"सपनों को जिंदा रखिए और जल्दी हार मत मानिए"

रस्किन बॉन्ड रिटायर होने के बिल्कुल भी मूड में नहीं हैं. अपने 92वें जन्मदिन पर कई किताबें बाजार में उतरने को लेकर उन्होंने इंडिया टुडे से एक्सक्लूसिव बातचीत की.

Q+A
रस्किन बॉन्ड

सवाल जवाब

रस्किन बॉन्ड फेस्टिवल का हासिल क्या हो सकता है?

मेरे पोते सिद्धार्थ ने मेरी साहित्यिक विरासत को विस्तार देने को अपना मिशन बना लिया है. उसने कुछ मित्र-दोस्तों के साथ रस्किन बॉन्ड फाउंडेशन शुरू किया है और कुछ आयोजनों में वे लोग पहले से साझेदार हैं.

स्टोनएक्स ग्लोबल के सहयोग से पहली बार उन्होंने मेरे लिए यह शो आयोजित किया. आंखें कमजोर होने के बावजूद मैं अपनी पोती सृष्टि की वजह से लिख पा रहा हूं जो बड़े प्यार से मेरे डिक्टेशन उतारती है.

क्या ऐसी भी कोई किताब है जिसे आप लिखना चाहते रहे हों पर कभी लिख नहीं पाए?

बिल्कुल नहीं. 16 की उम्र से शुरू करके 75 साल से मैं लिख ही तो रहा हूं. उस उम्र में भले मैं एक बड़ा उपन्यास लिखना चाह रहा था पर मुझे इलहाम हो गया कि मेरी प्रतिभा छोटे प्रारूप वाले फिक्शन के ज्यादा अनुकूल है, यानी कहानी या फिर उपन्यासिका.

अपनी सीमाओं में रहकर मैं लिखा-किया. मुझे कभी नहीं लगा कि मैंने मुझको एक लंबा मोटा उपन्यास लिखना चाहिए. लंबे मोटे उपन्यास मैं पढ़ता भी नहीं.

92 की वय में आपको लगता है कि उम्र बस एक संख्या है?

एक लिहाज से यह सच है. मैं किसी ओलंपिक में हिस्सा लेने तो जा नहीं रहा हूं. सर्जरी के बाद चलने-फिरने में अभी थोड़ी मुश्किल के अलावा मेरी सेहत वैसे अच्छी है. पिछले कुछेक साल से सेहत में गिरावट आई है वर्ना अपने भीतर मैं खुद को हमेशा 16 की उम्र वाला ही समझता रहा.

अपनी जिंदगी के कुछ सबक हमारे पाठकों से साझा करना चाहेंगे?

जल्दी हार मत मानिए. सपनों को जिंदा रखिए. इस बात का ख्याल रखिए कि आगे का रास्ता आसान कतई नहीं है. लेकिन जहां तक हो सके, पूरे विवेक और समझदारी से इसे पार कीजिए. और जितना बन पड़े, दूसरों की मदद कीजिए.

—अमित दीक्षित.

Read more!