खतरनाक गतिरोध के बाद राहत का मौका

अमेरिका और ईरान के बीच हुए एमओयू पर हस्ताक्षर कूटनीति की वापसी का संकेत है. असली पेचीदा मुद्दों को अंतिम समझौते में ही सुलझाना होगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने वर्साय में 18 जून को यूएस-ईरान एमओयू पर दस्तखत किए

- सैयद अकबरुद्दीन

अमेरिका और ईरान के बीच शुरुआती मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) ने संकट को ठंडा तो किया है, खत्म नहीं. कुछ हलकों में इसे बड़ी कामयाबी बताया जा रहा है. यकीनन यह उस विकल्प से बेहतर है, जिसमें लंबा संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना, तेल कीमतों का बेकाबू होना और क्षेत्रीय युद्ध का फैलना शामिल था.

यह एमओयू भारत के लिए इसलिए अहम नहीं है कि वह बातचीत की मेज पर था, बल्कि इसलिए है कि इसकी कीमत चुकाने वालों में भारतीय भी शामिल थे. हालांकि, इस एमओयू को व्यापक समाधान समझना गलती होगी. सबसे अच्छे हालात में इसने संकट को फिर कूटनीतिक ढांचे में लौटा दिया है. सबसे खराब हालात में यह कठिन सवालों को सिर्फ 60 दिन आगे टालने जैसा भी हो सकता है.

यह फर्क अहम है. नई सहमति उन परमाणु मुद्दों को हल नहीं करती, जिन्हें युद्ध के केंद्र में बताया गया था. यह मुख्य रूप से हालिया टकराव से जन्मे मुद्दों से जुड़ी है: होर्मुज से जहाजों की आवाजाही में बाधा, तेल आपूर्ति पर खतरा और बड़े सैन्य टकराव का जोखिम. पुराने सवाल अब भी बने हुए हैं. ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार का क्या होगा? यूरेनियम संवर्धन किस स्तर तक मंजूर होगा? परमाणु सामग्री कहां ले जाई जाएगी? ईरान के परमाणु कदमों और अमेरिकी प्रतिबंध हटाने के बीच क्रम क्या होगा? ये मुख्य मुद्दे हैं. और इन्हें सिर्फ फिर वार्ता की मेज पर रख दिया गया है.

इसीलिए इस समझौते की तुलना 2015 के जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ ऐक्शन (जेसीपीओए) से नहीं करनी चाहिए. ओबामा प्रशासन ने ईरान और पी5+1 देशों के बीच यह परमाणु समझौता कराया था. जेसीपीओए एक परमाणु समझौता था. उसने प्रतिबंधों में राहत के बदले ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर जांचे जा सकने वाले प्रतिबंध लगाए थे, जिनमें संवर्धन का स्तर और भंडार शामिल थे. यह एमओयू अभी वैसा नहीं है. यह युद्धविराम से आगे बढ़ा एक कूटनीतिक ढांचा है. इसमें कहा गया है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, लेकिन ईरान बरसों से यही कहता रहा है. असली परीक्षा घोषणा में नहीं, प्रणाली में है.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शुरू में ओबामा समझौते से ज्यादा महत्वाकांक्षी व्यवस्था चाहते थे. वे 'जेसीपीओए-प्लस' समझौता चाहते थे, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम के साथ उसकी बैलिस्टिक मिसाइलों और क्षेत्रीय प्रॉक्सी पर भी बात हो. इन दो अतिरिक्त मोर्चों पर एमओयू काफी कमजोर दिखता है. बैलिस्टिक मिसाइलों पर ठोस बात नहीं हुई है. ईरान के क्षेत्रीय नेटवर्क को पीछे नहीं धकेला गया है.

लेबनान और कई मोर्चों पर युद्धविराम से जुड़ी भाषा शामिल करके इस समझौते ने शायद परोक्ष रूप से ईरान और उसके सहयोगियों को कुछ राहत दे दी है. शासन परिवर्तन भी व्यावहारिक एजेंडे से गायब हो गया है. अगर ये युद्ध के मूल लक्ष्य थे, तो इस एमओयू से अमेरिकी उद्देश्यों के काफी सीमित हो जाने का संकेत है.

