"जब आप अंदर से कुढ़ जाते हैं तो एक टूटन-सी आती है"
गीता और संजय चोपड़ा हत्याकांड से प्रेरित, प्राइम वीडियो सीरीज 'राख' में अली फजल ने एक पुलिसकर्मी की भूमिका शिद्दत से निभाई है. इंडिया टुडे से उन्होंने इस सीरीज के बारे में बातचीत की है.

● आपने साल की शुरुआत राख से की. बंटवारा 1947 आने वाली है. मिर्जापुर: द मूवी थिएटर में रिलीज होगी. ऐसा ही कुछ सोचा था आपने?
चीजें जिस तरह से आकार ले रही हैं, उसे लेकर मैं उत्साहित हूं. राख पर जिस तरह की प्रतिक्रिया मिली, उससे मेरा हफ्ता बन गया. इसने सिनेप्रेमियों और आम जनता, दोनों को अपील किया है. यह एक खास, सिनेमाई अंदाज में बनाई गई है और काफी डार्क भी है, इसलिए हमने नहीं सोचा था कि यह इस तरह पकड़ बनाएगी. हां, मिर्जापुर 2026 का एक बड़ा सामाजिक प्रयोग है (क्योंकि पहली बार किसी वेब सीरीज को थिएटर रिलीज के रूप में प्रीक्वेल मिलेगा).
● जयप्रकाश बहुत मजबूत ढंग से लिखा गया किरदार है. अभिनेता ऐसे ही कैरेक्टर्स के लिए मरते हैं ना!
जब आपको अपनी पूरी प्रतिभा और युक्ति के हिसाब से खेलने को मिलता है, तो मजा आता है. मैं खुशकिस्मत था क्योंकि मुझे याद है मैं मिर्जापुर: द मूवी की शूटिंग की तैयारी भी कर रहा था, जो आगे खिसक गई. मुझे लगा कि शारीरिक रूप से मैं जयप्रकाश के किरदार में फिट नहीं बैठ पाऊंगा. फिर मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी और सोचा कि यहां दांव लुक्स और ऐसी सतही चीजों से कहीं ज्यादा बड़ा है.
● आम तौर पर स्क्रीन पर पुलिस अधिकारियों में थोड़ा जलवा और धौंस-धमक होती है. राख में न कोई हीरोपंती है, न मोनोलॉग, न किसी व्यक्तित्व का प्रदर्शन. वह बस तालमेल बिठाने की कोशिश में लगा रहता है...
मैं मानता हूं कि इसे अलग तरह से भी निभाया जा सकता था. लेकिन जब आप अंदर से कुढ़ जाते हैं तो एक टूटन-सी आती है, जो कई तरह से बाहर आ सकती है. वर्दी के भीतर की घुटन को तलाशना जरूरी था.
● कई लोगों के लिए यह शो देखना खासा मुश्किल रहा है क्योंकि इसमें हिंसा और नैतिक पतन बहुत तीखे ढंग से दिखता है. यह असल जिंदगी के जिस मामले से प्रेरित है, वह तो परेशान करने वाला है ही.
मेरे लिए भी यह बहुत बोझिल था, खासकर इसे एक साथ देखना. एक बार में देखना मुश्किल था. मुझे रोक-रोककर देखना पड़ रहा था और बच्चों के माता-पिता के कविता पढ़ने वाले दृश्य के समय तो मैं फूट-फूटकर रो पड़ा. आखिरी एपिसोड में हम इस बात पर आते हैं कि क्या हो सकता था. यह उन दोनों बच्चों की वीरता को खूबसूरत श्रद्धांजलि है, जिन्हें हम जांच के दौरान अक्सर भूल जाते हैं.