बातचीतः हमें अपनी गलतियों को सुधारने की जरूरत है

बाइडन 22 अप्रैल को एक जलवायु शिखर सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं. उम्मीद है कि इसमें वे भारत सहित प्रमुख उत्सर्जक देशों के प्रमुखों को 2050 तक शुद्ध कार्बन उत्सर्जन शून्य करने की प्रतिबद्धता जताने को राजी करेंगे.

जॉन केरी
जॉन केरी

जो बाइडन प्रशासन ने इस साल जनवरी में पदभार संभालने के बाद सबसे पहले जो फैसले किए उनमें 2015 के पेरिस समझौते में फिर से शामिल होने का निर्णय था. उनके पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप ने नवंबर 2020 के अमेरिकी चुनाव से महज छह महीने पहले इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया था.

बाइडन 22 अप्रैल को एक जलवायु शिखर सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं. उम्मीद है कि इसमें वे भारत सहित प्रमुख उत्सर्जक देशों के प्रमुखों को 2050 तक शुद्ध कार्बन उत्सर्जन शून्य करने की प्रतिबद्धता जताने को राजी करेंगे. जलवायु पर अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत जॉन केरी पिछले हफ्ते भारत में थे. उन्होंने ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा के साथ इस मुद्दे पर एक्सक्लूसिव बातचीत की. उसके अंश:

आपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई प्रमुख कैबिनेट मंत्रियों से मुलाकात की और 2050 तक सभी देशों को कार्बन उत्सर्जन शून्य करने के लिए तैयार करने के अपने मिशन पर चर्चा की. इसमें भारत की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है?
भारत की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. सबसे पहले, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत एक अग्रणी लोकतंत्र हैं; एक विशाल राष्ट्र जो इसके मानवतावादी मूल्यों और पृथ्वी के साथ इसके रिश्ते और उसके प्रति जिम्मेदारी के लिए भी जाना जाता है.

भारत बहुत महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है क्योंकि एक देश के रूप में यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है—हमारा देश दूसरा सबसे बड़ा और चीन पहले नंबर पर है. इसलिए, हमारी विशेष जिम्मेदारी बनती है. हम तीनों दुनिया के उत्सर्जन के 50 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं.

इसलिए भले ही भारत का उत्सर्जन हमारे मुकाबले बहुत छोटा हो, आधे से भी कम, लेकिन हम सब को मिलकर काम करना होगा क्योंकि कोई भी राष्ट्र अकेला इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता. हर राष्ट्र को समाधान का हिस्सा बनना होगा. हम एक दूसरे पर निर्भर हैं.

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि भारत नवाचार, उद्यमशीलता के प्रयासों, अनुसंधान और विकास और इस तरह की कई अन्य खूबियों वाला देश है. हम नई प्रौद्योगिकियों की खोज में तेजी लाने के लिए अमेरिका और भारत के बीच एक साझेदारी में विश्वास करते हैं जिसकी जरूरत हमें जलवायु संकट से निबटने और अगले दस वर्षों में ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों से 450 गीगावाट बिजली उत्पादन की प्रधानमंत्री मोदी की बहुत आक्रामक और महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए, वित्त और अन्य चीजों के प्रबंध में होगी...हमें यही करने की आवश्यकता है.

आपने नेट जीरो (वास्तव में शून्य) का प्रस्ताव पीएम मोदी के सामने रखा तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?
वे बहुत उत्साहित थे और उन्होंने इस पर भरपूर समर्थन जताया. मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री ने साल 2030 के लिए एक लक्ष्य निर्धारित किया है और वे समझते हैं कि उनका लक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण है और वे इसे प्राप्त भी करना चाहेंगे. वे काम करने वाले नेता हैं. वे परिणाम चाहते हैं, बयानबाजी नहीं. इसलिए, हम इस साझेदारी को मजबूत करने और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जोर लगाने की कोशिश कर रहे हैं. उम्मीद है कि यह दुनिया के अन्य देशों के लिए एक उदाहरण बन सकता है.

अमेरिका अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौतों से जुड़ता और फिर उन्हें छोड़ता रहा है... 
ज्यादातर शामिल ही रहा है...

