते हुए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 69ए का हवाला दिया, जो “भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा” के साथ “राज्यसत्ता की सुरक्षा” का जिक्र करती है. ज़ी5 ने दुनिया के किसी भी हिस्से से फिल्म देखने पर भी रोक लगा दी.
मगर उन 48 घंटों में त्रेहन की मन बांध लेने वाली इस असरदार फिल्म ने अपने दम पर नई जिंदगी और पहचान हासिल कर ली. फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की इंसाफ की लड़ाई और बाद में उनकी मौत की सीबीआइ जांच के बारे में है. उसकी पायरेटेड प्रतियां व्हाट्सऐप, टेलीग्राम चैनलों, टॉरेंट्स और यूट्यूब पर घूमने लगीं.
डिप्टी एडिटर सुहानी सिंह के साथ बातचीत में त्रेहन बता रहे हैं कि सीबीएफसी के साथ उनकी जद्दोजहद कैसे चली और कैसे उन्होंने भी खालड़ा की तरह ही झुकने से इनकार कर दिया. उन्होंने अपनी फिल्म के लगातार हो रहे असर के बारे में भी विस्तार से बताया. बातचीत के अंश:
●वह क्या एहसास था जिससे आपने जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष और जिंदगी पर रोशनी डालने का फैसला किया?
मैं तरनतारन में पला-बढ़ा और छठी क्लास तक वहीं पढ़ा. मैंने अपने नाते-रिश्तेदारों और पास-पड़ोस के लोगों को इससे गुजरते देखा. मैं जब बच्चा था, तभी मैंने खालड़ा जी के बारे में सुना था. वह इंप्रेशन (एहसास) रह जाता है. आप बड़े हो जाते हैं, फिल्मकार बन जाते हैं और आपको कुछ निश्चित कहानियां मिलती हैं और आप सोचते हैं, क्यों न कुछ ऐसा बनाया जाए जो पंजाब को समझ आए?
समय आ गया है जब राज्य में कुछ गंभीर सिनेमा हो, जो बातचीत की राह खोल सके. खालड़ा जी पंजाब के हालिया इतिहास के सबसे बड़े शहीदों में से एक हैं. मेरी निजी राय में उनका बलिदान उतना ही बड़ा है जितना भगत सिंह का था. वे उनके बड़े अनुयायी थे. हमारे यहां उनकी तरह के लोग हैं, जिनकी जिंदगी और सफर इतना प्रेरणादायक था, जो दूसरों के लिए लड़ते हुए इतने नि:स्वार्थ ढंग से जिए, तो मुझे लगा कि उनकी स्टोरी लोगों को पता होनी चाहिए.
●इस भूमिका के लिए दिलजीत को लेने के बारे में हमें बताइए.
जनवरी 2021 में मैंने दिलजीत दोसांझ को मैसेज किया, “पाजी, कहां हो? अमेरिका या भारत?” उन्होंने कहा कि भारत में हैं लेकिन रात में अमेरिका के लिए निकल रहे है. मैंने कहा कि मुंबई में बस आधे घंटे के लिए मुझसे मिलें. फ्लाइट से पहले उनके पास बहुत कम वक्त था, लेकिन वे आए.
मैंने उनसे कहा कि मैं पंजाब पर फिल्म बनाना चाहता हूं लेकिन उसकी पृष्ठभूमि 1984 के बाद की रखना चाहता हूं, क्योंकि लोगों को लगता है कि ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद कुछ नहीं हुआ. दोसांझ ने कहा कि कुछ कहानियां रही हैं, लेकिन जो बनाई जानी चाहिए, वह खालड़ा नाम के इस शख्स के बारे में है. उन्होंने कहा, “पाजी, क्या लाइफ रही उनकी, कितनी बड़ी शहादत है उनकी.”
उन्होंने बताया कि उन्होंने इसके अधिकार हासिल करने की कोशिशें कीं, लेकिन मिले नहीं. मैं मुस्करा रहा था और उनकी तरफ देखा. उन्होंने वह कहा जो मेरे मन में था. उन्होंने यह रोल निभाने के लिए फीस बताने से इनकार कर दिया. उन्हें लगा कि इतनी यादगार शख्सियत को निभाने के लिए रकम मांगना शर्म की बात होगी. फिर भी, मेरे प्रोड्यूसर ने उन्हें भुगतान किया.
●नाम पंजाब ’95 से बदलकर सतलज क्यों किया?
