''ऑपरेशन सिंदूर हमारी पहली नेटवर्क केंद्रित जंग थी"

भारत की सेना एक निर्णायक बदलाव के दौर से गुजर रही है. ऐसे में रिटायर होने से चंद दिनों पहले CDS अनिल चौहान ने इंडिया टुडे ग्रुप के एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और डिप्टी एडिटर प्रदीप आर. सागर से विविध पहलुओं पर विस्तार से बातचीत की.

 exclusive interview: gen. anil chauhan
जनरल अनिल चौहान

खास बातचीत जनरल अनिल चौहान

●ऑपरेशन सिंदूर से प्रतिरोधक ताकत और सैन्य कार्रवाई को लेकर देश की सोच कैसे बदली?
ऑपरेशन सिंदूर हमारे अनुभव में आए पहले के सैन्य अभियान या युद्ध-नीतियों से बुनियादी तौर पर अलग था. कई मायनों में यह हमारा पहला सही अर्थों में 'मल्टी-डोमेन’ या बहुपक्षीय ऑपरेशन था.

सेना के तीनों अंगों का यह एकीकृत अभियान था, लेकिन उससे भी बढ़कर हमने ऑपरेशन के ढांचे में साइबरस्पेस और सूचना युद्ध को भी शामिल किया. समन्वय का यह स्तर रातोरात तैयार नहीं हुआ था. यह पिछले तीन से चार वर्षों से सेना के तीनों अंगों के बीच तालमेल और एकीकरण की दिशा में की गई लगातार कोशिशों का नतीजा था.

इस ऑपरेशन के दौरान उसका इजहार शानदार ढंग से हुआ. सेना के तीनों अंगों के बीच समन्वय और आपसी समझ असाधारण थी. मेरे लिए यह ऑपरेशन इस बात का पुख्ता सबूत था कि एकीकरण और तालमेल की दिशा बिल्कुल सही है.
 
ऑपरेशन सिंदूर के सबसे बड़े सबक क्या थे?
एक तो रणनीतिक सबक यह है कि आज सभी देशों के लिए फौजी कार्रवाई ज्यादा आसान होती जा रही है क्योंकि टेक्नोलॉजी की मदद से बहुत सटीक हमले किए जा सकते हैं. उसमें नुक्सान भी कम होता है. पहले ऐसा करने में ज्यादा हिचकिचाहट होती थी क्योंकि युद्ध का मतलब होता था बड़े पैमाने पर तबाही और आम लोगों की मौत.

सटीक युद्ध-कौशल ने इस सोच को बदल दिया है. बावजूद इसके यह भले पता हो कि लड़ाई कैसे शुरू करनी है, लेकिन कई देश यह समझने में खुद को मुश्किल में पाते हैं कि इसे कब और कैसे रोका जाए. ऑपरेशन सिंदूर में हमारी जीत इसलिए हुई क्योंकि हमें पता था कि कब करना है. हमारे अपने अभियान का एक अहम पहलू यह था कि हमें पता था कि सही समय पर कैसे और कितनी कार्रवाई करनी है और कब पीछे हटना है.
 
आपको क्यों लगता है कि हमने ऑपरेशन सिंदूर में निर्णायक जीत हासिल की?
हमले से पहले इस ऑपरेशन के लिए जबरदस्त तैयारी की गई थी. खुफिया एजेंसियां, सैन्य खुफिया और अभियान की योजना बनाने वाले लगातार लक्ष्य की जानकारी अपडेट कर रहे थे क्योंकि आतंकवादी अपनी जगहें बदल रहे थे.

हर हमले के लिए सटीक जियोस्पेशल टारगेटिंग डेटा तैयार किया गया था. पूर्वी सेक्टर से संसाधन दूसरी जगहों पर भेजे गए, हवाई जखीरों और सेना की तैनाती की गई. शुरू से ही भारत का इरादा साफ था कि आतंकवादी ठिकानों पर सटीक जवाबी हमले करना, अपनी ताकत दिखाना और बेवजह तनाव बढ़ने से रोकना है.