हमें खुशी है कि कुछ समय के लिए पेरिस समझौते से बाहर रहने के बाद आप वापस आ गए हैं. यह अच्छा है कि बाइडन प्रशासन इसको लेकर सक्रिय रहा है, लेकिन आप अन्य राष्ट्रों को कैसे भरोसा दिलाएंगे कि आपका प्रशासन केवल बातों तक सिमटा नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वास्तव में काम करेगा और अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हटेगा?

हमें ठीक वही करने की जरूरत है जो राष्ट्रपति बाइडन कर रहे हैं. उन्होंने शपथ ग्रहण करने के कुछ घंटों के भीतर पेरिस समझौते के साथ फिर जुडऩे की घोषणा कर दी. राष्ट्रपति ने कार्यकारी आदेश जारी किए, जिसमें कहा गया कि उनकी सरकार के हर फैसले में जलवायु के प्रति सुसंगति होनी चाहिए.

राष्ट्रपति ने बहुत आक्रामक और महत्वपूर्ण कानून बनाया है और अमेरिका के बुनियादी ढांचे, हमारी ऊर्जा ग्रिड का निर्माण करने, गाडिय़ों को इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने और देश में 5,00,000 चार्जिंग स्टेशन बनाने के लिए 2 ट्रिलियन डॉलर का आवंटन किया है. कई अलग-अलग काम करने के लिए राष्ट्रपति दृढ़ हैं क्योंकि इनसे नौकरियां पैदा होंगी और इसका लोगों के स्वास्थ्य में सुधार, प्रदूषण को कम करने और जलवायु संकट को दूर करने पर भी बड़ा प्रभाव पड़ता है. 

इसलिए, राष्ट्रपति बाइडन के नेतृत्व वाला संयुक्त राज्य अमेरिका इसको लेकर एकदम स्पष्ट है कि हमें केवल बातें नहीं करनीं बल्कि काम करके दिखाने की जरूरत है. हम काम करके दिखाएंगे. वे 22 अप्रैल को शिखर सम्मेलन में उत्सर्जन में कटौती के हमारे लक्ष्यों की घोषणा करेंगे और हम अपने प्रयासों में बहुत आक्रामक होंगे.

और मैं आपको बताना चाहता हूं कि राष्ट्रपति ट्रंप ने समझौते से भले ही हाथ खींचे थे लेकिन अमेरिका के अधिकांश गवर्नर इसके साथ बने रहे थे. अमेरिका के अधिकांश मेयरों ने भी समझौते के को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जारी रखी थी. भले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने बिना किसी विज्ञान के, बिना किसी वास्तविक तर्क के यह फैसला कर लिया कि हम पेरिस समझौते से बाहर निकल जाएं लेकिन अमेरिकियों का विशाल बहुमत इस समझौते के पक्ष में बना रहा.

तो, हम बहुत अच्छा कर रहे हैं. बेशक उतना अच्छा नहीं जितना हम कर सकते थे और हमने निश्चित रूप से इन पिछले चार वर्षों में एक खराब संदेश भेजा है. राष्ट्रपति बाइडन ने फैसला किया है कि ओबामा-बाइडन प्रशासन के दौरान अमेरिका ने जैसे प्रतिबद्धताओं को निभाया था, बाइडन-हैरिस प्रशासन भी उसी तरह काम करेगा. और पिछले चार वर्षों में हुए नुक्सान की हम भरपाई करने जा रहे हैं.

कई भारतीय पर्यावरण एजेंसियों ने कहा है कि भारत के लिए 2050 के अपने लक्ष्य को पूरा करना मुश्किल होगा जब तक कि प्रमुख उद्योगों, विशेष रूप से इस्पात और सीमेंट में बड़े तकनीकी परिवर्तन नहीं होते. ये तकनीक बहुत महंगी हैं. हमें पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी (ग्रीन टेक्नॉलोजी) या वित्त देने के संदर्भ में अमेरिका कितनी मदद कर सकता है जो हमें उस दिशा में आगे बढऩे में सक्षम करेगा? 

आपने जो कहा वह सच है. हम प्रौद्योगिकी के मौजूदा स्तर के साथ अपने सभी लक्ष्यों को पूरा नहीं कर सकते और हम जानते हैं कि हमें इसके बारे में ईमानदार रहना होगा. लेकिन हम नई तकनीकों को भी आज की तुलना में कहीं अधिक तेजी से अपना सकते हैं. हमारे पास इन नई तकनीकों को अपनाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है. हम उसे बदलने की कोशिश करने जा रहे हैं.