फिर वॉशिंगटन इसके लिए राजी क्यों हुआ? क्योंकि अमेरिका ने पाया कि तनाव बढ़ाना उसे शुरू करने से आसान था, नियंत्रित करना नहीं. लगता है वॉशिंगटन ने ईरान की टिके रहने की क्षमता को कम आंका और सैन्य दबाव से राजनैतिक पतन की संभावना को ज्यादा मान लिया. वैश्विक आर्थिक कीमत भी बहुत ज्यादा हो गई थी. ऊर्जा कोई अलग-थलग क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है. यह आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार है.

जैसे ही तेल कीमतें और शिपिंग जोखिम बढ़ते हैं, महंगाई का दबाव परिवहन, मैन्युफैक्चरिंग, खाने-पीने की चीजों और घरेलू बजट तक फैल जाता है. ट्रंप के लिए, जो ईंधन कीमतों और मंदी के जोखिम को लेकर बेहद संवेदनशील हैं, टकराव जारी रखना घरेलू राजनीति के लिए भी खतरनाक था.

ईरान के पास भी पीछे हटने की वजहें थीं. उसके नेता अक्सर तब व्यावहारिक रुख दिखाते हैं, जब टकराव की कीमत एक हद से ज्यादा बढ़ जाती है. ईरान को सैन्य और आर्थिक चोट लगी थी. तेल निर्यात बाधित हुआ था. उसका बड़ा खरीदार चीन अनिश्चित आपूर्ति के कारण खरीद तेजी से घटा रहा था. आय के रास्ते सूख रहे थे. शासन शायद टिक सकता था, लेकिन टिके रहने की भी कीमत होती है. यह एमओयू तेहरान को समय देता है, कुछ आर्थिक राहत देता है और आगे और रियायतें निकालने का मौका देता है.

सबसे तात्कालिक राहत होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है, जहां से दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है. इसका फिर खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है. लेकिन यहां भी तस्वीर पूरी तरह भरोसा देने वाली नहीं है. ईरान ने दुनिया को याद दिला दिया है कि होर्मुज उसे कितनी बढ़त देता है. अगर आगे चलकर ईरान आवाजाही को सेवा शुल्क, एस्कॉर्ट शुल्क या नियामकीय लागत में बदलने की कोशिश करता है तो होर्मुज की राजनीति हर बैरल तेल की कीमत में शामिल होने लगेगी. भारत को प्रति बैरल ज्यादा कीमत सिर्फ कच्चे तेल के दामों की वजह से नहीं, बल्कि रास्ते की राजनीति के कारण भी चुकानी पड़ सकती है.

प्रतिबंधों में राहत दूसरी बड़ी वजह है. समझौता ईरान को कुछ फ्रीज संपत्तियों और तेल से जुड़ी छूटों तक पहुंच देता दिखता है, हालांकि असली अहमियत इसकी व्यवस्था की बारीकियों में है. ट्रंप यह नहीं दिखाना चाहेंगे कि वे सीधे तेहरान को नकद पैसा दे रहे हैं इसलिए फंड नियंत्रित रास्तों से जारी हो सकते हैं, शायद मानवीय मदद या मंजूर खरीद के लिए, जो तीसरे देशों के जरिए की जाए.