हम ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि हमारे नेटवर्क बेहतर थे और हमें हालात की ज्यादा अच्छी जानकारी थी. हमें पता था कि हमने कहां हमला किया है, उसका क्या असर हुआ है. हमें यह भी पता था कि पाकिस्तानी हमले कब नाकाम किए गए. इससे हमें तनाव को काबू में रखने की क्षमता मिली. हम अपनी मर्जी से तनाव बढ़ा या घटा सकते थे क्योंकि दुश्मन के मुकाबले युद्ध क्षेत्र की हमारी समझ बेहतर थी.

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने बढ़त कैसे हासिल की?
हमने हमलों से पाकिस्तान के रडार सिस्टम को बुरी तरह नाकाम कर दिया. उन हमलों से उसके वायु सुरक्षा नेटवर्क के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो गईं. हमारे निशाने से बचने के लिए उसे अपने कई रडार बंद करने पड़े. पाकिस्तान एक मायने में 'अंधा’ हो गया था.

इससे भारत को पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में हमले करने के रास्ते मिल गए. पाकिस्तान को लगा कि उसके कई हमले कामयाब रहे हैं क्योंकि उसके पास युद्ध में हुए नुक्सान का सटीक आकलन नहीं था. असल में, ऑपरेशन के बाद, खबरों के मुताबिक, वे विदेशी एजेंसियों से तस्वीरें हासिल करने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि उन्हें जमीनी हालात की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं थी.

इस सूचना की बढ़त से मोर्चे पर हमारा हाथ ऊपर था. उसने बातचीत के लिए संपर्क साधा, तो उसे एहसास हो चुका था कि बढ़त भारत की है. यही मुख्य वजह थी कि उधर से फौरन युद्धविराम की मांग की गई. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि यह ऑपरेशन लंबे समय तक चलेगा लेकिन थोड़े ही वक्त में उसे एहसास हो गया कि उसके बेहद रणनीतिक क्षेत्र भी निशाने पर आ गए हैं और युद्ध की पूरी तस्वीर की कोई स्पष्ट समझ नहीं है.

पाकिस्तान ने दावा किया कि भारत को काफी नुक्सान हुआ. क्या यह सच है?
कोई भी युद्ध पूरी तरह से एकतरफा नहीं होता. हर लड़ाई में नुक्सान होता है. लेकिन नुक्सान तभी मायने रखता है, जब उससे मनोबल या अभियान क्षमता पर असर पड़े. हमारे मामले में ऐसा नहीं हुआ.

ऐसा कोई असर नहीं पड़ा, जिससे हम पीछे हटते. भारत का अभियान जोर-शोर से जारी रहा—विमान उड़ते रहे, हमले होते रहे और ऑपरेशन की रफ्तार तेज बनी रही. दूसरी ओर, पाकिस्तान अपने विमान नहीं उड़ा पाया क्योंकि वह ज्यादा से ज्यादा जमीन से मार करने वाले सिस्टम पर निर्भर हो गया था. भारत के आक्रामक हवाई हमले जारी रहे.
 
क्या यह फिक्र जेहन में थी कि पाकिस्तान एटमी हमले का सहारा ले सकता है?
ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला. भारत का सिद्धांत दो मुख्य बातों पर आधारित रहा है: 'पहले इस्तेमाल नहीं’ और 'जोरदार जवाबी कार्रवाई’. विडंबना यह है कि इस सिद्धांत से पारंपरिक सैन्य अभियान के लिए ज्यादा गुंजाइश बनती है क्योंकि पाकिस्तान जानता है कि अगर उसने एटमी हमला किया, तो हम उसके पूरे इलाके में जोरदार जवाबी कार्रवाई करेंगे.

हमने उन्हें कड़ा संदेश दिया है कि हर आतंकी हमले का असर उल्टा ही पड़ेगा. अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसने भारत के साथ पारंपरिक सैन्य असंतुलन को खत्म करने के लिए एटमी हथियार हासिल किए हैं, तो वह गलत है. भारत उसके आतंकी हमलों के जवाब में अपनी ताकत और गहराई को लगातार बेहतर कर रहा है, जैसा कि उड़ी, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर के जवाबी हमलों से जाहिर होता है. इसलिए, यह उसके लिए बड़ी चुनौती है.
 