हमारे पास पर्याप्त संयुक्त प्रयास नहीं हैं, एक साथ मिलकर काम करने वाले देश नहीं हैं. यही वजह है कि मैं यहां आया हूं, क्योंकि राष्ट्रपति बाइडन चाहते हैं कि भारत और अमेरिका मिलकर अनुसंधान करें और उम्मीद है कि कुछ क्रांतिकारी प्रौद्योगिकी की खोज कर लें.

हम साथ मिलकर करेंगे. मुझे लगता है कि हमें सहयोग के दृष्टिकोण की आवश्यकता है और अधिक से अधिक लोगों को साथ लाया जाए. उदाहरण के लिए, यूएई ईंधन के रूप में हाइड्रोजन के प्रयोग, बैटरी पावर की स्टोरेज क्षमताओं को बढ़ाने और अन्य प्रयासों में हमारे साथ काम करने में रुचि रखता है. मुझे यकीन है कि हम साथ मिलकर काम करेंगे. हमारे लिए चुनौती यह है कि क्या हम समय पर वहां पहुंच पाएंगे? क्या हम काम का ग्राफ आगे बढ़ाएंगे?

आपने अच्छा सवाल उठाया. मिसाल के तौर पर चीन का कहना है कि वह 2050 तक अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं करेगा, वह उसे 2060 तक करना चाहता है. इस समय चीन के साथ आपके संबंध कुछ टकरावपूर्ण नजर आते हैं और भारत के भी. ऐसे में चीन भी साथ आएगा, इसको लेकर आप कितने आश्वस्त हैं?

मैं इस पर आश्वस्त तो नहीं हूं लेकिन आशान्वित जरूर हूं क्योंकि चीन इसमें बहुत महत्वपूर्ण खिलाड़ी है. चीन की बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था है, जो दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी है. यह एक विशाल, शक्तिशाली राष्ट्र है और हमें उम्मीद है कि वह इस अभियान में साथ आएगा और नेतृत्व करेगा. राष्ट्रपति शी ने इसमें चीन की नेतृत्व वाली भूमिका के बारे में बात की है.

हम इसके लिए चीन के साथ काम करने को इच्छुक हैं. राष्ट्रपति बाइडन ने स्पष्ट कहा है कि कुछ मुद्दों पर हमारा मतभेद होगा. यह छुपा नहीं है और भारत के संबंध भी चीन के साथ तनावपूर्ण हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने सामने खड़े ऐसे संकट को नजरअंदाज कर दें, जिसका समाधान हम सब मिलकर ही निकाल सकते हैं और वह है जलवायु संकट. इसलिए, हमें जलवायु के मुद्दों को अन्य चीजों से अलग करना होगा.

हम दूसरे विवादों के कारण इसकी अनदेखी नहीं कर सकते. मुझे लगता है कि यह संभव है. चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2013, 2014 में सहयोग किया और हम अपने साझा प्रयासों की घोषणा कर सके थे. मुझे लगता है कि उस साझीदारी से पेरिस समझौते के निर्माण में काफी मदद मिली थी. अब, हमें ग्लासगो (नवंबर 2020 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन) के निर्माण के लिए काम करने की आवश्यकता है.

मैं फिर से पेरिस समझौते की बात करना चाहता हूं क्योंकि उसमें बहुत सारी प्रतिबद्धताएं जताई गई थीं, खासकर फंडिंग को लेकर. विकसित देशों की 2020 के बाद से 100 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता थी. वह लक्ष्य से काफी पीछे रह गया. यह सुनिश्चित करने के लिए आप क्या करने जा रहे हैं कि वह धन उपलब्ध हो? और क्या आप उन देशों को दंडित करना शुरू करेंगे जो उस कोष में योगदान नहीं करते हैं?

मुझे लगता है कि हमें सभी देशों को योगदान के लिए तैयार करने की जरूरत है. राष्ट्रपति बाइडन उस राशि का भुगतान करने जा रहे हैं जिसका वादा राष्ट्रपति ओबामा ने किया था लेकिन जिसे राष्ट्रपति ट्रंप ने रोक दिया था. इसलिए हम बकाया का भुगतान करेंगे लेकिन हम...राष्ट्रपति यह सुनिश्चित करेंगे कि कुछ अतिरिक्त राशि का योगदान करें. इसलिए, यह इसमें बाइडन का योगदान होगा और यह हमारी अर्थव्यवस्था और राष्ट्र के आकार के अनुरूप होगा.