ईरान के राष्ट्रपति मसूज पजेशकियान तेहरान में दस्तखत किए दस्तावेज के साथ

परमाणु मुद्दा वह धुरी है, जिस पर अगला चरण घूमेगा. अटकल है कि ईरान तय समय के लिए यूरेनियम संवर्धन पर अस्थायी रोक या सीमा मान सकता है. अगर ऐसी जांची जा सकने वाली रोक पर सहमति बनती है, तो ट्रंप दावा कर सकते हैं कि उन्होंने ओबामा से ज्यादा कड़े प्रतिबंध हासिल किए, क्योंकि जेसीपीओए के तहत संवर्धन पर कोई रोक नहीं थी. लेकिन यह अब भी अनिश्चित है. खबरों के मुताबिक, ईरान की सुविधाओं को नुक्सान पहुंचा है, जिससे अस्थायी रोक तेहरान के लिए उतनी महंगी नहीं होगी जितनी दिखती है. बड़ी समस्या सत्यापन की है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की पहुंच, सैटेलाइट निगरानी और मौजूदा भंडार का हिसाब बेहद अहम होगा. अगर बड़ी मात्रा में संवर्धित यूरेनियम का हिसाब न हो या अघोषित साइटें मौजूद हों, तो कोई भी सहज नहीं रह सकता.

यह एमओयू भारत को तुरंत तीन तरह से मदद देता है. यह होर्मुज पर खतरा घटाता है. यह बड़े क्षेत्रीय युद्ध का जोखिम कम करता है. और परमाणु सवाल को सैन्य टकराव के बजाए फिर कूटनीति की ओर लौटाता है. ये तीनों बातें भारतीय हितों के अनुकूल हैं. लेकिन भारत के लिए सबक इस एक समझौते से बड़ा है. संकट ने रणनीतिक असंतुलन उजागर किया है: पश्चिम एशिया पर भारत की निर्भरता इस क्षेत्र में उसके राजनैतिक वजन से कहीं ज्यादा है. हमने संकट को पूरी तरह महसूस किया, लेकिन उसके समाधान को आकार नहीं दिया. यही असमानता यहां असली रणनीतिक सबक है, जिस पर भारत के विदेश नीति प्रतिष्ठान को तुरंत ध्यान देना होगा.

पाकिस्तान की भूमिका को मददगार के रूप में नोट करना भी जरूरी है, लेकिन उसे बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए. इस्लामाबाद ने अपने पत्ते चतुराई से खेले हैं और कूटनीतिक दृश्यता हासिल की है. वह लंबे समय से खुद को प्रतिस्पर्धी ताकतों के बीच उपयोगी वार्ताकार के रूप में पेश करता रहा है, जिसमें 1970 के दशक में अमेरिका और चीन के बीच उसकी भूमिका भी शामिल है. लेकिन इससे भारत-पाकिस्तान संतुलन नहीं बदलता. पाकिस्तान की ढांचागत आर्थिक और अंदरूनी समस्याएं बनी हुई हैं. यह रणनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि सामरिक लाभ है.

लंबे समय में इसका असर पश्चिम एशिया में धीरे-धीरे नए संतुलन के रूप में दिख सकता है. अमेरिका ओबामा के दौर से ही इस क्षेत्र में अपनी जरूरत से ज्यादा प्रतिबद्धता घटाने और एशिया व चीन पर ज्यादा ध्यान देने की कोशिश कर रहा है. अगर खाड़ी देशों को लगे कि अमेरिका अकेले उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता, तो वे और सक्रिय ढंग से संतुलन साधेंगे. वे ईरान, चीन, रूस, यूरोप और भारत से बात करेंगे. अगर ईरान होर्मुज पर मान्य दबदबे और तेल आपूर्ति की बहाली के साथ बाहर आता है, तो उसे ज्यादा मजबूत क्षेत्रीय खिलाड़ी माना जाएगा.

इसीलिए इस एमओयू को न तो आत्मसमर्पण माना जाना चाहिए और न ही शांति. यह एक अवसर है. इसने खतरनाक गतिरोध के बाद कूटनीति के लिए छोटा सा मौका दिया है. लेकिन अवसर बंद भी हो सकते हैं. परमाणु बातचीत नाकाम हो सकती है. इज्राएल कार्रवाई कर सकता है. कोई मिलिशिया गलत आकलन कर सकता है. किसी टैंकर की घटना संकट को भड़का सकती है. अगले 60 दिन तय करेंगे कि यह किसी समझौते की शुरुआत है या अगले टकराव से पहले का सिर्फ एक विराम.

लेखक संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि रहे हैं.

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