क्या चीन ने लड़ाई में पाकिस्तान की सक्रिय रूप से मदद की?
इस मामले में तथ्य, वाजिब अनुमान और कुछ कयास हैं. तथ्य यह है कि आज पाकिस्तान के पास मौजूद करीब 70 फीसद सैन्य साजो-सामान चीन से मिला है. यह भी स्वाभाविक है कि युद्ध के समय मूल उपकरण निर्माता अपने उपकरणों के लिए तकनीकी सहायता देते हैं. आज कमर्शियल सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें आसानी से उपलब्ध हैं.

खुफिया जानकारी साझा करने का दायरा क्या हमले में मदद तक पहुंचा था, उसे साबित कर पाना मुश्किल है. ऐसे कुछ वाकए सामने आए, जिनसे संदेह पैदा हुए. मसलन, ऐसा लगा कि पाकिस्तान को भारतीय सेना की कुछ तैनाती की जानकारी थी, जिससे बाहरी खुफिया इनपुट मिलने की संभावना का संकेत मिलता है.

हालांकि, मुझे नहीं लगता कि ऐसी किसी जंग के दौरान चीन कोई दूसरा मोर्चा खोलेगा. मदद सीधे जमीनी युद्ध के बजाय तकनीक, खुफिया जानकारी, साइबर या रणनीतिक क्षेत्रों के जरिए मिली हो सकती है. भारत और चीन के बीच भविष्य में होने वाली कोई भी लड़ाई बड़े मोर्चे के बजाय सीमित क्षेत्र तक ही रहने की संभावना है.
 
2020 के गलवान घाटी में टकराव और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन की तरफ से बड़े पैमाने पर घुसपैठ की घटनाओं के बाद, क्या फिर वैसी ही स्थितियां पैदा होने का अंदेशा है? तब से अब तक जमीनी स्तर पर क्या बदलाव आया है?
एलएसी पर सैनिकों की तैनाती और निगरानी का स्तर बुनियादी तौर पर बदल गया है. पहले दोनों तरफ सैनिकों की तैनाती काफी कम हुआ करती थी. पहले गश्ती दल बेहद मुश्किल रास्तों—जंगलों, पहाड़ों और दूरदराज की पगडंडियों से होकर गुजरते थे, और अक्सर दोनों पक्षों का आपस में आमना-सामना भी नहीं होता था.

उन दिनों, गश्ती दलों को कभी-कभी सिर्फ ऐसे संकेत मिलते थे जिनसे पता चलता था कि दूसरा पक्ष उस इलाके से गुजरा है—जैसे सिगरेट के पैकेट, खाने के टिन, रम की बोतलें, पैरों के निशान या पीछे छोड़े गए अस्थायी संकेत. लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग है.

इन्फ्रास्ट्रक्चर में काफी सुधार हुआ है, सैनिकों की संख्या बढ़ी है, और तकनीक ने निगरानी की क्षमताओं को पूरी तरह बदल दिया है. अब वहां सेंसर, कैमरे, यूएवी और बेहतर निगरानी प्रणालियां मौजूद हैं. नतीजतन, सीमा पर होने वाली गतिविधियों के बारे में दोनों पक्ष कहीं ज्यादा जागरूक रहते हैं.

एलएसी पर इस बेहतर निगरानी प्रणाली का क्या असर है?
उसकी वजह से आमने-सामने की मुठभेड़ों की आशंका स्वाभाविक रूप से बढ़ गई है. ऐसा कोई भी आमना-सामना सामान्य और सौहार्दपूर्ण बना रह सकता है, या फिर उस क्षेत्र की संवेदनशीलता और उस समय के हालात के आधार पर तनावपूर्ण भी हो सकता है.

यही वजह है कि भरोसा बहाली के उपाय, प्रोटोकॉल और अनुशासित सैन्य जुड़ाव तंत्र बेहद महत्वपूर्ण बने हुए हैं. सामरिक स्तर पर दोनों पक्षों के स्थानीय कमांडर और गश्ती दल दबाव में रहते हैं क्योंकि हर गश्ती दल अपनी क्षेत्रीय धारणा को स्थापित करने का प्रयास करता है. इसलिए स्थानीय घटनाओं को अनावश्यक रूप से बढ़ने देने से रोकने के लिए स्थापित प्रोटोकॉल और संचार माध्यमों को बनाए रखना अनिवार्य है.