मुझे विश्वास है कि 100 अरब डॉलर तक का योगदान मिल जाएगा. अभी हम 80 या उसके आसपास हैं. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें केवल 100 अरब डॉलर पर नहीं रुकना चाहिए. यह पर्याप्त पैसा नहीं है. हमें खरबों डॉलर की जरूरत है और केवल निजी क्षेत्र ही ऐसा कर सकते हैं. इसलिए हम सबसे बड़े एसेट मैनेजर के साथ काम कर रहे हैं. हम सबसे बड़े बैंकों के साथ काम कर रहे हैं. और सिर्फ बड़े नहीं.

हम शुरुआत बड़े से कर रहे हैं और हमें निवेश के लिए सबको लेकर आना होगा. यह खैरात नहीं, बल्कि निवेश होगा. नई ऊर्जा के उपयोग को संभव करने के लिए पैसा चाहिए और हम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने, अधिक रोजगार सृजित करने, बेहतर स्वास्थ्य रखने, बेहतर सुरक्षा प्रदान करने जैसे बहुत से काम कर सकते हैं. हम यह सब तभी कर सकते हैं अगर इस नई ऊर्जा अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में आगे बढ़ें और मुझे लगता है कि यह बहुत ही रोमांचक है.

22 अप्रैल का राष्ट्रपति बाइडेन का शिखर सक्वमेलन इसी के लिए है. उसमें राष्ट्राध्यक्ष होंगे और हम अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य को रखेंगे. हम चाहते हैं कि दुनिया यह देखे कि हर देश क्या करने का संकल्प लेता है. और क्यों? क्योंकि ये 20 देश, 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं जो 81 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए उत्तरदायी हैं. इसलिए हम चाहते हैं कि यह न्यायोचित हो. हम उन छोटे राष्ट्रों के बारे में और विचारशील होना चाहते हैं जो 150 साल या उससे अधिक समय से दूसरों की करनी का दंड भोग रहे हैं.

हमें पिछली गलतियां सुधारने के लिए बहुत तेज गति से काम करना होगा. हम अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं. तो क्या इसका मतलब यह है कि सब कुछ हमें ही करना होगा? नहीं, हम यह सब अपने आप नहीं कर सकते. हर देश को समाधान का हिस्सा बनना होगा. उदाहरण के लिए, छोटे देश जो अपनी ऊर्जा क्षमताओं का निर्माण कर रहे हैं, वे ऊर्जा के लिए कोयले पर आश्रित न हों. वे नवीकरणीय ऊर्जा अपनाएं. नई ऊर्जा पर जाएं. गैस के लिए साझेदारी करें या अन्य तरीके भी हो सकते हैं, लेकिन आपसी सहयोग की आवश्यकता है. 

● जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी को बचाने के संदर्भ में भारत और दुनिया के लिए आप क्या बड़ा संदेश देंगे?
मेरा बड़ा संदेश यह है कि भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. यह विशाल बौद्धिक संसाधन, महान विचारों और आध्यात्मिक संसाधन से संपन्न राष्ट्र है. यदि भारत के लोग, इसके साथ खुद को जोड़ लें तो यह संभव हो जाएगा. हम सभी के लिए चुनौती समय की है.

हमारे पास बहुत समय नहीं है, यह शीघ्र करना होगा. और भारत अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और बड़े उत्सर्जकों के साथ एक महत्वपूर्ण भागीदार है. हमें यह सुनिश्चित करने के लिए एक साथ आना होगा कि हमारे बच्चे और नाती-पोते और उसके बाद की पीढिय़ों को ऐसी धरती मिले जो आज की तुलना में बेहतर हो.

प्रधानमंत्री मोदी काम करने वाले नेता हैं. वे परिणाम चाहते हैं, बयानबाजी नहीं. जलवायु पर अमेरिका-भारत की साझेदारी दुनिया के दूसरे देशों के लिए एक मिसाल होगी 

कोई भी राष्ट्र अकेले ही जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान नहीं कर सकता. हर देश को समाधान का हिस्सा बनना होगा. हम एक दूसरे पर निर्भर हैं.

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