वर्किंग टाइटल घल्लूघारा था. पंजाब ’95 नाम से फिल्म टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में पेश गई, जहां उसका वर्ल्ड प्रीमियर 2023 में होना था. जब फिल्म ज़ी5 पर रिलीज होने वाली थी, मेरे पास प्रोड्यूसर का कॉल आया कि वे फिल्म का टाइटल बदलना चाहते हैं.
मैंने कहा, हम सतलज रख सकते हैं क्योंकि यह टाइटल भी हमारे पास रजिस्टर्ड है. मुझे यह नदी हमेशा फिल्म से गहरी जुड़ी लगती है. गुमनाम शव उसी में फेंके गए. उनमें खालड़ा का शव भी था. यह टाइटल फिल्म के साथ प्राकृतिक न्याय करेगा. हमने ज़ी5 को नए नाम की पेशकश की. उन्होंने यही रखने का फैसला किया.
फिल्म के कसीदे पढ़े जा रहे हैं और काफी आलोचना भी हो रही है. आलोचकों का कहना है कि यह कहानी का केवल एक पहलू दिखाती है और केवल पंजाब के विद्रोह के बारे में है. आप क्या कहेंगे?
मैं फिल्मकार हूं, मैं न क्रिमिनल हूं और न पॉलिटिशियन. मैंने उस किरदार के बारे में फिल्म बनाई, जिसमें मैं यकीन करता हूं. तीन साल तक जब हमें सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला, हमसे कहा गया कि इससे पंजाब में कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा होगा. अब जब फिल्म रिलीज हो गई है, उसने किया यह कि पूरे राज्य को धर्म, जाति और हैसियत से ऊपर उठकर एक साथ ला दिया.
जो हिंसा को उकसावा दे रहे हैं, उन्हें ही लोगों के एक होने से परेशानी है; वे ही कहते हैं कि “पंजाब के हिंदुओ, तुम कब जागोगे?” यह बयान सार्वजनिक है. लोग तय कर सकते हैं कि कौन इतिहास की गलत तरफ है. अगर उन्हें लगता है कि सतलज एकतरफा कहानी है, तो वे दूसरी तरफ की कहानी पर फिल्म बनाने के लिए पूरी तरह आजाद हैं. यह आजाद देश है और यहां अभिव्यक्ति की आजादी है.
●क्या आपको पता है कि ज़ी5 ने फिल्म क्यों वापस ले ली? क्या सरकार की तरफ से दबाव था?
ज़ी5 से फिल्म हटाने के लिए कहा गया. उसे सूचना-प्रसारण मंत्रालय का पत्र मिला, जिसमें हटाने की वजह विषय की संवेदनशीलता और राष्ट्रीय सुरक्षा को बताया गया. फिर सरकार ने समिति बनाई और उसने दो दिन बाद प्लेटफॉर्म को लिखा कि रोक जारी है.
●आपने बताया है कि सीबीएफसी ने 127 कट के लिए कहा. आपको कैसे लगा कि वे फिल्म की रिलीज को रोकना चाहते थे?
हम फिल्म को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में भेजना चाहते थे. हमने जल्द सेंसर सर्टिफिकेट हासिल करने का फैसला किया और 2023 की शुरुआत में उसे सीबीएफसी को भेजा. उन्होंने जवाब में 21 कट सुझाए, जिसका कोई मतलब हमें समझ नहीं आया. इसलिए हमने बंबई हाइकोर्ट जाने का फैसला किया.
जब सुनवाई चल रही थी, हमें पता चला कि फिल्म टोरंटो के लिए चुन ली गई है. बाद में मेरे प्रोड्यूसर रॉनी के पास फोन आया, जिसमें उनसे मामला हाइकोर्ट से और साथ ही टीआइएफएफ से वापस लेने और अदालत के बाहर निबटारा करने के लिए कहा गया.
बदकिस्मती से अदालत के बाहर निबटारे की प्रक्रिया ढाई साल चली और कांटछांट 21 से बढ़कर 127 हो गए. इसीलिए अंततः हमें लगा कि यह बेमतलब कवायद है और वे महज टालमटोल कर रहे और फिल्म की रिलाज को रोक रहे हैं.
‘‘लोग तय करेंगे कि कौन इतिहास की गलत दिशा में खड़ा है. अगर उन्हें लगता है कि सतलज में एकतरफा वृतांत है तो वे अपनी फिल्म बनाने को स्वतंत्र हैं. यहां अभिव्यक्ति की आजादी है.’’