एलएसी पर चीन के साथ सैनिकों को पीछे हटाने और तनाव कम करने के मामले में आज स्थिति क्या है?
कई जगहों पर सैनिकों को पीछे हटाने का काम हो चुका है, और सैनिक आमने-सामने की स्थिति से पीछे हट गए हैं. अगला चरण तनाव कम करना और आखिरकार 2020 के बाद तैनात की गई बड़ी संख्या में सेना को वापस बुलाना है. इस दिशा में कुछ हलचल पहले ही हो चुकी है, खासकर चीन की तरफ, जहां कुछ हमलावर टुकड़ियां कथित तौर पर अपने शांति-काल वाले ठिकानों पर लौट गई हैं.

हालांकि, सैनिकों की संख्या को लेकर व्यापक और औपचारिक सहमति—वैसी ही जैसी पहले के समझौतों में थी, जहां सैन्य अभ्यास और तैनाती को आपसी सूचना तंत्र के जरिए नियंत्रित किया जाता था—अभी भी कूटनीतिक और सैन्य बातचीत के जरिए बन रही है. अगर स्थिति स्थिर बनी रहती है तो समय के साथ सैनिकों की संख्या धीरे-धीरे और स्वाभाविक रूप से कम हो सकती है, क्योंकि दोनों पक्षों को लगेगा कि इतनी बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती अब जरूरी नहीं. लेकिन यह प्रक्रिया जमीनी स्तर पर लगातार स्थिरता और आपसी भरोसे पर निर्भर करेगी.

एलएसी पर बेहतर तैयारियों के बारे में क्या कहेंगे?
गलवान से एक और बड़ा सबक मिला कि बेहतर तैयारी और लंबे समय तक तैनाती की क्षमता का क्या महत्व है. पिछले कुछ वर्षों में हमने उत्तरी सीमा की ओर अपनी सेना का व्यापक स्तर पर पुनर्नियोजन किया है.

इसमें ऊंचे पहाड़ी इलाकों में लंबे समय तक तैनाती के लिए अतिरिक्त सैनिक, बख्तरबंद गाड़ियां, हवाई संसाधन, रसद की मदद, गोला-बारूद के भंडारण, रहने की व्यवस्था और बुनियादी ढांचे के विकास शामिल हैं. बड़ी संख्या में रिजर्व बल, राशन, गोला-बारूद और सर्दियों के लिहाज से जरूरी सामान का भंडारण करना और उसे निरंतर बरकरार रखना भी जरूरी था.

हमने कई सर्दियों के दौरान अभ्यास और तैनाती के माध्यम से कई सैन्य रणनीतियों को परखा. इसके साथ ही हमारी निगरानी और सूचना प्रणालियों में काफी सुधार हुआ है. सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास तेज हुआ है, सेना की आवाजाही बेहतर हुई है और ठीक मौके पर गतिविधियों पर नजर रखने की हमारी क्षमता आज कहीं अधिक मजबूत है. अभियान और साजो-सामान दोनों स्तरों पर, कुल मिलाकर तैयारियों का स्तर अब काफी ऊंचा है. उत्तरी सीमा पर बुनियादी ढांचे और क्षमताओं को मजबूत करने के प्रयास लगातार जारी हैं.
 
पाकिस्तान और उससे पहले चीन के साथ इन दो संघर्षों से और क्या प्रमुख बातें सीखने को मिलीं?
एक बात तो यह है कि युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है. पहले युद्ध प्लेटफॉर्म-आधारित होते थे—टैंक, विमान और जहाज अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते थे. आज युद्ध नेटवर्क-केंद्रित हो गए हैं. हर जगह सेंसर मौजूद हैं—सैटेलाइट, यूएवी, मोबाइल फोन, कैमरे, आम इन्फ्रास्ट्रक्चर की जानकारियां हमें ज्यादा सटीक और तेज गति से हमले करने में मदद करती हैं.

युद्ध का मैदान अब पूरी तरह खुला और पारदर्शी हो गया है. अब हम नेटवर्क-केंद्रित युद्ध से डेटा-केंद्रित युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं, और अंतत: हम एआइ-आधारित इंटेलिजेंस वार की ओर बढ़ रहे हैं. एआइ पुराने डेटा का विश्लेषण करके, संभावित नतीजों का अनुमान लगाकर और निर्णय लेने में सहयोगी बनकर कमांडरों की सहायता करेगा.

