ये दूसरी मोदी लहर है... लालू की गैरमौजूदगी का कोई अर्थ नहीं है

बिहार के उप मुख्यमंत्री, सुशील कुमार मोदी पहले ही राज्य में सौ से ज्यादा चुनावी सभाओं को संबोधित कर चुके हैं. अमिताभ श्रीवास्तव के साथ बातचीत में वे कहते हैं कि बिहार में दूसरी मोदी लहर दिखाई दे रही है और राज्य में एनडीए 2014 में जीती 31 लोकसभा सीटों की संख्या में इस बार और इजाफा करेगा. बातचीत के अंशः

सुशील कुमार मोदी
सुशील कुमार मोदी

पिछले चुनावों के उलट, इस बार समूचा विपक्ष एकजुट है. दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल भी सहानुभूति की लहर का फायदा उठाने की फिराक में है.

बिहार में अभी यदि कोई लहर है तो वह नरेंद्र मोदी की लहर है. और यह दूसरी लहर उस लहर से कहीं ज्यादा मजबूत और केंद्रित है जिसे हमने 2014 में देखा था. यह 2012 की ओबामा लहर की तरह है. 2014 में बिहार के मतदाताओं ने मोदी को विकास के गुजरात मॉडल के पीछे भूमिका निभाने वाले शख्स के रूप में पहचाना था. लेकिन पांच वर्षों में उन्होंने देखा है कि वे मजबूत प्रधानमंत्री भी हैं.

भ्रष्टाचार पर काबू पाने से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक तक और छोटे व्यवसायों को सुविधाएं देने से लेकर गरीबों को सुविधाएं उपलब्ध कराने और भारत का वैश्विक मंचों पर नेतृत्व करने तक—उनका प्रदर्शन शानदार रहा है.

लेकिन आप महागठबंधन को खारिज कैसे कर सकते हैं? उन्होंने भी अपने सामाजिक समीकरण ठीक बैठाए हैं.

लोकसभा चुनावों में लोग प्रधानमंत्री चुनते हैं. वे संकीर्ण और जातिगत मुद्दों पर ध्यान नहीं देते. कोई भी मतदाता ऐसे मामूली गठबंधन के हाथों में सत्ता देकर भारत के भविष्य को खतरे में नहीं डालना चाहेगा जैसा कि हमने अतीत में भी देखा है. मतदाता समझदार हैं, उन्होंने जाति को खारिज कर दिया है और वे विकास, सुरक्षा और देश के सम्मान पर दांव लगाए हुए हैं.

मतदाताओं के पास राहुल गांधी का विकल्प भी तो है.

इन चुनावों ने कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दिया है. राजद ने उसे बिहार में केवल नौ सीटें दी हैं. उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन ने कांग्रेस को साथ में लेने से इनकार कर दिया है.

बिहार में आपके लिए क्या बात काम कर रही है?

हमारे लिए सभी कुछ अच्छा हो रहा है. हमारे पास निर्णायक प्रधानमंत्री और काबिल मुक्चयमंत्री है. सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से गरीब लोगों को दस फीसदी आरक्षण देने के केंद्र सरकार के फैसले, पाकिस्तान पर हवाई हमले और पूरे राज्य का विद्युतीकरण—ये सब वे कदम हैं जिनसे हमें लाभ मिलेगा. साल 2014 के चुनावों में तो हमें 40 में से 31 सीटें मिली थीं, इस बार हम इस संख्या को और बढ़ाएंगे.

क्या लगता है कि लालू की गैरमौजूदगी एनडीए के लिए वरदान की तरह है?

यह धारणा बेकार की है. 2009 के लोकसभा चुनावों में लालू दोषी सिद्ध नहीं हुए थे और उन्होंने प्रचार भी किया था, फिर भी भाजपा-जद (यू) गठबंधन ने 32 सीटें जीती थीं. पिछले चुनावों में भी लालू बाहर थे और उन्होंने जाति व सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश की थी, फिर भी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने 31 सीटें जीती थीं. लालू की गैरमौजूदगी के कोई मायने नहीं है.

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