युद्ध का मैदान अब सिर्फ जमीन, समुद्र और वायु क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है. युद्ध में अब साइबर, अंतरिक्ष, सूचना क्षेत्र भी शामिल हो गए हैं. हवाई युद्ध के दायरे की ऊंचाइयां भी अब काफी बढ़ चुकी हैं—कम ऊंचाई पर होने वाले ड्रोन युद्ध से लेकर अंतरिक्ष के करीब काम करने वाले हाइपरसोनिक सिस्टम तक. समुद्री युद्ध में अब समुद्री तलहटी में होने वाला युद्ध भी शामिल है.

गजा जैसे संघर्षों से शहरों के अंदर और जमीन के नीचे सुरंगों में लड़ी जाने वाली जंग एक बड़ी सीख बनकर उभरी है. इसके साथ ही, निचला हवाई क्षेत्र अब ड्रोन, लड़ाकू ड्रोन और स्वचालित प्रणालियों से पूरी तरह भर गया है. भौतिक क्षेत्रों से परे पूरी तरह नए युद्धक मोर्चे उभरकर सामने आए हैं—साइबर, अंतरिक्ष, सूचना युद्ध क्षेत्र.

आधुनिक युद्ध अब सिर्फ भौतिक क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि सूचनात्मक, डिजिटल और मनोवैज्ञानिक क्षेत्रों में भी लड़ा जा रहा है. अगर हमारी सशस्त्र सेनाएं खुद को तेजी से इन बदलावों के अनुरूप नहीं ढालती हैं तो उनके पुराने पड़ जाने का खतरा बना रहेगा. इसलिए, आज हमारी सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ नए सिस्टम हासिल करना ही नहीं, इन बदलावों को समझना, सेना के तीनों अंगों के बीच तकनीकों को एकीकृत करना, सैनिकों को प्रशिक्षित करना और भविष्य के लिए सुनियोजित रूपरेखा तैयार करना भी है.
 
एक चिंता यह भी है कि बेशकीमती सैन्य अस्त्र-शस्त्रों को नुक्सान पहुंचाने के लिए सस्ते ड्रोन इस्तेमाल किए जा रहे हैं. भारत इस चुनौती से निबटने के लिए क्या कर रहा है?
यह बेहद महत्वपूर्ण बात है. लागत में सचमुच जमीन-आसमान का फर्क है—अगर सही तरीके से मुकाबला न किया जाए तो अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन कीमती निशानों के लिए खतरा बन सकते हैं. पहले हवाई अड्डे और अग्रिम पंक्ति के बुनियादी ढांचे का निर्माण उस दौर के विमानों और मिसाइलों की मारक क्षमता को ध्यान में रखकर किया जाता था.

लेकिन आज लंबी दूरी की मिसाइलों और ड्रोन की पहुंच काफी बढ़ गई है. इस बदलाव ने सैन्य ठिकानों की स्थिति, उनकी सुरक्षा और उनके अस्तित्व को बचाए रखने की पूरी सोच और इंतजामात को ही बदल दिया है. हम अपनी मर्जी से बुनियादी सुविधाओं को कहीं और नहीं ले जा सकते. हवाई क्षेत्र, लॉजिस्टिक्स केंद्र और ऑपरेशनल अड्डे भूगोल, जमीन की बनावट और रणनीतिक जरूरतों से जुड़े होते हैं.

इसलिए इसका जवाब सिर्फ रफ्तार नहीं, बल्कि मजबूती है. हमें एक बहु-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाना होगा. पहला, एक मजबूत काउंटर-यूएएस (ड्रोन-रोधी प्रणाली) और हवाई रक्षा नेटवर्क होना चाहिए, जो आने वाले ड्रोन और हवाई खतरों का पता लगा सके, उन पर नजर रख सके और उन्हें नष्ट कर सके. उसे निगरानी और हथियार प्रणालियों के कई स्तरों के साथ आपस में जोड़ना होगा.

दूसरा, परोक्ष सुरक्षा उपाय भी उतने ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं—जैसे दुश्मन की नजरों से छिपना, हथियारों और संसाधनों को अलग-अलग जगह रखना, मजबूत बंकर, भूमिगत सुविधाएं और बैकअप इंतजाम की व्यवस्था रखना. प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों उपायों को मिलकर काम करना होगा. तीसरा, हमें नागरिक और सेना के बीच बेहतर समन्वय और बुनियादी ढांचे के एकीकरण की आवश्यकता होगी.

कई मामलों में संसाधनों के सही उपयोग और मजबूती के लिए दोहरे उपयोग वाले बुनियादी ढांचे और नागरिक-सैन्य एकीकरण महत्वपूर्ण हो जाएंगे. अंतत: भविष्य के युद्धक्षेत्र में एकीकृत प्रणालियों की आवश्यकता होगी, जहां ड्रोन, हवाई रक्षा, निगरानी और कमान नेटवर्क एक ही पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में काम करें. तभी हम इन तेजी से विकसित होती तकनीक की वजह से सामने आ रही चुनौतियों का आक्रामक और रक्षात्मक, दोनों तरह से प्रभावी ढंग से मुकाबला कर पाएंगे.
 
आप थिएटर कमान सिस्टम की योजना बना रहे हैं. इसे लागू करने में देरी क्यों हो रही है?
सुधार सिर्फ प्रशासनिक नहीं है; बल्कि मूलत: युद्ध लड़ने के तरीके से जुड़ा है. चुनौती कभी वैचारिक सहमति की नहीं थी, बल्कि एकीकरण की थी. तीनों सेनाएं हमेशा अलग-अलग नेटवर्क, संचार प्रणालियों, रखरखाव प्रोटोकॉल और ऑपरेशनल संस्कृतियों पर काम करती रही हैं. इसका मतलब है कि पहले सेना के तीनों अंगों के अफसरों और कमांडरों में बिना रोकटोक एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने का आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति होनी चाहिए.

एकीकरण इसका अगला चरण है—जिसमें प्रणालियों, नेटवर्क, साजो-सामान और अभियान ढांचों को आपस में जोड़ना होगा, ताकि तीनों अंग एकजुट ताकत के तौर पर काम कर सकें. उसके बाद ही थिएटर कमान सही मायने में काम कर सकती है. पहले, हर सेना प्रमुख अपने-अपने क्षेत्र में उभरने वाले खतरों के लिए जिम्मेदार होता था.

लेकिन आधुनिक युद्ध अब बहु-क्षेत्रीय और बेहद जटिल हो गया है. अब जमीन, वायु, समुद्र, साइबर, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और सूचना ऑपरेशन आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं. अब कोई भी सेना अलग-थलग रहकर प्रभावी ढंग से युद्ध नहीं लड़ सकती. इसका एहसास होने से कई तरह की पुरानी अड़चनों को दूर करने में मदद मिली.

आज मैं कह सकता हूं कि आगे बढ़ने के तौर-तरीके पर तीनों अंगों में व्यापक सहमति है. कुछ मुद्दे अभी चर्चा में हैं लेकिन कुल मिलाकर ढांचा काफी हद तक तैयार हो चुका है. इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सिफारिशें पहले ही की जा चुकी हैं. मेरा मानना है कि औपचारिक मंजूरी मिल जाने के बाद थिएटर कमान करीब दो वर्ष के भीतर काम करने लग सकती है. हालांकि संचार और नेटवर्क एकीकरण में अभी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं.
  
आप अग्निवीर योजना का आकलन कैसे करेंगे?
हम आधुनिक युद्ध की जो परिभाषा देते हैं, उसके लिहाज से अग्निवीर योजना से बेहतर कोई और अवधारणा शायद ही हो. इससे सेना में हर चार साल में नए लोगों के आने का चक्र चलता रहता है.

पहले की व्यवस्था में हर सैनिक 15-16 साल तक काम कर सकता था लेकिन उसे उस स्तर का रोटेशन और तकनीकी अपडेट नहीं मिल पाता था; ऐसे में जब वह बदले माहौल वाले युद्ध के मैदान में लौटता, तो यह खतरा रहता था कि युद्ध की मौजूदा वास्तविकताओं से तालमेल न बैठा पाए.

अग्निवीर योजना के साथ, सेना में लगातार ऐसे नए जमाने के जवान शामिल होते रहते हैं जो उभरती तकनीकों और सिद्धांतों के साथ बेहतर तालमेल बैठा पाते हैं, और अनुभवी सैनिकों के साथ उनका तालमेल भी बना रहता है. इससे अनुभव और नए नजरिए से बेहतरीन संतुलन बनता है. सिद्धांत में आधुनिक युद्ध के लिए यह मजबूत मॉडल है, जहां परिस्थितियों के अनुसार ढलने की क्षमता और तेजी से सीखने की काबिलियत बेहद जरूरी है. यह व्यवस्था सेना के ढांचे में लगातार नयापन लाती है और सैद्धांतिक तौर पर इसे जरूर सफल होना चाहिए.

आप रक्षा खरीद से जुड़ी फौरी जरूरतों के साथ आत्मनिर्भरता का संतुलन कैसे बैठाते हैं?
आज आत्मनिर्भरता कोई अलग से हासिल किया जाने वाला लक्ष्य नहीं रह गई है बल्कि एक ऑपरेशनल जरूरत बन चुकी है. आधुनिक युद्ध  काल में आप सिर्फ साजो-सामान नहीं खरीदते; बल्कि पूरा इकोसिस्टम खरीदते हैं.

उस तंत्र पर किसी दूसरे देश का नियंत्रण हो तो अभियान की स्वतंत्रता के साथ-साथ सुरक्षा, अपग्रेड और अचानक हमला करने की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है. इसीलिए आत्मनिर्भरता सीधे तौर पर फौजी कार्रवाई और तैयारी के प्रभावी बने रहने से जुड़ी है. यह हमारे अपने नेटवर्क के एकीकरण, उसे अपग्रेड करने और नवाचार पर नियंत्रण से जुड़ी है.

इसका एक सुरक्षा पहलू भी है. नेटवर्क-केंद्रित युद्धक्षेत्र में सिस्टम लगातार डेटा बनाते और भेजते रहते हैं. बाहरी निर्भरता से स्वायत्तता और क्षमता पर रुकावटें आ सकती हैं. इसलिए भविष्य की सैन्य ताकत के लिए आत्मनिर्भरता बेहद जरूरी है.

हमें इस मामले में सतर्क और संतुलित नजरिया बनाना है. यानी खरीद फौरी जरूरतों के लिए अहम है मगर उसके पूरे तंत्र का नियंत्रण भी हमारे हाथ में होना चाहिए, तभी हम अपनी स्वायत्तता कायम रख सकेंगे.

यह तो पता होता है कि लड़ाई कैसे शुरू करनी है, लेकिन कई देश नहीं जानते होते हैं कि कब और कैसे रोकनी है. ऑपरेशन सिंदूर में हमारी जीत इसलिए हुई क्योंकि हमें पता था कि कब कार्रवाई करनी है और कब पीछे हटना है.

हमने पाकिस्तान के रडार सिस्टम को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया. उससे पाकिस्तानी फौज एक मायने में 'अंधी’ हो गई. भारत को पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में हमले करने के रास्ते मिल गए और बढ़त हमारी हो गई.

गलवान घाटी की झड़प के बाद एलएसी पर फौजी तैनाती बढ़ने, इन्फ्रास्ट्रक्चर और निगरानी में इजाफे से आमने-सामने मुठभेड़ की संभावनाएं बढ़ गई हैं, इसलिए चीन के साथ भरोसा बहाली के उपयों पर बातचीत जरूरी हो गई है.

पहले युद्ध प्लेटफॉर्म-आधारित होते थे—टैंक, विमान और जहाज अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते थे. आज युद्ध में साइबर, अंतरिक्ष और सूचना क्षेत्र भी शामिल हो गए हैं.

मेल की बात पहले माइंडसेट में बैठे. एकीकरण की बात उसके बाद आती है. आज जब लड़ाइयां नितांत जटिल किस्म की होती जा रही हों, ऐसे में अब कोई भी अकेली सेना अपने बूते पर प्रभावी ढंग से युद्ध नहीं लड़ सकती है.

अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसने भारत के साथ पारंपरिक सैन्य असंतुलन को खत्म करने के लिए एटमी हथियार हासिल किए हैं, तो वह गलत है. भारत उसके आतंकी हमलों के जवाब में अपनी ताकत और गहराई को लगातार बेहतर कर रहा है, जैसा कि उड़ी, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर के जवाबी हमलों से जाहिर होता है. इसलिए यह उसके लिए बड़ी चुनौती है.

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